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सादिया अनस पासपोर्ट प्रकरण के कारण दुनिया के दूसरे देश यदि भारतीय पासपोर्ट को अविश्वसनीय नजर से देखने लगें तो दोष किसका होगा?

सुमंत विद्वांस। पासपोर्ट जारी हुआ, नियमों को ताक पर रखकर हुआ, तुष्टिकरण के लिए हुआ या अपने अहंकार के लिए हुआ, ये सब मुद्दे अपनी जगह कायम हैं और सही भी हैं। लेकिन इस मामले का एक और पहलू है, जिस पर शायद किसी का ध्यान नहीं गया है। दुनिया में लगभग 55 ऐसे देश हैं, जहाँ भारतीय पासपोर्ट धारक वीज़ा लिए बिना जा सकते हैं या ई-वीज़ा/आगमन पर वीज़ा जैसी सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं। मैं ऐसे कुछ देशों में गया हूँ और इन सुविधाओं का उपयोग भी मैंने किया है।

ये 55 देश भारत के नागरिकों को ऐसी सुविधाएं इसलिए देते होंगे क्योंकि एक तो भारत सरकार के साथ इनके अच्छे संबंध हैं और दूसरा इन्हें भारत के पासपोर्ट पर भरोसा है; मतलब इन्हें विश्वास है कि भारत में पासपोर्ट बनाने की एक सुरक्षित और विस्तृत प्रक्रिया है, और पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही पासपोर्ट दिया जाता है, इसलिए अगर कोई व्यक्ति भारत का पासपोर्ट लेकर आया है, तो यह माना जा सकता है कि उसकी पहचान, आपराधिक रिकॉर्ड आदि बातों की जांच करने के बाद ही उसे पासपोर्ट मिला होगा।

दुनिया में सभी देश अपनी-अपनी पसंद के देशों को ऐसी सुविधाएं देते हैं। हर देश यह तय करता है कि ऐसी सुविधा किन देशों को देनी है? उसके आधार पर यह संख्या कम-ज्यादा हो सकती है। जैसे सिंगापुर या अमरीका के नागरिक शायद 160 देशों में बिना वीज़ा के जा सकते हैं, लेकिन पाकिस्तान या इराक़ के नागरिकों के लिए यह सुविधा बहुत कम देशों में मिलती होगी।

इस पूरे पासपोर्ट प्रकरण के कारण अपने देश में भी और बाहर भी जितनी चर्चा, विवाद, खबरें, खंडन आदि आदि हुए हैं, और जो बात उठी है कि पासपोर्ट गलत ढंग से जारी हुआ, उसके कारण अगर दुनिया के अन्य देश भारत के पासपोर्ट को अविश्वसनीय मानने लगें, तो उन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता।

और सोचिये अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा? भारतीय पासपोर्ट को विदेशों में सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगेगा, लाखों भारतीय नागरिक हर साल नौकरी, पर्यटन, व्यापार, उपचार, शिक्षा आदि अनेक कारणों से विदेश जाते हैं, उन्हें शायद अतिरिक्त पूछताछ और सवाल-जवाब से गुज़रना पड़ेगा। जो देश आज वीज़ा-मुक्त आवागमन की सुविधा देते हैं, संभव है कि उनमें कुछ कमी हो जाए, जो देश हमें आज बिना वीज़ा के घुसने नहीं देते हैं, हो सकता है कि वे अपने नियम और कड़े कर दें। किसी भी संभावना को आप नकार नहीं सकते। मैं दोनों तरह के देशों में जा चुका हूँ इसलिए मुझे अनुभव से मालूम है कि जहां वीज़ा के बिना जा सकते हों और जहां कड़ी पूछताछ के बाद वीज़ा मिलता हो उन दोनों मामलों में कितना अंतर होता है!

बेशक ऐसे बदलाव एक घटना के कारण नहीं हो जाएंगे। लेकिन अबू सलेम और मोनिका बेदी के फ़र्ज़ी पासपोर्ट वाले प्रकरणों से लेकर विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे भगोड़ों तक भारत के पासपोर्ट के दुरुपयोग के कई मामले हो चुके हैं। लखनऊ की यह महिला और उनके पति अपराधी हैं या नहीं, ये मैं नहीं कह रहा हूँ, लेकिन इस पासपोर्ट प्रकरण के विवाद के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को थोड़ा-बहुत नुकसान तो अवश्य हुआ है, इस बात को भूलना नहीं चाहिए।

घरेलू राजनीति हो या अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, दोनों में ही छवि/परसेप्शन का बहुत महत्व होता है, शायद रिएलिटी से भी ज्यादा महत्व परसेप्शन का है। विदेश मंत्री और विदेश मंत्रालय चाहे किसी भी देश के हों? उनके कामकाज और हरकतों पर पूरी दुनिया की पैनी निगाहें रहती हैं। आखिर इतने सारे देशों के जो दूतावास दिल्ली की चाणक्यपुरी में हैं, उनका एक काम यह भी तो है!

इस पूरे प्रकरण में विभागीय स्तर पर भी और सोशल मीडिया पर भी विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्री के अपरिपक्व लगने वाले आचरण के कारण जो परसेप्शन बना, वह मुझे ज्यादा चिंतित करता है। बाकी सारी राजनैतिक और चुनावी बातें तो भारत में नई नहीं हैं।

साभार: सुमंत विद्वासं के फेसबुक वाल से।

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