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‘गोल्ड’ फिल्म समीक्षा- सिक्कों की खनखनाहट सुनने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलवाड़ जारी है।

यदि कोई मुझसे पूछे कि ‘गोल्ड’ फिल्म का हासिल क्या है, तो मैं बेझिझक ‘सनी कौशल’ का नाम लूंगा। इस फिल्म में अक्षय कुमार के अच्छे अभिनय के अलावा कुछ बहुत अच्छा है तो वे ‘सनी कौशल’ ही हैं। सनी ने फिल्म में ‘हिम्मत सिंह’ का किरदार निभाया है। गोल्ड फिल्म बॉक्स ऑफिस पर साधारण सफलता पाकर गर्दिश में चली जाएगी लेकिन इस बात के लिए याद की जाएगी कि इस फिल्म ने एक सितारे को जन्म दिया था। सनी कौशल ही वह अभिनेता है जो गोल्ड की एकमात्र ‘अच्छाई’ है।

इन दिनों फिल्म उद्योग में एक नए किस्म का ट्रेंड चल पड़ा है। किसी कालखंड की एक ख्यात घटना पर फिल्म बनाने की घोषणा कर दो। घोषणा होने के साथ ही फिल्म के अच्छी कीमत में बिकने का रास्ता साफ़ हो जाएगा। जब फिल्म प्रचारित होने लगे तो असल घटना में शामिल किरदारों के नाम बदल डालो। चाहो तो घटना को ही बदल डालो।

इस ‘सांस्कृतिक घालमेल’ को रोका जाना संभव नहीं है। इसका विरोध करोगे तो ये फ़िल्मकार कोर्ट चले जाएंगे। अभिव्यक्ति की आज़ादी का रोना रोएंगे। यदि इस देश में वाकई सेंसर बोर्ड नामक जागृत संस्था होती तो ‘गोल्ड’ फिल्म इतनी आसानी से प्रदर्शित नहीं हो पाती। ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलवाड़ जारी है। बॉक्स ऑफिस पर सिक्कों की खनखनाहट सुनने के लिए फिल्म निर्माता इतिहास के साथ खेलने को भी तैयार हैं।

निर्देशक रीमा कागटी की फिल्म ‘गोल्ड’ में जब 1936 के ओलम्पिक में हमारे भारतीय खिलाडियों का कारनामा दिखाया जाता है तो गर्व होने के बजाय मन में क्षोभ की लहर दौड़ जाती है। इस सीक्वेंस में विश्व के सबसे महान हॉकी खिलाड़ी ‘मेजर ध्यानचंद’ का जिक्र ही नहीं किया जाता। ध्यानचंद के किरदार को दिखाया तो जाता है लेकिन उसका नाम ‘सम्राट’ होता है।

हिटलर के सामने उसके देश की टीम को रौंदने वाले किसी भी खिलाड़ी का वास्तविक नाम इस सीक्वेंस में सुनाई नहीं देता। एक बार आपको इस बात के लिए माफ़ कर दिया जाए कि आपने सन 1936 और 1948 के वक्त की ओलम्पिक विजेता टीम के खिलाडियों के नाम बदल डाले लेकिन इस बात के लिए कैसे माफ़ करे कि स्वतंत्र भारत की टीम पुनर्गठित करने वाला समर्पित कोच रीमा कागटी की फिल्म में एक शराबी के रूप में प्रस्तुत किया जाए।

स्वतंत्रता दिवस पर प्रदर्शित हुई अक्षय कुमार की ‘गोल्ड’ वैसा निर्मल आनंद नहीं दे पाती, जैसा उनकी पिछली फिल्म ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ ने दिया था। मनगढंत किरदारों वाली ये फिल्म पहले दो घंटे तक अपना मूल उद्देश्य छोड़कर यहाँ-वहां भटकती है और जब तक उद्देश्य स्पष्ट होता है, उकताया दर्शक अपने मोबाइल में व्यस्त हो चुका हो होता है।

रीमा कागटी ने ‘गोल्ड’ के लिए तीर तो चलाया लेकिन वह लक्ष्य नहीं भेद सका। एक खेल फिल्म को खेल की पृष्ठभूमि में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यहाँ निर्देशक कहानी को विभाजन और दंगों के साथ जोड़ देती है। पाकिस्तान के साथ सहानुभूति पैदा करने के लिए बेवजह के दृश्य डालकर फिल्म की लम्बाई बढ़ाती हैं।

1936 के ओलम्पिक का सीक्वेंस आर्ट निर्देशन की दृष्टि से ठीक है। उस दौर का जर्मनी, वहां के लोग, वाहन सभी ओर निर्देशक ने ध्यान दिया है लेकिन इस सीक्वेंस का मुख्य किरदार जो हिटलर की भूमिका निभाता है, बड़ा ही नौसिखिया ले लिया। फिल्म बनाते समय निर्देशक के मन में शिमित अमीन की क्लासिक स्पोर्ट्स फिल्म ‘चक दे इंडिया’ घूम रही थी।

वे कहानी तो 1948 की कहती हैं लेकिन दृश्य चक दे से चुराए लगते हैं। टीम में एकता का अभाव होना, क्षेत्रीयता के लिए राष्ट्रीयता को ताक पर रख देना। एक ख़ास खिलाड़ी को फाइनल के लिए बचाकर रखना। रीमा कागटी ने रोमांच से भरपूर फिल्म बनाने की कोशिश की लेकिन प्रस्तुतिकरण फिर भी रोमांचहीन ही रहा।

फिल्म का अंतिम हॉफ जरूर आकर्षित करता है लेकिन तब तक फिल्म गड्ढे में जा चुकी होती है। फिल्म दर्शक पर से अपनी पकड़ खो देती है। विभाजन का दर्द और पाकिस्तान का एंगल डालने के कारण दर्शक फिल्म में रही-सही रूचि भी खो देता है। फिल्म को पाकिस्तान फ्रेंडली दिखाने के लिए मज़ाकिया से दृश्य डाले गए हैं।

जैसे जर्मनी से सेमीफाइनल में हार चुकी पाकिस्तानी टीम फाइनल में भारत का हौंसला बढ़ाने के लिए मैदान में आती है। समझ नहीं आता कि फरहान अख्तर के प्रोडक्शन हॉउस वाली इस फिल्म को पाकिस्तान प्रेम दिखाने की क्या जरूरत पड़ गई। तथाकथित सेकुलरिज्म को पचास के दशक की कहानी पर अप्लाय करने की क्या जरूरत आ पड़ी।

फिल्म ख़त्म होने के बाद जब दर्शक बाहर निकलने वाले गलियारे से होकर गुजरते हैं तो मेरे कान ‘खड़े’ हो जाते हैं। यहीं पांच मिनट तय करते हैं कि फिल्म चलेगी या नहीं। बड़ी हिट होगी या साधारण रूप से चलेगी। गोल्ड फिल्म का ‘गलियारा परीक्षण’ निराशाजनक रहा। फिल्म देखकर दर्शकों में कोई उत्साह नहीं देखा और न ही कोई वार्तालाप।

अमूमन कामयाब फिल्मों के पहले शो से निकले दर्शक बहुत वाचाल होकर फिल्म की बात करते हैं लेकिन गोल्ड के मामले में ऐसा नहीं हुआ। जाहिर है कि पहले दिन आय का कीर्तिमान अक्षय कुमार की फैन फॉलोइंग का परिणाम है लेकिन समय बीतने के साथ ही इस गोल्ड पर चढ़ी नकली परत उतरने लगेगी और निकलकर आएगा ‘पीतल’।

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URL: Gold Film review- akshay kumar film is more fiction than fact

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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