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यूपीए सरकार के दौरान एनडीटीवी को पीएमओ से मिलता था संपादकीय आदेश!

एनडीटीवी न्यू चैनल अगर देश का विवादास्पद चैनल के नाम से कुख्यात है तो इसके लिए आज नहीं बल्कि उसका विगत भी दोषी है। देश के प्रधानमंत्री कार्यालय से जब किसी चैनल को संपादकीय आदेश मिलने लगे तो वह कुछ भी हो सकता है लेकिन न्यूज चैनल तो कतई नहीं हो सकता। सोनिया गांधी नियंत्रित यूपीए सरकार के 10 सालों के कार्यकाल के दौरान एनडीटीवी को पीएमओ से ही संपादकीय आदेश मिलता रहा। यह खुलासा उसी चैनल में वर्षों तक काम करने वाले पत्रकार समरेंद्र सिंह ने किया है।

मुख्य बिंदु

… तो एनडीटीवी के विवादास्पद होने से लेकर गर्त तक जाने के लिए खुद प्रणय रॉय ही जिम्मेदार है
न्यूज को छोड़कर पावर ब्रोकर बने प्रणय रॉय शुरू से ही प्रोपगैंडा फैलाने में जुटे हैं

 

समरेंद्र सिंह का कहना है “यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान एनडीटीवी को पीएमओ से संपादकीय आदेश मिला करता था”। उन्होंने तो एनडीटीवी के इस पतन के लिए उसके मालिक डॉ. प्रणय राय को ही जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है “न्यूज को छोड़कर प्रोपगैंडा फैलाने में जुटे प्रणय रॉय के पाखंड के कारण ही एडीटीवी का पतन हुआ है “।

 

पत्रकारों पर प्रहर को लेकर जो प्रणय रॉय वर्तमान मोदी सरकार की आलोचना करते नहीं थकते, अपने हित के लिए मोदी सरकार के खिलाफ अभियान चलाने से नहीं थकते, वर्तमान समय को आपातकाल से भी बद्दतर बताने से परहेज नहीं करते, ये वही प्रणय राय है जिन्होंने न केवल अपनी पत्रकारिता को यूपीए सरकार के दौरान पीएमओ में गिरवी रख दिया था बल्कि पत्रकारों को बेइज्जत कर अपने चैनल से निकाल भी  दिया था।

यह घटना करीब एक दशक पहले की है। उस घटना के बारे में उस चैनल में वर्षों काम कर चुके समरेंद्र सिंह लिखते हैं  ” भले ही यह घटना कल की हुई लगती हो लेकिन है अगस्त 2007 की। एनडीटीवी के स्टूडियो में अजीब किस्म का माहौल था, क्योंकि वह मीटिंग स्वयं रॉय ने बुलाई थी।  सस्पेंस के बीच डॉ प्रणय रॉय मैनेजमेंट टीम के साथ हॉल में दाखिल हुए और उन्होंने दिबांग को संपादक पद से हटाने का ऐलान कर दिया। साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि “अगर कोई “खबर” से हट कर “कुछ करना” चाहता है तो उसके लिए एनडीटीवी छोड़ने के रास्ते खुले हैं।”

 

जब डॉ. रॉय यह यह बात कह रहे थे तो वे सालों पहले न्यूज छोड़कर पावर ब्रोकर बन चुके थे। क्योंकि पीएमओ से संपादीय आदेश आने का सिलसिला यूपीए की सत्ता में आने के बाद से ही शुरू हो गया था, और एनडीटीवी का पतन भी । प्रणय रॉय के इस व्यवहार के बारे में समरेंद्र सिंह का कहना है “संपादक को हटाने का यह तरीका और चैनल की संपादकीय नीति के स्पष्टीकरण का यह अंदाज मेरी समझ से परे था।

 

इसमें बेइज्जत करने का भाव ज्यादा था।  इस तमाशे के बाद समझ नहीं आया कि सौम्य और शालीन दिखने वाले डॉ प्रणय रॉय ने यह ओछी हरकत क्यों की”? शालीन होने और दिखने में फर्क होता है। डॉ राय शालीन महज दिखते हैं, अगर सही में होते तो मनोरंजन भारती जैसे ‘अपत्रकारों’ के हाथों हिंदी पत्रकारिता की यूं बेइज्जती नहीं करवाते।

शालीनता का भाव समझने और समझाने से प्रकट होता है, यूं  तुगलकी आदेश से नहीं कि मैं जो बोलूं उसका मतलब निकले या ना निकले आप समझ लो। राय की इस तुगलकी आदेश पर सवाल उठाने वाले समरेंद्र सिंह का कहना है “चैनल के पत्रकारों को यह कैसे आभास होगा कि डॉ रॉय की नजर में कौन सी घटना… खबर है और कौन सी घटना… खबर नहीं है”? ” किसी भी वाकये का खबर होना डॉ रॉय के निजी संबंधों पर निर्भर करता था। अब जब किसी चैनल का रेवेन्यू मॉडल उसके मालिकान के निजी संबंधों पर केंद्रित हो और मालिकान के निजी संबंधों का दायरा व्यापक हो तो फिर उस चैनल में तैनात पत्रकार क्या करें?”

गौरतलब है कि दिबांग को संपादक पद से हटाने  को जो तात्कालिक कारण माना गया वह अभिषेक -एश्वर्या राय की शादी के दौरान जाह्नवी नाम की एक लड़की का अभिषेक बच्चन को अपना पति बताना और फिर बाद में अपनी कलाई की नस काट लेना। यह घटना पूरे देश के लिए रोमांचक खबर बनी और प्रायः हर चैनल ने उसपर अपने हिसाब से खेला भी, वो भी पूरे दिन। यह खबर कुछ घंटों के लिए एनडीटीवी पर भी चली, लेकिन जैसे ही मालिकान के हित टकराने का दबाव बढ़ा वह खबर गिरा ही नहीं दी गई बल्कि उसका बवंडर भी बना दिया गया। क्योंकि डॉ रॉय के हिसाब से वह खबर थी ही नहीं। अब आप सोच सकते हैं कि प्रणय राय खबर से कितने पहले कट चुके थे?

 

इसी खबर की वजह से तो दिबांग पर गाज गिराई गई। हालांकि आंतरिक खेल कुछ और था, जो भी रहा हो, लेकिन इस घटना ने डॉ रॉय की नैतिकता की कलई खोल कर रख दी। इस संदर्भ में समरेंद्र सिंह का कहना है  ” जाह्नवी के बहाने नैतिकता की चादर ओढ़ने वाले डॉ प्रणय रॉय और राधिका रॉय सचमुच इतने नैतिक हैं या फिर यह महज पाखंड था? जाह्नवी मामले में डॉ प्रणय रॉय और राधिका रॉय जिस नैतिकता की दुहाई दे रहे थे, वह नैतिकता 2004 और 2005 में प्रीति जैन-मधुर भंडारकर मामले में कहां सो रही थी?” यह वही घटना है जिससे डॉ रॉय की सत्ता से निकटता और सत्ता से निकटता बनाए रखने के लिए नीचता पर उतरने की कलई खोल दी। और यहीं से एनडीटीवी का न्यूज चैनल के रूप में पतन होना शुरू हो गया था!

दिबांग को हटाने की घटना ने न केवल डॉ रॉय की शालीनता और नैतिकता की कलई खोल दी बल्कि एनडीटीवी चैनल में मठाधीश बने बैठे पंकज पचौरी , मनोरंजन भारती, और खुद को एनडीटीवी की मालकिन होने की  मुगालता पाले बरखा दत्त की  रीढ़ विहीनता भी सामने आई। बरखा दत्त का एनडीटीवी की मालकिन होने के भ्रम के बारे में समरेंद्र सिंह का कहना है “बरखा इन दिनों एनडीटीवी और डॉ रॉय से नाराज चल रही हैं। दरअसल उन्हें भ्रम हो गया था कि वो एनडीटीवी की सिपहसलार नहीं बल्कि मालकिन हैं। इसी भ्रम में वो एनडीटीवी के हर उस खेल में शामिल रहीं जो डॉ प्रणय रॉय ने अपने आकाओं के इशारे पर शुरू किया। चाहे वो वोल्कर कांड में नटवर सिंह को फंसा कर कांग्रेस को बचाने का मामला हो या फिर कोई और। डॉ प्रणय रॉय का खेल खेलते-खेलते बरखा को यह लगने लगा कि एनडीटीवी उनके बगैर चल नहीं सकता”।

जाह्ववी वाली खबर सबकी सहमति से चलाई गई थी, लेकिन जैसे ही डॉ रॉय इस खबर से नाराज हुए, सबने एक तरफ से पलटी मार ली और दिबांग को बलि का बकरा बना दिया। हालांकि उस प्रकरण में दिबांग ने सही मायने में एक संपादक का दायित्व निभाते हुए इस खबर चलाने का श्रेय लेते हुए सारा आरोप अपने ऊपर ले लिया।

URL: During UPA government, NDTV received editorial order from PMO

     
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