फिल्म उद्योग की दीपावली बंदूक की नाल से छूटी – फिल्म रिव्यू – सांड की आंख

चंदो तोमर और प्रकाशी तोमर की निशानेबाज़ी से प्रभावित होकर अलवर की महारानी ने उनको अपने पैलेस पर एक दावत में बुलाया है। दोनों देहाती महिलाओं को ‘गेस्ट ऑफ़ ऑनर दिया जा रहा है, इसका ठीक-ठीक मतलब भी चंदो और प्रकाशी को मालूम नहीं होता। दावत के बाद टेबल पर सभी मेहमानों के लिए गर्म पानी और नींबू रखे गए हैं। चंदो और प्रकाशी हाथ धोने के बजाय नींबू गर्म पानी में निचोड़ कर पी गई है। जमीन पर सोने वाली महिलाओं को क्या मालूम कि राजसी दावतों में नींबू पीने के बजाय हाथ धोने के काम में लिया जाता है। महारानी अलवर और उनके तमाम मेहमान भौचक्के से उन दोनों को देख रहे हैं। तभी अनपेक्षित सा घटता है। महारानी दोनों देहाती महिलाओं की नकल करते हुए हाथ धोने के लिए लाया गया पानी पी लेती है। ये देख सभी मेहमान उनका अनुसरण करते हैं।

ये एक दृश्य ही ‘सांड की आंख’ की बॉक्स ऑफिस पर सफलता की गारंटी देता है। हरियाणा की मिटटी में पैदा हुई चंद्रो और प्रकाशी जन्मजात निशानेबाज़ थीं, लेकिन उम्र बीत जाने के बाद उन्हें अपने जन्मजात गुण का पता चला। लेखक से निर्देशक बने तुषार हीरानंदानी ने ‘सांड की आँख’ बनाकर हरियाणा की उन ‘शूटर दादियों’ को रचनात्मक सलामी दी है। ‘एमएस धोनी’ के बाद लग रहा है कि एक और निर्देशक में ‘बॉयोपिक’ बनाने की तमीज है। फिल्म मनोरंजक अंदाज में शूटर दादियों के जीवन की किताब के पन्ने खोलती जाती है और दर्शक मंत्रमुग्ध होकर डूबता जाता है। 

फिल्म की कहानी जानने के बजाय आपको चंदो और प्रकाशी की असली कहानी जाननी चाहिए क्योंकि फिल्म में हूबहू वही दिखाया गया है, जो चंद्रो और प्रकाशी के जीवन में घटित हुआ था। बागपत के जौहर गांव में तोमर परिवार की बहू चंद्रो और प्रकाशी की जिंदगी देश की आम घरेलु महिलाओं से मिलती-जुलती है। उन दोनों के जीवन में घर का काम, खेत का काम और बच्चे पैदा करने के सिवा और कुछ नहीं था।

 एक दिन अचानक दादी के भीतर कई साल से छुपी बैठी शूटर दादी बाहर आ जाती है। बेटी को शूटिंग सिखाने ले गई चंद्रो ने शूटिंग रेंज में देखा कि बेटी तो बुलेट भी लोड नहीं कर पा रही है तो ये कहते हुए रिवाल्वर उठा ली कि ‘इसमें क्या ख़ास बात है’। चंद्रो का पहला शॉट ‘बुल्ज आई’ में लगता है। ट्रेनर देखकर हैरान हो जाता है कि जिस बुढ़िया ने कभी बंदूक को हाथ न लगाया हो, उसने पहला शॉट ही ‘बुल्ज आई’ में लगाया है। 

निर्देशक ने इस घटना को फिल्म में जस का तस फिल्माया है। ये एक खेल फिल्म होते हुए भी सामाजिक सरोकार को सामने रखती है। हरियाणा में चले आ रहे लिंग भेद को भावात्मक ढंग उभारती है। चंद्रो को ये पता लगता है कि बेटी यदि शूटर बन जाएगी तो उसे सरकारी नौकरी मिल सकती है लेकिन बेटी पिता से बहुत डरती है।  बेटी को प्रेरित करने के लिए चंद्रो और प्रकाशी खेल के मैदान में उतरती है। चंद्रो-प्रकाशी के जीवन के रेशे-रेशे को आप इस फिल्म के जरिए महसूस कर सकते हैं। उनका जीवन इतना फीका था कि कभी रंगीन गॉगल नहीं देखा था। एक दिन घर में ‘गॉगल और मैडल’ साथ आते हैं लेकिन घर की महिलाओं को ख़ुशी मामूली चश्मों से होती है। 

भूमि पेडनेकर दुर्घनावश अभिनय के क्षेत्र में आईं थी। वे तो फिल्म उद्योग में तकनीक विभाग में थी लेकिन ‘दम  लगा के हईशा’ की सफलता ने उन्हें खुद के भीतर की अभिनेत्री से रूबरू करवाया। चंद्रो की भूमिका के बाद मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि वे ‘स्मिता पाटिल’ जी की रेंज की अभिनेत्री हैं। चंद्रो का रुदन, आक्रोश, बचपना, क्रोध उन्होंने मौलिकता के साथ व्यक्त किया है। उन्होंने इस बॉयोपिक में वहीँ स्थान हासिल किया है, जैसा एमएस धोनी में सुशांत राजपूत ने किया था। इस साल की कुछ प्रभावकारी अभिनय अभिव्यक्तियों की बात करें तो उनमे भूमि को निश्चय ही शामिल किया जाएगा।  तापसी पन्नू का डेडिकेशन देखते ही बनता है। प्रकाशी का व्यक्तित्व उनके अपने आग उगलते व्यक्तित्व से मेल खाता है। इस फिल्म में वे भूमि के बराबर ही रहीं है। 

विनीत कुमार सिंह ने ‘मुक्केबाज़’ फिल्म में दिखाया था कि उनके अंदर एक स्वाभाविक अभिनेता छुपा बैठा है। डॉक्टर यशपाल की भूमिका में वे बहुत प्रभावित करते हैं। मेरे ख्याल में ये वह फिल्म है जो विनीत को  उद्योग में मजबूत आधार देगी। हमें नहीं मालूम था कि प्रकाश झा जैसा होनहार निर्देशक अभिनय भी गहराई वाला कर सकता है। इस फिल्म में उन्हें अभिनय करते देख सुखद आश्चर्य हुआ। उनके खाते में एक लंबा रोल था और साथ ही उन्हें ‘खलनायक’ नज़र आना था। वे खलनायक ही नज़र आए हैं।

कहानी, उसका फैलाव, निर्देशन और अभिनय के नजरिये से देखे तो ‘सांड की आंख’ एक बेजोड़ फिल्म है। दीपावली के मौके पर प्रदर्शित हुई दो अन्य फिल्मों ‘हाउसफुल-4’ और ‘मेड इन चायना’ से दर्शक ने बहुत हाइप लगा रखी थी लेकिन ये फ़िल्में तो दीपावली का फुस्सी पटाखा सिद्ध हुई। इस दफे फिल्म उद्योग की दीपावली बंदूक की नाल से छूटी है। सांड की आंख से फिल्म उद्योग को कोई उम्मीद नहीं थी लेकिन यही फिल्म रेस में आगे निकलती दिखाई दे रही है। आप फिल्मों में सामाजिक मुद्दों और खेल को पसंद करते हैं तो ये फिल्म आपके लिए ही बनाई गई है। आंसू और ख़ुशी का निर्मल आनंद देती है ये फिल्म। ख़ास तौर से महिलाओं को ये फिल्म अवश्य देखनी चाहिए।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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1 Comment

  1. Avatar अमित says:

    सुधार कीजिये। ये दोनों शूटर दादी उत्तर प्रदेश के गाँव जोहड़ी से हैं।

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