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जलीकट्टू पर रोक का निर्णय कराने और देने वालों का मानस कुछ ऐसे ढंग से हो रहा है तैयार!

अम्बा शंकर बाजपेयी। जब JNU में “महिषासुर सहादत दिवस” एवं “बीफ-पोर्क फेस्टिवल्स” जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत हुई तो इनका विस्तृत अध्ययन किया गया, क्या कारण है महिषासुर-यादवों के पूर्वज हो गए! अशोक-कुशवाहा समुदाय के पूर्वज हो गए! चन्द्रगुप्त मौर्य-मौर्य समुदाय के पूर्वज हो गए! संत रविदास-चमार समुदाय के पूर्वज हो गए! कबीर-बाल्मीकियों के हो गए!

एक बात जान लीजिये भारत के शिक्षण संस्थानो, सांस्कृतिक संस्थानो के पाठ्क्रमो में क्रिस्चियन थियोलॉजी की घुसपैठ करा दी गयी है! इन्ही संस्थानो से अध्ययन करने के उपरान्त तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भारत के नौकरशाही, न्यायपालिका और विधायिका में जाते हैं और देश की सुरक्षा एजेंसीज (RAW, IB, NTRO) में भी जाते हैं। क्रिस्चियन थियोलॉजी पढ़े ऐसे लोग जलीकट्टू को बैन करने का निर्णय देते हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। आपको ‘बिनायक सेन’ वाला मामला याद रखना चाहिए! दूसरी बात भारत के शिक्षण संस्थानो में सेकंड हैण्ड इसाई, क्रिप्टो-क्रिस्चियन, वामपंथी एवं बड़ी बिंदी गिरोह ऐसी ही रिसर्च करवाता है। ‘भारत की संस्कृति-परम्पराएँ एवं रीतिरिवाज’ (ट्रेडिशन,कस्टम एंड रिचुअल्स) को असांस्कृतिक एवं अवैज्ञानिक तथा स्त्री विरोधी (शारीरिक शोषण) सिद्ध करता है ताकि भारत की सनातन-संस्कृति को नष्ट किया जा सके!

दरअसल भारतीय सभ्यता पर सदा से आक्रमण होते आ रहे हैं और बदस्तूर जारी हैं ताकि यहाँ की गौरवशाली संस्कृति रीतिरिवाजों को तहस-नहस किया जा सके! ठीक इसी प्रकार से वामपंथियों,मिशनरियों का फेंका जाल कभी जेएनयू जैसी वामपंथी संस्कारों की शाला से ‘किस ऑफ लव’ कभी बेखोफ आज़ादी और कभी फ्री-सेक्स ‘मेरा शरीर मेरा अधिकार’ जैसे नारों से आपके घरों और समाज में दस्तक देता हैं ताकि आपकी घर की महिलायें या तो पीढी का निर्माण ही नहीं कर सके और अगर करे तो सिर्फ वामपंथी,क्रिप्टो-क्रिस्चियन ही पैदा करे। अपनी यौन उत्कंठाओं को आज़ादी से जोड़ कर ऐसे कितने भीतरघाती, निजी स्वतंत्रता के नाम पर भारतीय संस्कृति को भ्रष्ट करने के लिए घात लगाए बैठे हैं। जरुरत है आंखें खुली रखकर उनको देखने और समझने की!

चर्च मिशनरीज भारत के त्योहारों, रीतिरिवाजों और परम्पराओं पर आंखें गड़ाए बैठा है! तमिल सभ्यता में प्राचीन काल से आ रहा जल्लीकुट्टू खेल से ज्यादा भावनाओं से जुड़ा है लगभग 5 हजार साल का इतिहास समेटे यह परंपरा पोंगल के अवसर पर भारत में चर्चित होती है। भावना इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि जलीकट्टू के लिए सड़कों पर निकल यह जन-सैलाब राजनीति से प्रेरित तो बिलकुल नहीं लगता यह विशुद्ध लोगों की भावनाओं से जुड़ा है जो बिना किसी नेतृत्व के सड़को पर अपनी परंपरा और इतिहास के लिए संघर्ष कर रहा है। शायद उन्हें लगा रहा है कि उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के पीछे कोई सुनयोजित षडयंत्र काम कर रहा हो!

विश्व में कितनी सभ्यतायें अपनी चरम पर पहुंची और मिट गयी लेकिन भारतीय संस्कृति के पीछे का वैज्ञानिक आधार इसको आज भी विश्व में सिरमौर बनाता है। जलीकट्टू परंपरा के पीछे वैज्ञानिक कारण हैं कि इससे एक उन्नत प्रजाति के सांड का चुनाव करना जो एक उन्नत विशुद्ध देशी गौवंश की पीढ़ी का निर्माण करे। मेरे लिए गाय मतलब भारतीय देशी गाय जिसका दूध जीवन दायनी है। जलीकट्टू पर प्रतिबन्ध लगाने के पीछे कारण यही है कि उन्नत किस्म के गौवंश का निर्माण न हो और देशी गाय ख़त्म हो और इन गायों की जगह आप जर्सी जैसी विदेशी और मिक्स प्रजाति की गाय पालने के लिए मजबूर हों! मतलब साफ है कि पश्चिमी सभ्यता का सप्लीमेंट आपकी रग-रग में पहुँच जाये! वरन क्या कारण है जो जल्लीकुट्टू जैसे पौराणिक महोत्सव पर peta के कहने पर रोक लगा दी जाये?

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