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मुगलों का झूठा महिमामंडन कब तक?

एनसीईआरटी की कक्षा बारह की इतिहास की पुस्तक में एक नहीं बल्कि कई स्थानों पर या कहें सम्पूर्ण मुग़ल इतिहास का जमकर महिमामंडन किया गया है, और अब यह प्रमाणित हो गया है कि यह जानबूझकर किसी एजेंडे के अंतर्गत किया गया है।

इसी पुस्तक में महाभारत के विषय में न केवल भ्रामक अपितु पूरी तरह से झूठे तथ्यों को प्रस्तुत किया गया है। एकलव्य के उदाहरण के बहाने ब्राह्मणों को बदनाम करने का षड्यंत्र किया गया है। 

इस अध्याय को जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर कुनाल चक्रबर्ती ने लिखा है, जिन्होंने एकलव्य के विषय को जाति से जोड़कर एकदम ही अलग मोड़ दे दिया है।

जबकि महाभारत में यह कहीं पर भी नहीं लिखा है कि उन्होंने जाति के आधार पर अंगूठा माँगा था। द्रोणाचार्य एक राजवंश के राजकुमारों को प्रशिक्षित करते थे और उसके लिए उन्हें वेतन प्राप्त होता था, वह प्रतिज्ञा, कार्य दोनों में ही बंधे हुए थे।

क्या आज कोई भी विश्वविद्यालय अपने लिए बनाये गए पाठ्यक्रम पर किसी ऐसे व्यक्ति को डिग्री दे देगा, जिसने स्वाध्ययन कर ज्ञान अर्जित किया है और उसके नाम का गलत प्रयोग कर रहा है। वह पेनाल्टी लगाएंगे।

महाभारत के यही श्लोक इस झूठ का पर्दाफ़ाश कर देते हैं, जबकि महाभारत लिखने वाले वेदव्यास स्वयं ही एक निषाद कन्या अर्थात सत्यवती के पुत्र थे तथा यही सत्यवती महाराज शांतनु की भी पत्नी थीं। 

कुनाल चक्रबर्ती ने महाभारत को तथा महाभारत के माध्यम से हिन्दू समाज को नीचा दिखाया है और बच्चों के दिमाग में जहर भरा है।

जैसे ही थीम 1 समाप्त होता है, अर्थात हिन्दुओं के इतिहास वाला भाग समाप्त होता है, और मुसलमान इतिहास भारत में शुरू होता है, वैसे ही इस पुस्तक को पढ़कर ऐसा लगता है कि एक स्वर्ण युग में आ गए हों।

विश्व के सबसे बड़े महाग्रंथ महाभारत के लेखक के विषय में कुनाल चक्रबर्ती ने एक भी शब्द नहीं लिखा है, बल्कि इसे एक हज़ार वर्षों तक लगातार लिखे जाने की प्रक्रिया कहा है,

परन्तु फिर भी एक भी लेखक के विषय में कुछ नहीं कहा है, न ही उनके भाषा कौशल पर और न ही ज्ञान पर! हाँ, जहाँ ऐसा लगा कि जहाँ उगला जा सकता है, वह ले लिया।

मगर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में रीडर फरहत हसन को पूरी तरह से पता है कि कैसे मुस्लिम यात्रियों ने हिन्दुस्तान तक की यात्रा की। वह लिखते हैं कि इब्नबतूता, मुहम्मद बिन तुगलक के बारे में यह सुनकर आया था कि वह कला और साहित्य के संरक्षक है।

जबकि यह बात लगभग हर इतिहासकार मानते हैं कि भारतीय इतिहास में मुहम्मद बिन तुगलक से बड़ा सनकी सुलतान नहीं हुआ जिसने न केवल अपने पिता, सौतेली माँ और भाई का निर्ममता से क़त्ल किया बल्कि साथ ही वह दिल्ली की जनता को दंड देने के लिए राजधानी दौलताबाद लेकर गया। 

इब्नबतूता का लिखा रेहाला ही सुल्तान तुगलक की क्रूरता की दास्ताँ बताने के लिए पर्याप्त है।  मगर फरहत हसन उसे नहीं लिखते! बल्कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों की क्रूरता बिलकुल भी इस किताब में नहीं है।

परन्तु मुग़ल काल की भव्यता अवश्य ही इस पुस्तक में इतनी अधिक है कि स्वयं इतिहास भी लज्जित हो जाए। जिस देश में ईसापूर्व में ही वेद, महाभारत, अभिज्ञान शाकुंतलम, नाट्यशास्त्र, चरक संहिता जैसे ग्रन्थ लिखे जा चुके थे,

उस देश के इतिहास में मुग़ल काल में लिखी जा रही किताबों के विषय में विस्तार से बताया गया है, एवं भाग 1 में किसी भी ऐसी पुस्तक का उल्लेख तक नहीं है जिससे हिन्दुओं की प्रतिभा का भान हो।

अबुल फजल द्वारा कुछ बेहद ही सुन्दर शब्दों का प्रयोग इस पुस्तक के अध्याय 9 (भाग-II अध्याय 5) में किया गया है। आइये देखते हैं:

यह बात एक बार और निश्चित है कि जब भी जैसे भी उद्धरण दिए गए हैं, बिना संदर्भों के दिए गए हैं। जहाँ तक मुझे लगता है यदि यही पूछा जाए कि अबुल फजल ने यह कब और कहाँ लिखा तो इसका उत्तर भी “पता नहीं” में आएगा।

इसी प्रकार अबुलफजल के बहाने से महामहिम अर्थात अकबर के विषय में जो कहा गया है, उसका स्रोत भी नहीं दिया है

फिर कहा गया है कि समय के साथ शरिया की व्याख्याओं में बदलाव आया।” जबकि इसका कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है क्योंकि शरिया की व्याख्या ईरान से लेकर भारत और अमेरिका तक एक ही हैं।

आगे लिखा है कि मुगल राजाओं को सीधे ईश्वर से कई शक्ति मिली थी। दरबारी इतिहासकारों द्वारा वर्णित दंतकथाओं में से एक मंगोल रानी अलानकुआ के कहानी है, जो अपने शिविर मने आराम करते समय सूर्य की एक किरण द्वारा गर्भवती हुई थी।

क्या हम लोग इतिहास के नाम पर इतनी अंधविश्वास पूर्ण चीजें पढ़ सकते हैं? और क्या यह चीज़ें पढाए जाने लायक हैं? यह हमारे बच्चों के दिमाग में क्या अंधविश्वास भरती होंगी?

इसी प्रकार एक और झूठ का नमूना देखिये, सुलह-ए-कुल: एकीकरण का एक स्रोत? यह क्या था? क्या अकबर ने महाराणा प्रताप के साथ जो किया वह इसी सुलह का परिणाम था?

और इसी सुलह –ए कुल में सबसे बड़ा झूठ लिखा है कि मुगलों ने युद्ध के दौरान नष्ट हुए मंदिरों का निर्माण कराया। जिसके विषय में एनसीईआरटी ने यह स्पष्ट किया है कि इस बात का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

यह पुस्तक आगे भी इसी प्रकार के झूठों से भरी पड़ी है।

इस पूरी पुस्तक में हिन्दू साम्राज्य के नाम पर मात्र विजय नगर का उल्लेख है। और जब हम इसी अध्याय में आगे बढ़ते हैं, तो एक और झूठ से रूबरू होते हैं, वह है हरम!

मजे की बात है कि हरम  में स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों पर कुछ भी नहीं लिखा गया है, कैसे हरम की रक्षा के लिए लड़कों को हिजड़ा बनाया जाता था और कैसे हज़ारों औरतों का शोषण इन हरमों में किया जाता था। 

इन मुगलों का महिमामंडन तो है ही, पर साथ ही समस्त हिन्दू नायक गायब हैं, शिवाजी नहीं हैं, महाराणा प्रताप नहीं हैं, तुगलक द्वारा किए गए अत्याचार नहीं है, अकबर द्वारा बनाई गयी सिरों की मीनार के उल्लेख नहीं है,

अकबर को गाजी क्यों कहा गया, इसका कोई उल्लेख नहीं है! जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब ने कैसे अपने ही भाइयों के खून बहाकर सत्ता पाई, यह उल्लेख नहीं है। कैसे रजिया को उसके अपने ही भाइयों ने मार डाला, यह उल्लेख नही है।

क्या इतिहास मात्र मुगलों का महिमामंडन है? शायद हाँ, जब तक वह लोग अध्यक्ष या सलाहकार हैं जो भारत के इतिहास को मौर्यकाल से आरम्भ हुआ मानते हैं और यह मानते हैं कि सनातन धर्म है ही नहीं!

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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