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अनुभव सिन्हा का ‘मुल्क’ हमारा भारत नहीं हो सकता!

सोलह निर्दोष लोगों को बम विस्फोट में मार देने वाले आतंकी की मुवक्किल पुलिस अधिकारी से पूछती है ‘आप उसे गिरफ्तार कर सकते थे, फिर भी गोली मारकर हत्या कर दी।’ इस फ़िल्मी कोर्ट में बहस इस बात पर नहीं होती कि उन सोलह निर्दोष लोगों को न्याय क्यों नहीं मिल रहा। बहस इस बात पर होती है कि एक युवा आतंकी का एनकाउंटर क्यों किया गया। इस बात पर बहस नहीं होती कि इन भटके हुए नौजवानों की परवरिश में क्या कमी रह जाती है जो ये अपने ही देश के लोगों को मारने चल पड़ते हैं। ये फ़िल्मी कोर्ट है जो आतंकी बनने पर बहस नहीं करती लेकिन इस बात पर जरूर बहस करती है कि हर बार टारगेट मुस्लिम ही क्यों होता है।

निर्देशक अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘मुल्क’ कल्पना और सच्चाई का अफलातूनी कॉकटेल है। एक घटना में पिता ने अपने आतंकी बेटे का शव लेने से मना कर दिया था। फिल्म की कहानी में यहीं एक मात्र सच है, बाकी कहानी में काल्पनिक तथ्यों का इस्तेमाल कर निर्देशक अपनी मंशा जाहिर कर देते हैं। कहानी का ताना-बाना भी ऐसा बुना, जो बेहद नकली और सतही प्रतीत होता है। शाहिद अली मोहम्मद जम्मू-कश्मीर में बाढ़ पीड़ितों के लिए पैसा जमा कर रहा है। पैसा जमा करते-करते वह बंदूक उठा लेता है। क्यों उठा लेता है, स्पष्ट नहीं किया गया। जब वह समाज सेवा करना चाहता था तो अपने ही देश के लोगों को क्यों मारा। क्या वह शेष भारत को गैर मुल्क मानता है। निर्देशक ने उसकी जिहादी सोच को विभिन्न कारणों के पीछे छुपाने की कोशिश की है लेकिन वे नहीं जानते कि आतंक से कई बार छलनी हो चुका ये देश उन ‘फटे-उधड़े कारणों’ के पार जिहादी सोच को देख सकता है।

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फिल्म के संवाद बेहद आपत्तिजनक हैं। आश्चर्य सेंसर बोर्ड ने फिल्म को कैसे क्लियर हो जाने दिया। ‘सरकार परेशान करती है, कश्मीरी मुसलमानों की मदद करो तो सताती है सरकार।’ ‘ऊँची जाति का अन्याय और आदिवासियों की मौत क्या आतंकवाद नहीं है’। ‘टारगेट हमेशा मुस्लिम होते हैं इसलिए स्क्वॉड में मुस्लिम कम होते हैं’। ‘गाँधी को ब्राम्हण ने नहीं एक इंसान ने मारा था’। ‘जिस समाज में बच्चे ज़्यादा होते हैं वहां शिक्षा का स्तर कम होता है तो इस बात पर अदालत में बैठे लोग हँसते क्यों हैं।

फिल्म के कसीदे गढ़ते हुए वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने लिखा है ‘ ये फिल्म शाहिद और गोड्से को आमने सामने रख देती है। चौबे जी और मोहम्मद अली को रख देती है। दोनों के गुमराह बच्चों को सामने रख देती है। फिर इन सबको दर्शकों के सामने रख देती है। इस पत्रकार की जो सोच है, वही सोच इस फ़िल्मकार की है। दोनों ही येन केन प्रकारेण उन सोलह निर्दोष लोगों की मौत को ताक पर चढ़ाकर न्याय व्यवस्था की कॉलर पकड़ कर पूछना चाहते हैं ‘सोलह निर्दोष मरे तो मरे लेकिन एक आतंकी को क्यों मारा गया’।

इन्दौर के एक मल्टीप्लेक्स में शुक्रवार के पहले शो में केवल पांच दर्शक जुटे। उधर देश के फिल्म समीक्षकों ने मुल्क को अद्भुत फिल्म बता दिया। दरअसल मीडिया ऐसा कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता, जिसके जरिये उसे मुस्लिम तुष्टिकरण का मौका मिलता हो। फिल्म निर्माण की कसौटी पर कस लीजिये, ये फिल्म एक मज़ाक नज़र आएगी। स्क्रीनप्ले कन्विंसिंग नहीं है। घटनाओं को जबरन डाला गया है ताकि शाहिद की मौत को शहादत बताया जा सके। फिल्म इतनी बुरी है कि इंटरवल के बाद सोलह लोगों की मौत का जिक्र तक नहीं किया जाता जबकि पूरी फिल्म का आधार ही उस घटना को बनाया गया। शाहिद का पिता फटेहाल पाकिस्तान में रहने वाली अपनी बहन से एक लाख रुपया हवाला के जरिये मंगवा रहा है क्योकि उसको व्यापार में बहुत घाटा हुआ है। ये फिल्म है या भद्दा मज़ाक।

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कानपुर के जिस आतंकी सैफुल्लाह पर ये फिल्म बनाई गई है, उसके पिता का कहना है कि वे अपने बेटे को भूल चुके हैं। इस केस के वकील का कहना है कि फिल्म की कहानी बस एक समुदाय पर थोपी जा रही है। फिल्म में दिखाया गया कि आतंकी के चाचा की पुलिस कस्टडी में मौत हो जाती है जबकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ था। निर्देशक एक सच्ची घटना से प्रेरित होते हैं लेकिन दर्शक की सहानुभूति लेने के लिए सच्ची कहानी में झूठे तथ्य बेशर्मी के साथ डालते हैं। कानपुर के दर्शकों ने पहले शो के बाद ही फिल्म को नकार दिया। वे एक आतंकी पर सच्ची फिल्म देखना चाहते थे लेकिन उन्हें तो एक समुदाय की ‘तर्कहीन तरफदारी’ देखने को मिली।

फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा मुल्क को पाकिस्तान में बैन किये जाने से बड़े निराश हुए हैं। उन्होंने सीधे तौर पर पाकिस्तानी जनता से अपील की है कि वे गैरकानूनी ढंग से ये फिल्म देखें। समझ में आता है कि आतंक को ‘जस्टिफाई’ करने वाली फिल्म एक आतंक फ़ैलाने वाले देश में बैन हो गई इसलिए वे निराश हैं। पहले दिन मात्र डेढ़ करोड़ की कमाई करवाकर देश ने इस निर्देशक को पुख्ता सन्देश दिया है। मज़ा तो तब है कि ऐसी वितृष्णा फैलाने वाले निर्देशक की लानत-मलानत देश की जनता खुद करे।

नोट: अनुभव सिन्हा की मुल्क को आप नीचे के लेख द्वारा ज्यादा बेहतर समझ सकते हैं

बॉलीवुड का अपराधियों के लिए हमदर्दी पैदा करने की दिशा में अगला कदम है अनुभव सिन्हा की आगामी फिल्म ‘मुल्क’!

मोहम्मदी हिस्टीरिया’ के दौरे से गुजरता बॉलीवुड!

URL: Film review ‘Mulk’- is this a movie or a bad joke?

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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