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भविष्य की फिल्म पत्रकारिता किसी ‘पोर्न उपन्यास’ से कम नहीं होगी

विपुल रेगे। लगभग एक दशक से ये समझा नहीं गया है कि फिल्मों की पत्रकारिता के लिए ऐसे लोग होना चाहिए, जिन्हें फिल्म माध्यम की थोड़ी समझ हो और वे गॉसिप के स्थान पर फिल्मों को लेकर रचनात्मक पत्रकारिता करते हो। फिल्मों के समाचार इन दिनों एजेंसी से जारी होते हैं और बचा हुआ कार्य नौसिखिये फिल्म पत्रकार कर रहे हैं। ये ऐसे पत्रकार हैं, जिन्होंने फिल्मों को लेकर कभी ‘फिल्म एप्रिसिएशन’ का साधारण कोर्स तक न किया है।

विगत छह वर्षों से फिल्मों को लेकर दर्शक की समझ बहुत बदल गई है। देश के बहुसंख्यक दर्शक को समझ आया कि अभिव्यक्ति का ये उत्कृष्ट माध्यम अब सांस्कृतिक आतंकवाद के लॉन्च पेड में परिवर्तित हो चुका है। यही दृश्य वर्तमान फिल्म पत्रकारिता का हो रहा है। नब्बे के दशक तक फिल्म पत्रकारिता भाषाई दृष्टि से आज की तुलना में बहुत साफ़-सुथरी थी।

गॉसिप तब भी थे किन्तु पत्रकारिता अर्द्ध नीली फिल्मों की तरह अनुभव नहीं होती थी। नब्बे के दशक के बाद एक परिवर्तन और देखा गया। समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने समाचारों में भाषा के प्रयोग को लेकर अतिशय स्वतंत्रता प्रदान कर दी। इसके पीछे सोच ये थी कि युवा वर्ग को समाचार पढ़वाने के लिए ऐसी स्तरहीन भाषा की आवश्यकता है।

एक बड़े समाचार पत्र ने ये परंपरा शुरु की थी और बाद में सभी मीडिया संस्थान इसके पीछे हो लिए। यदि ये इस स्तर से और नीचे गिरते हैं तो विचारवान पाठक अखबार पढ़ना ही बंद कर सकते हैं क्योंकि अब बात धैर्य और सीमा पार हो चुकी है। 3 फरवरी को जागरण समूह ने बॉलीवुड का एक समाचार छापा है। इसका शीर्षक है ‘निया शर्मा का बेदह बोल्ड डीप नेक ब्लाउज में फोटोशूट हुआ वायरल, चौथी तस्वीर पर टिकी सबकी नजरें।’

ये केवल जागरण ही नहीं कर रहा है अपितु लगभग सभी मीडिया संस्थान इस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। नवभारत लिखता है  ‘नवाजुद्दीन के घर पहुंचीं कंगना रनौत ने लूटी महफिल, सुर्ख लाल लबों से हटी नहीं नजर।’ पत्रिका अख़बार तो और भी आगे गया है और उसने एक समाचार का शीर्षक दिया है ‘Oo Antava वाली Samantha के शरीर पर हैं 3 टैटू, एक्‍स हसबैंड नागा चैतन्‍य से है कनेक्‍शन।’

ज़ी न्यूज़ का शीर्षक है ‘उर्फी की बहन भी बोल्डनेस के मामले में नहीं किसी से कम, छोटे कपड़ों में शेयर करती हैं फोटोज।’ हिन्दी भाषा की गरिमा तो एक तरफ रह गई है और शालीनता का तो यहाँ कोई अर्थ ही नहीं है। यदि बॉलीवुड की ओर से भारतीय समाज पर सांस्कृतिक आतंकवाद का आक्रमण हो रहा है तो हमारे मीडिया संस्थान भी कहाँ किसी से कम दिखाई दे रहे हैं।

पत्रकारिता की नई पीढ़ी को भाषा के प्रयोग में अतिशय स्वतंत्रता देने का परिणाम आज हमारी आँखों के सामने है। यहाँ खोजी पत्रकारिता तो बंद ही हो चुकी है। किसी आने वाली फिल्म को लेकर पत्रकार एजेंसी की पकी-पकाई ख़बरों की प्रतीक्षा करते हैं। अश्लीलता मात्र एक दशक में इस रुप में हमारे सामने है। यदि अब भी मीडिया के नीति-निर्धारक और सरकार इस पर कोई गंभीर निर्णय नहीं लेती, तो भविष्य की फिल्म पत्रकारिता किसी ‘पोर्न उपन्यास’ से किसी भी मामले में काम नहीं रहेगी।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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