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अल्पसंख्यकों के नाम पर दोहरी नीति क्यों? दशकों से कई राज्यों में बहुसंख्यक मुसलिमों को मिल रहा अल्पसंख्यकों का लाभ!

देश के जिन आठ प्रांतों में हिंदू अल्पसंख्यक है उनमें लक्ष्यद्वीप, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर और पंजाब शामिल है।लेकिन इनमें से किसी राज्य में हिंदुओं को अल्पसंख्यक होने का दर्जा नहीं मिला है। इसी कारण इन प्रदेशों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग जोड़ पकड़ने लगी है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार देश के आठ प्रदेशों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं, लेकिन आज तक न तो उन्हें अल्पसंख्यकों का दर्जा मिला है न उसका कोई लाभ! जम्मू-कश्मीर शुरू से ही मुसलिम बहुल प्रदेश है। 2011 की जनगणना के मुताबिक वहा 68.30 प्रतिशत मुसलिम आबादी है। इसके बावजूद दशकों से वहां के बहुसंख्यक मुसलमानों को केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार की अल्पसंख्यक योजनाओं का लाभ मिल रहा है। लेकिन महज 28 प्रतिशत हिंदू आबादी होने के बावजूद वहां के हिंदुओं को न तो अल्पसंख्यकों का दर्जा मिला है न ही उसका लाभ।

मुख्य बिंदुदु

* नोटिस के जवाब नहीं देने के लिए केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार पर सुप्रीम कोर्ट ठोक चुका है 15,000 जुर्माना
* 14 जून को एनसीएम की बैठक में आठ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने पर होगा फैसला

कांग्रेस ने हमेशा ही अपने वोट बैंक के चलते हिंदुओं के साथ विश्वासघात किया है। जिस संविधान की आज कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष माला जपता है, उसी संविधान में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक शब्द का जिक्र कहीं भी नहीं है। लेकिन कांग्रेस ने अपना मुसलिम वोट बैंक मजबूत करने के लिए मुसलिम तुष्टीकरण के तहत 1993 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन कर समाज को बांटने का काम किया। वोट बैंक के रूप में उसे तत्कालिक लाभ जो भी मिला हो लेकिन आक्रोश का बीज हमेशा के लिए पड़ गया। जब देश में संघीय प्रणाली काम कर रही है तो फिर उस राज्य में भी उस समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए जिसकी आबादी कम है। लेकिन इस मसले पर कांग्रेस ने अभी तक चुप्पी साध रखी है। सामाजिक असामनता का बोया बीज आज आक्रोश का रूप ले चुका है।

लक्ष्यद्वीप में तो 96 प्रतिशत आबादी मुसलिमों की है फिर वहां हिंदू अल्पसंख्यक नहीं बहुसंख्यक है। जम्मू-कश्मीर में 68.3 फीसद आबादी वाले मुसलिमों को अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है। लेकिन अभी भी कुछ लोग इस पर राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे। तभी तों राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील माजिद मेमन का कहना है कि चूंकि पूरे देश में हिंदू बहुसंख्यक हैं इसलिए किसी राज्य में अल्पसंख्यक होने के बावजूद उसकी गिनती बहुसंख्यक में ही होगी। अब इस मूढ़ नेता को कौन समझाए कि हमारे देश में संघीय कानून व्यवस्था है। जबकि जम्मू-कश्मीर के ही पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के विधायक जावेद बेग का कहना है कि राज्य में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

इसी मामले में भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में देश के आठ प्रांतों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग को लेकर जनहित याचिका दायर की थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस मामले को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (एनसीएम) के पास भेज दिया गया। आठों राज्यों में हिंदुओं की स्थिति का जायजा लेने के लिए एनसीएम ने एक उप-समिति कठित कर दी। उप समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली है और 14 जून को उसकी बैठक होने वाली है। इस बैठक में अश्विनी उपाध्याय को भी बुलाया गया है। बताया जा रहा है कि इसी बैठक में उनआठ प्रदेशों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने पर फैसला होगा जिनमें उनकी आबादी कम है।

इसी मामले को लेकर जम्मू-कश्मीर के रहने वाले अंकुर शर्मा, जो पेशे से वकील हैं, ने भी सुप्रीम कोर्ट में जम्मू-कश्मीर में बहुसंख्यक होने के बावजूद मुस्लिमों को मिल रहे अल्पसंख्यक योजनाओं के लाभ के खिलाफ जन हित याचिका दायर की थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तो केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रदेश सरकार पर 15-15 हजार का जुर्माना भी ठोका था। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के पूछे सवाल का दोनों सरकारों ने जवाब ही नहीं दिया था।

अंकुर शर्मा ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार की अल्पसंख्यक योजनाओं के तहत अनुचित और मनमर्जी तरीके से मिल रहे लाभ को निरस्त करने की मांग की थी। उन्होंने अल्पसंख्यक होने के नाम पर बहुसंख्य मुसलिम के लिए चलाई जा रही सारी योजनाओं को ही बंद करने की मांग की थी। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और प्रदेश सरकार से इसका जवाब देने को कहा था। लेकिन दोनों में से किसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जवाब देना भी उचित नहीं समझा।

शर्मा ने अपनी याचिका में कई साक्ष्य भी पेश किए थे। उन्होंने लिखा था राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (एनसीएम) कानून 1992 के तहत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिसूचित होने के बावजूद उसे जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं किया गया है। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय से 2007-08 में जारी 753 छात्रवृत्ति में से 717 बहुसंख्यक मुसलिम समुदाय के छात्रों को मिली। शेष 36 में से 2 क्रिश्चियन समुदाय को, 22 बुद्धिस्टों को और 12 सिक्खों को मिली। लेकिन हिंदू समुदाय को एक भी छात्रवृत्ति नहीं मिली। वह इसलिए क्योंक हिंदू राज्य में अल्पसंख्य है ही नहीं। जबकि उसकी आबादी महज 28 प्रतिशत है।

अंकुर शर्मा ने अपनी याचिका में अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री के नए 15 सूत्री कार्यक्रमों को लागू करने के लिए जारी दिशानिर्देश पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि चूंकि एनसीएम एक्ट 1992 के तहत प्रदेश में बहुसंख्यक समुदाय ही अल्पसंख्यक के रूप में अधिसूचीत है इसलिए इस कार्यक्रम को तत्काल प्रभाव से बंद कर देना चाहिए।

URL: For decades, Muslims majority getting benefit of minorities in many states

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