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जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ‘बेतुके बोहरा’ को क्यों ढोती रही मोदी सरकार?

माता वैष्णव देवी मंदिर में 400 से अधिक मुसलमानों को भरने वाले एन.एन. वोहरा ‘बेतुके वोहरा’ नहीं तो और क्या हैं? 2008 में सोनिया गांधी की मनमोहन सरकार ने उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया था। जम्मू-कश्मीर के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद के वह बेहद करीबी रहे हैं, यह सब जानते हुए भी पिछले चार साल से मोदी सरकार उन्हें पद पर बनाए हुए है? क्या जगमोहन जैसा एक भी प्रशासनिक व्यक्ति इस सरकार के पास नहीं है?

यदि अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेसी ही शासन चलाएंगे तो फिर 2014 में सरकार बदलने का फायदा क्या हुआ देश को? आपको डर लगता है कि लोग कहेंगे कि ‘भगवाकरण’ कर रहा है? अरे! भाई हमने कौन-सा ‘लालकरण’ और ‘हराकरण’ करने के लिए आपको वोट दिया था? 17 करोड़ लोगों ने भी तो आपको ‘भगवाकरण’ करने के लिए ही वोट दिया है! 24 जून को इस ‘बेतुके वोहरा’ का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। मोदी सरकार से अनुरोध है कि उनके कार्यकाल को अब न बढ़ाएं और किसी ऐसे व्यक्ति को राज्यपाल बनाएं, जो जम्मू-कश्मीर के लिए दूसरा जगमोहन साबित हो…..

जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी गठबंधन टूटने के बाद छह महीने के लिए राज्यपाल शासन लागू हो चुका है। ऐसे में कई अनभिज्ञ पत्रकारों ने भाजपा पर आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि राज्यपाल शासन के बहाने जम्मू-कश्मीर में भाजपा अपनी मनमानी चलाएगी। लेकिन उन्हें पता नहीं एन.एन वोहरा को सोनिया गांधी नियंत्रित मनमोहन सरकार ने जून 2008 में राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया था और कांग्रेस की ही सरकार ने उनका दूसरा कार्यकाल भी बढ़ाया था। भाजपा ने कांग्रेस की तरह अवैध तरीके से उन्हें अभी तक अपने पद से हटाया नहीं है। वोहरा का दूसरा कार्यकाल 25 जून को अब खत्म होने वाला है। वोहरा के दो टर्म के कार्यकाल के दौरान जम्मू-कश्मीर में चार बार राज्यपाल शासन लग चुका है। उनके 10 साल के दौरान जम्मू-कश्मीर में कोई उल्लेखनीय बदलाव आया हो ऐसा भी नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भाजपा ने एन.एन वोहरा को उनके पद से हटाया क्यों नहीं? भाजपा ने पूर्व राज्यपाल जगमोहन की ही तरह किसी सख्त शख्त को ये जिम्मेदारी क्यों नहीं दी,जो उसकी नीति के अनुरूप जम्मू-कश्मीर के हालात को बेहतर करने में अपनी भूमिका निभाता?

मुख्य बिंदु

*एन.एन वोहरा लगातार चौंथी वार अस्थिर घाटी के प्रभारी राजा की भूमिका निभा रहे हैं

*इससे पहले भी तीन बार जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन की बागडोर संभाल चुके हैं

नरेंद्र नाथ वोहरा को एक प्रकार से जम्मू-कश्मीर के आदमी के रूप में जाना जाता है क्योंकि वह हर परिस्थिति और हर पार्टी के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। वोहरा के बारे में यहां तक कहा जाता है कि वह एक ऐसे अधिकारी रहे हैं जिन्हें इस समस्या ग्रसित राज्य की हर नस की जानकारी है। इसलिए सभी सरकारों के प्रधानमंत्रियों ने जम्मू-कश्मीर मसले को लेकर उनपर भरोसा जताया है। अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यही करते रहे हैं।

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जब किसी व्यक्ति पर इतना भरोसा हो और उस भरोसे के अनुरूप उन्हें मौके भी मिले हों तो फिर समस्याओं का निदान न होना या ज्यों का त्यों रहना कहीं न कहीं उस शख्स की काबिलियत पर बड़ा प्रश्न खड़ा करता है? वोहरा 81 साल के हो चुके हैं और विगत दस साल से जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हैं, ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर की समस्याओं के निदान के लिए अभी तक क्या किया? उनका दूसरा कार्यकाल भी 24 जून को समाप्त होने वाला है।

याद कीजिए जब उन्हें पहली बार राज्यपाल बनाया गया था उस समय भी पद का दायित्व संभालते ही जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू हो गया था। अब जब उनका दूसरा कार्यकाल खत्म होने जा रहा है तब भी प्रदेश में राज्यपाल शासन लग गया है। कहने का तात्पर्य प्रदेश में रत्ती भर सुधार नहीं हुआ है। एक बार फिर जम्मू-कश्मीर में वे स्वयं को आतंकियों के बढ़ाव, सामाजिक अस्थिरता तथा राजनीतिक अनिश्चितता के भंवर के केंद्र में फंसे महसूस कर रहे हैं। दस साल के बाद भी एक गवर्नर के रूप में प्रदेश की यह स्थिति उन्हें असफल साबित करने के लिए काफी है।

लेकिन वोहरा से ज्यादा सवाल आठ भाजपा पर खड़े हो रहे हैं। आखिर क्यों भाजपा ने गवर्नर की नाकामियों को अपनी नाकामी बनने दिया? क्यों नहीं भाजपा उनकी जगह किसी सशक्त शख्सीयत को राज्यपाल बनाकर जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात को काबू करने का प्रयास किया? क्या कांग्रेस के भरोसेमंद होने की वजह से वोहरा ने जम्मू-कश्मीर को यथास्थिति से आगे बढ़ने ही नहीं दिया? जिसका परिणाम प्रदेश और देश की जनता को आज देखने को मिल रहा है।

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अब जब वोहरा का दूसरा कार्यकाल खत्म ही होने वाला है ऐसे में देखना है कि मोदी सरकार वोहरा को हटाने का कठिन फैसला लेती है या फिर अमरनाथ यात्रा श्राइन बोर्ड के प्रमुख होने के नाते अमरनाथ यात्रा तक वोहरा को फिर से जीवनदान मिल जाता है? वोहरा के होते हुए जम्मू-कश्मीर में दो ऐसे फैसले लिए गए हैं अगर भाजपा समय रहते नहीं चेतती तो जम्मू-कश्मीर के साथ ही पूरे देश में उसे नुकसान उठाना पड़ता।

सबको मालूम हो कि प्रदेश के राज्यपाल ही जम्मू-कश्मीर स्थित माता वैष्णो देवी मंदिर श्राइन बोर्ड तथा अमरनाथ यात्रा श्राइन बोर्ड के पदेन अध्यक्ष होते हैं। पिछले दिनों माता वैष्णो देवी मंदिर श्राइन बोर्ड के विभिन्न पदों पर 400 मुसलमानों की नियुक्ति कर दी गई है। इतना ही नहीं पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने आईएसआईएस खूंखार आतंकी संगठन के हमदर्द एक धार्मिक संगठन को श्रीनगर में स्थाई इदगाह बनाने के लिए साढ़े छह एकड़ जमीन का प्रस्ताव मंजूर कर दिया था। भाजपा ने दोनों कदमों की न सिर्फ आलोचना की है बल्कि उसका विरोध किया है। महबूबा मुफ्ती सरकार से समर्थन वापस लेने के और भी बहुत कारक हो सकते हैं लेकिन तत्कालीन कारणों पर गौर करें तो यही सबसे महत्वपूर्ण और तात्कालिक कारण है।

अब एक और सवाल उठता है कि इस प्रकार भाजपा के नीतिगत विचारों के खिलाफ इस प्रकार के कदम उठाने वाले राज्यपाल को मोदी सरकार और मौका देगी? क्योंकि पिछले चार सालों तक अपनी गलती को नहीं सुधार पाई मोदी सरकार अब अगली गलती करने की स्थिति में नहीं है। चाहे स्थिति कितनी ही विषम क्यों न हो वोहरा को तीसरा जीवनदान देना, भाजपा के लिए आत्महत्या जैसा कदम होगा। अब मोदी सरकार पर निर्भर करता है कि वह कौन रास्ता अखियार करती है?

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URL: Even after 10 years, why Congress-appointed governor NN Vohra in Jammu and Kashmir

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