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डासना मठ पर एक बार फिर से हमला व दिल्ली में हिंदुओं पर पुनः गिरफ्तारी वाला सरकारी डंडा। हिंदुओं को किससे खतरा व कौन कर रहा तुष्टिकरण ?

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अमित श्रीवास्तव। आज दो बड़ी घटना हुई। एक डासना मठ में महंत श्री यति नरसिंहानन्द सरस्वती जी के सहयोगी पर फिर एक बार जानलेवा हमला हुआ और दूसरा जंतर मंतर पर अंग्रेजों के बनाए कानून के विरोध में एकत्रित हुए लोगों पर कथित भड़काऊ नारे लगाने के आरोप में एडवोकेट अश्वनी उपाध्याय समेत पांच युवाओं को दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।

दिल्ली के जिस आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह के डासना के महंत जी के सर कलम करने वाले ट्वीट के बाद महंत यति नरसिंहानन्द सरस्वती पर बार बार जानलेवा हमला हो रहे हैं वो आजाद घूम रहा है और दूसरी तरफ केंद्र सरकार के अधीन दिल्ली पुलिस कथित नारों के आधार पर गिरफ्तारियां कर रही है। क्या भाजपा वामपंथी- जिहादी इकोसिस्टम के आगे घुटने टेक चुकी है? यह भी संभव है कि भाजपा तुष्टिकरण की राह पकड़ ली हो या दिल्ली में भाजपा संगठित हिन्दू समाज चाहती ही नहीं है या किसी अश्वनी उपाध्याय की उस हिम्मत को तोड़ने का प्रयास कर रही है जो लोगों को एकत्रित करने की क्षमता रखते हैं?

प्रश्न यह है कि जंतर मंतर पर लोगों को एकत्रित होने की आवश्यकता क्यों पड़ी? केंद्र सरकार ने अपने बजट में अल्पसंख्यकों को आईएएस( IAS ) आईपीएस ( IPS ) बनाने के लिए 4700 करोड़ रुपये की व्यवस्था करती है। जिसके विरुद्ध देश के कुछ राष्ट्रवादी वकील कोर्ट जाते हैं। कोर्ट में पक्ष रखा गया कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में धर्म के आधार पर सरकारें कानून अथवा बजट बना सकती है क्या? ऐसा असंवैधानिक कृत्य पूर्व की सरकारों द्वारा किया जाता रहा है जिसके विरुद्ध समय समय पर राष्ट्रवादी आवाज उठाते रहे हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि जवाब में केंद्र सरकार की तरफ से अटर्नी जनरल के. वेणुगोपाल हलफनामा में कहते हैं कि सच्चर कमेटी की सलाह 5000 करोड़ रुपये की है और केंद्र सरकार 4700 करोड़ रूपए मात्र ही दे रही है। प्रश्न यह आता है कि क्या भाजपानीत केंद्र सरकार सच्चर कमेटी को संवैधानिक मान रही है?

विपक्ष में रहते हुए भाजपा व गुजरात के मुख्यमंत्री रहते स्वयं श्री नरेंद्र मोदी ने जिस सच्चर कमेटी को असंवैधानिक करार दिया था उसे सत्ता में आते ही संवैधानिक कैसे मान सकते हैं? जिस कमिटी को कॉंग्रेस की यूपीए सरकार में बगैर कैबिनेट की मंजूरी के प्रधानमंत्री के आदेश पर सीधे बना दिया गया हो और जो कमिटी एक सेक्युलर देश में सिर्फ मुस्लिम हितीं की बात करने के लिए बनाई गई हो उसके सुझावों को वर्तमान की केंद्र सरकार कैसे अंगीकार कर सकती है?
मनमोहन सिंह ने 2005 में सच्चर कमिटी मात्र बिठाया ही था, उसके सुझावों को यूपीए सरकार द्वारा स्वीकार अथवा लागू नहीं किया गया और जिस सच्चर कमिटी को भाजपा समेत संघ परिवार असंवैधानिक बता रही थी वो आज सत्ता पाकर उसके सुझावों को लागू कैसे कर सकती है?

प्रश्न यह भी है कि दिल्ली में भाजपा क्या आम आदमी पार्टी के जिहादी विधायक अमानतुल्लाह के सामने घुटने टेक चुकी है? ऐसा ही प्रतीत होता है। जिस विधायक के भड़काऊ भाषणों, रोहिंग्या को बसाने वाली नीतियों का देश की राष्ट्रवादी जनता विरोध कर रही है उस पर केंद्र सरकार हाथ डालने से भी परहेज कर रही है किंतु 8 अगस्त को कथित नारे पर कार्यवाई करते हुए 9 अगस्त को ही पांच हिन्दू युवाओं को हिरासत में लेकर 10 अगस्त की सुबह गिरफ्तार भी कर लिया जाता है।

डासना के पूर्व के चार महंतों की हत्या हो चुकी है। महंत यति नरसिंहानन्द सरस्वती पर पूर्व में पांच बार जानलेवा हमला होने के बाद भी उन्हें Z+ की सुरक्षा क्यों उपलब्ध नहीं करवाई जा रही? क्या केंद्र व उत्तर प्रदेश की सरकार महंत जी की लाश पर हिन्दू वोटरों को एकत्रित कर अपनी सरकार बनवाना चाहती है? प्रश्न तो संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल जैसे संगठनों से भी होना चाहिए कि आखिर इन मुद्दों पर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं? क्या वर्तमान सरकार के सामने संघ

परिवार बौना पड़ गया है जो अपने लाखों स्वयंसेवकों की भावना का सम्मान भी नहीं कर पा रहा? पिछले कुछ वर्षों में संगठित हुए हिन्दू समाज की कब तक परीक्षा ली जाएगी, यह देखना शेष है। यह भी देखना है कि केंद्र सरकार की इस आत्मघाती नीतियों पर संघ परिवार की क्या प्रतिक्रिया रहती है? गिरफ्तार हुए युवाओं को कब तक रिहा किया जाता है व अमानतुल्लाह पर कब तक कार्यवाई होती है? महंत यति नरसिंहानन्द सरस्वती जी को कब तक Z+ सुरक्षा प्रदान की जाती है?

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