माओवादी यौन शोषण की शिकार एक नक्‍सली औरत की कहानी, उसी की जुबानी

उमा 25-30 माओवादियों की कमांडर हुआ करती थी. लेकिन 4 महीने पहले ही ड्यूटी से भाग आई. वहां से ये कह कर निकली कि डॉक्टर को दिखाने जा रही है. कई दिनों तक अपनी मौसी के साथ छिपी रही. और अब ये चाहती है कि दुनिया उसकी कहानी जाने. वो सरेंडर करना चाहती है. नक्सलवाद से सन्यास लेना चाहती है.

माओवादी यौन शोषण की शिकार उमा की कहानी-उमा की जुबानी

“नक्सल संगठन की सदस्‍य बनने के करीब एक साल बाद झारखंड के जंगलों के एक कैंप में मेरी रात भर की ड्यूटी लगाई गई. वहां झारखंड नक्‍सल मिलिट्ररी कमीशन का प्रमुख विकास मौजूद था। अचानक अंधेरे से विकास निकलकर मेरे सामने आ गया। उसने मुझसे पानी लाने के लिए कहा। जैसे ही मैं पानी लाने के लिए मुड़ी, उसने मेरे साथ अश्‍लील हरकत करने की कोशिश की. जब मैंने विरोध किया तो उसने गला दबा कर मुझे मारने की कोशिश की. जान बचाने के डर से मैं चुप रही, जिसके बाद उसने मेरा बलात्‍कार किया. तब मैं केवल 17 साल की थी.

“उसने मुझे धमकी दी कि यदि इसके बारे में मैंने किसी को बताया तो अंजाम बुरा होगा. मैं चुप नहीं रह सकी। मैंने इसके बारे में आकाश को बताया, जो कमिटी के मेंबर हैं और नक्‍सली लीडर किशनजी के करीबी दोस्त हैं. उन्होंने कहा कि वो मामले को देखंगे. परंतु उन्होंने भी विकास के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. खुद आकाश की पत्नी अनु किशनजी की यौन साथी है और उन्‍हीं के साथ रहती है।

“जिन औरतों की भर्ती नक्‍सली ग्रुप में होती है, उनमें से अधिकतर का यौन शोषण सीनियर माओवादी लीडर करते हैं. सीनियर महिला लीडरों के भी एक से ज्यादा यौन साथी होते हैं. अगर कोई महिला सदस्‍य गर्भवती हो जाती है, तो उसे बच्‍चा गिराने के कह दिया जाता है, क्‍योंकि नक्‍सली कमांडर कहते हैं बच्चे ग्रुप के ऊपर बोझ होते हैं जो गुरिल्लाओं के मिशन को खराब करते हैं.

“मैंने दूसरी महिला नक्‍सलियों से भी उनके साथ हुई यौन हिंसा की कहानियां सुनी हैं. एक महिला नक्‍सली सीमा ने मुझे बताया था कि आकाश ने उसका भी बलात्‍कार किया था. एक अन्‍य नक्‍सली राहुल ने हमारे ही ग्रुप के कमांडर मदन महतो की पत्नी जाबा के साथ बलात्‍कार किया था. राहुल माओवादी कैंपों में हथियार चलाना सिखाता है. चूंकि उसने ग्रुप कमांडर की पत्‍नी का रेप किया था, इसलिए उसको सजा भी मिली थी, लेकिन सजा के तौर पर उसे केवल तीन महीने के लिए ट्रेनिंग कैंप से बाहर निकाला गया था। इससे अधिक नहीं।

“एक बड़े लीडर और थे सुदीप चोंग्दर. लोग उन्‍हें गौतम के नाम से जानते हैं. उसे भी बलात्‍कार करने की सजा मिली थी. उसका ट्रांसफर कर दिया गया था. माओवादी अपना समय बांट लेते हैं. आधे समय जंगलों के ट्रेनिंग कैंप में बिताते हैं. और आधा समय गांवों में छिपते हुए गुजारते हैं. गांवों में बंदूक की नोक पर घरों में घुसते हैं. जब सुदीप गांवों में जाता था, तो किसी भी घर में जबरदस्‍ती घुसकर उस घर की औरतों का बलात्‍कार करता था. ग्रामीण महिलाएं नक्‍सलियों का विरोध करने में घबराती हैं, जिसका नक्‍सली कमांडर भरपूर फायदा उठाते हैं।

“कई सीनियर नक्‍सली लीडरों ने मेरा यौन शोषण किया. एक दिन सीनियर लीडर कमल मैती ने मुझे बलात्‍कार से बचाया, लेकिन बाद में उसने इसका भरपूर फायदा उठाया । कमल मैती बंगाल-झारखंड-उड़ीसा कमिटी के मेंबर हैं. एक मीटिंग में कमल ने मुझसे यौन संबंध बनाने की बात की. मीटिंग में किशनजी और सभी बड़े नेता मौजूद थे. उन लोगों ने भी मुझे कमल के साथ यौन संबंध रखने को कहा.

“जाबा के साथ हुए हादसे के बाद मैं जान गई थी कि अगर अकसर होने वाले बलात्‍कार से बचना है, तो किसी बड़े नक्‍सली लीडर का स्‍थाई यौन साथी बनाना होगा. मैंने कमल का यौन पार्टनर बनना स्‍वीकार कर लिया, वह दिन मेरे लिए बड़ा अहम था. उसके बाद से मेरी रैंक बढ़ने लगी.

“जब मैंने माओवादी संगठन जॉइन किया था, CPI-M नहीं बनी थी. मैंने PW (पीपल्स वॉर) जॉइन किया था. जो बाद में MCC (माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर) के साथ मिलकर CPI-M बना. मेरा नाम तब उमा नहीं था. मोटी सी थी मैं. आकाश की पत्नी कहती थी मैं उमा भारती जैसी लगती हूं. इसलिए मेरा नाम उमा रखा गया. मैं पश्चिम मिदनापुर में आदिवासी औरतों को संगठित करती थी. मैंने हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी ली थी.

“औरतें नक्‍सली संगठन में सज-संवर नहीं सकती हैं। कभी कभी औरतें नेलपॉलिश लगाना चाहती थीं, या झुमके पहनना चाहती थीं. लेकिन यह सब तो छोड़ो, हमें खुशबू वाला साबुन लगाने की भी मनाही थी. नहाने के लिए केवल लाइफबॉय साबून ही मिलता था।

“मुझे परिस्थितियों ने माओवादी संगठन को ज्‍वाइन करने पर मजबूर किया. तीन भाई-बहन और थे. हम या तो दूसरों के खेतों में मजदूरी करते थे. या महुआ और लाल चीटियां बीनते थे. मैं पढ़ाई में ठीक थी, लेकिन गणित में कमजोर थी. दसवीं की बोर्ड परीक्षा में फेल हो गई थी. 2002 में नक्‍सली मेरे छोटे भाई को ले गए, लालगढ़ फ़ौज में गया था वो. अब जेल में है. पिता दारूबाज थे. टीबी था उनको. इलाज कराने के पैसे नहीं थे.

“पार्टी वालों ने कहा कि अगर मैं उनके साथ शामिल हो जाऊं तो वो मदद करेंगे. कहा कि काम अच्छा न लगे तो छोड़ देना. काम के लोभ में गई थी मैं. पर बाद में पता चला कि अब वापस लौटना मुमकिन नहीं है. मैं ही क्‍यों, अगर मौका मिले तो बहुत से माओवादी भागना पसंद करेंगे, लेकिन मारे जाने के डर से वे नहीं भाग पाते. सात साल बाद अब मुझे मौत से डर नहीं लगता।”

कौन है उमा

उमा पुलिस की ‘मोस्ट वॉन्टेड’ लिस्ट में है. उस पर पूरे हमलों की एक सिरीज को प्लान करने और उसे अंजाम देने का आरोप है. जिसमें 2010 में हुए 24 EFR जवानों की हत्या, संकरैल पुलिस स्टेशन में घुसकर पुलिसवालों की हत्या करना, और झारखंड से सांसद सुनील महतो के मर्डर का आरोप मुख्‍य है.

उमा PCPA (पीपल्स कमिटी अगेंस्ट पुलिस एट्रॉसिटीज) के मेम्बरों को ट्रेनिंग देती थी. 2009 में लालगढ़ में पुलिस से चली 8 महीनों की लड़ाई में उसके ऊपर पुलिस पर फायर करने का आरोप है. झारग्राम में सब उसे दीदी बुलाते हैं.

साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया ने उमा से मुलाकात की थी। संवाददाता ने उससे पूछा था कि वह आत्‍मसमर्पण क्‍यों करना चाहती है, जिसके जवाब में उमा ने अपनी आपबीती बताई थी।

India speaks daily Bureau- इंडिया स्‍पीक्‍स डेली ब्‍यूरो की टिप्‍पणी:

कहने को शारीरिक आजादी और वास्तव में शारीरिक शोषण- यही शहर से लेकर जंगल तक फैला वामपंथ है!

जो कुछ जंगलों में माओवादी महिलाओं के साथ करते हैं, वही कुछ शहरों में बौद्धिक वामपंथी जमात बेडरूम में करता है! जेएनयू में मैं 2 साल रह चुका हूं, अपने एक दोस्त के साथ, होस्टल में। सबकुछ देखा-जाना है। वहां भी वामपंथी लड़कियों-महिलाओं के साथ वही सब होता है, जो जंगलों में नक्सली अपने ग्रुप की महिलाओं के साथ करते हैं। और जंगल से शहर तक यह सब होता है- शारीरिक आजादी के नाम पर! जिसकी गूंज अभी-अभी आपने लाल सलाम के गढ़ जेएनयू में सुनी हैं- ‘ हमें चाहिए आजादी’।

महिलाओं को शारीरिक आजादी पर लेक्चर देते-देते कब उन्हें शारीरिक शोषण का टूल बना लिया जाता है, उन्हें पता ही नहीं चलता! वो भी मल्टीपल सेक्स पार्टनर रखने, सुट्टा मारने और शराब पीने को आजादी मानने लगती हैं!

बाद में शारीरिक आजादी के नाम पर ही उन्हें पूरी तरह से भोग की वस्तु बना दिया जाता है! उन्हें श्रृंगार से परहेज करना सिखाया जाता है, क्योंकि यह गुलामी है! उन्हें कामरेडों के साथ नग्न होना सिखाया जाता है, क्योंकि यह आजादी है! यही वामपंथ की शारीरिक क्रांति है! महिलाएं कहेंगी- यह मेरा शरीर है, मैं इसके साथ जो चाहे करूं! गंभीरता ओढ़े कामरेड सपोर्ट में नारा लगाएंगे-‘हमें चाहिए आजादी’- और मन ही मन रात का इंतजार करते हैं, क्योंकि एक और आजाद ख्याल कामसाथी उनके लिए तैयार हो रहा होता हैं!

न्यूज चैनलों में एक वामपंथी महिला रेग्यूलर प्रकट होती रहती है। उसका पति जेएनयू में ही पड़ा रहता है। उसका काम लाल सलाम के नाम पर औरतों को शारीरिक आजादी दिलाना- अर्थात् जेएनयू में आई नई लड़कियों को किसी लड़के के साथ इंगेज करना, फिर यह देखना कि 30 दिन से ज्यादा यह इंगेजमेंट न बढ़े, फिर उसे दूसरे लड़के के साथ इंगेज करना, फिर उसे मल्टीपल लड़कों के साथ इंगेज करना और आखिर में कैंपस के बाहर उसे शारीरिक क्रांति करने के लिए भेजना- यह एक व्यक्ति के रैकेट की मुझे जानकारी है। ऐसे कई रैकेटबाज़ वहां भरे पड़े हैं।

बकायदा जेएनयू कैंपस में कंडोम वेंडिंग मशीन तक लगी है। कह सकते हैं यह मशीन कैंपस में रहने वाले शादीशुदा जोड़ों के लिए लगाया गया है! लेकिन यही तो वामपंथी पाखंड है! कथनी-करनी में अंतर! कहने को शारीरिक आजादी और वास्तव में शारीरिक शोषण- यही शहर से लेकर जंगल तक फैला वामपंथ है!

और चलते-चलते लाल सलामी औरतों की इस शारीरिक आजादी का एक सबूत भी दे देता हूं! कोलकाता में अभी हुए टेलीग्राफ के सेमिनार में अनुपम खेर के बोलने के बाद आखिर में जब वामपंथी पत्रकार बरखा दत्त ने अपना स्पीच दिया तो उसमें क्या कहा था, याद है? उसने अभिव्यक्ति की आजादी में ‘किसी के भी साथ सोने की स्वतंत्रता’ की भी वकालत की थी! आप वह वीडियो यू टयूब पर देख व सुन लीजिए! वामपंथियों के लिए यही है असली आजादी, जो वास्तव में उन्मुक्त व उच्छृंखल यौन व्यभिचार के अलावा और कुछ नहीं है! बोलो लाल सलाम!

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