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महान ज्योतिष आचार्य वराहमिहिर

श्वेता पुरोहित। आचार्य वराहमिहिर गौड़ ब्राह्मण थे। इनके पूर्वज मूल रूप से श्रीनगर (कश्मीर) के निवासी थे। कालान्तर में ये लोग वहां से मालव भूमि में ‘श्री हट्ट’ नामक गांव में आ बसे। तब से ‘श्री गौड़’ मालवीय परिवार में आदित्य दास ने सपत्नीक भारत चारों धामों (बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वर एवं जगन्नाथ) की यात्रा का संकल्प किया। वे घर से पैदल चल पड़े। श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करके यह दम्पत्ति पद यात्रा करता हुआ पाटलि पुत्र (पटना) आ पहुंचा। इस स्थान को हर प्रकार से सुविधा जनक समझ कर इन लोगों ने यहीं जीवन बिताने का निश्चय किया। एक रात्रि को हुए स्वप्न के अनुसार इन्होंने अगले दिन प्रातः एक कुएं के अन्दर से एक पटल पर विराजमान भगवती लक्ष्मी की प्रतिमा को बाहर निकाला। उसी कुएं को मिट्टी से बन्द करके उसके ऊपर उस मूर्ति के साथ दो अन्य मूर्तियों (महाकाली एवं महा सरस्वती) की स्थापना भी उन्होंने वहीं पर की, जो आज भी छोटी ‘पटन देवी’ के नाम से पटना में पूजी जाती हैं।

आचार्य वराहमिहिर का जन्म और विवाह

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भगवत्कृपा से इस दम्पत्ति के यहां इसी नगर में एक महान तेजस्वी बालक ने जन्म लिया। अपने पिता के लिए महान् अनिष्टकारी जानकर इस दम्पत्ति ने उस नवजात शिशु को लकड़ी की एक हन्डिया में बन्द करके गंगा जी में बहा दिया। दैवयोग से वह हन्डिया समुद्र में बहती हुई सिंहल द्वीप में जा पहुंची। जहां पर उसे मय दानव की पुत्री छाया ने पकड़ लिया। ईश्वर कृपा से हन्डिया में पड़ा हुआ बालक जीवित मिल जाने से, मय दानव ने उसे अपना पुत्र बना लिया, क्योंकि उसके यहां केवल कन्या संतान ही थी ।

मय दानव ने अपनी समस्त तन्त्र-मन्त्र ज्योतिष एवं योग विद्याओं को इस बालक को सिखा कर उसे इन सभी में प्रवीण कर दिया। तत्पश्चात् अपनी कन्या का विवाह भी इसी से कर दिया। कुछ समय बाद इस नवीन दम्पत्ति के यहां एक बालक ने जन्म लिया। उसके नामकरण आदि संस्कार में इस नवजात शिशु के पिता को अपने स्वयं के जन्म एवं हन्डिया द्वारा जीवन प्राप्त होने का रहस्य ज्ञात हुआ। सर्व विद्या सम्पन्न इस युवक को अपनी जन्म-भूमि एवं अपने माता-पिता के दर्शन करने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई। वह योग विद्या द्वारा कुछ ही क्षणों में पाटलिपुत्र पहुंच गया। पं. आदित्य दास और उनकी पत्नी ने जब अपने पुत्र को देखा तो वे बड़े प्रसन्न हुए और अपने किये पर पश्चात्ताप भी करने लगे। विद्वान् पिता ने अपने को विधिवत् संस्कारों द्वारा शुद्ध किया और इसका नाम पुनःपुत्र “वराहमिहिर” रखा। तत्पश्चात् अना एवं गार्गी नामक कन्याओं से दो विवाह और भी आचार्य वराहमिहिर ने किये। यूं तो बचपन से ही मय दानव से ज्योतिष आदि सभी विषयों में आचार्य वराहमिहिर पारंगत हो चुके थे, फिर भी इनके पिता ने इन्हें और भी शिक्षा देकर ज्योतिष शास्त्र का अद्भुत विद्वान् बना दिया। इन्हीं वराहमिहिर आचार्य ने ‘बृहत्संहिता’ तथा ‘बृहज्जातक’ आदि अनेक ग्रन्थों की रचना करके अपने कुल को मिहिर के समान प्रकाशित किया।

सम्राट् विक्रमादित्य से मिलन

देशाटन के विचार से एक समय आचार्य वराहमिहिर पाटलिपुत्र से निकल पड़े। काशी और मथुरा एवं पुष्कर आदि तीर्थों में भ्रमण करते हुए उज्जयिनी (उज्जैन) आ गये। यहां पर इनकी अद्भुत विद्वत्ता एवं ज्योतिष शास्त्र में पारंगति से प्रभावित होकर भूपति विक्रम ने इन्हें अपनी सभा में नवरत्न के रूप में सम्मानित किया। वे वहीं पर रहने लगे।

देवगुरु बृहस्पति का मिलन और इन्द्रलोक में गमन

एक समय देवगुरु बृहस्पति स्वयं आचार्य वराहमिहिर की ख्याति सुनकर इनसे मिलने के लिये आये। उन्होंने इनसे प्रश्न पूछा कि कृपया बताइये इस समय देवगुरु कहां पर होंगे आचार्य वराहमिहिर ने तुरन्त अपनी विद्या के बल से प्रश्न फल कहा कि महाराज आप ही तो देवगुरु हैं। इस पर बृहस्पति बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने इस घटना का उल्लेख इन्द्र की सभा में भी किया। देवताओं के राजा इन्द्र ने आचार्य वराहमिहिर को अपनी सभा में बुलाने के लिए देवगुरु से प्रार्थना की। देवगुरु बृहस्पति की आज्ञा पर आचार्य वराहमिहिर उनके साथ पंच भौतिक शरीर में ही इन्द्रलोक गये। वे अपने साथ देवलोकवासियों की साठ-बासठ हजार जन्म कुण्डलियां भी बनाकर ले गये। इन्द्र ने इनका बड़ा सम्मान किया और इन्हें सादर विदा किया।

‘पांचजन्य’ शंख की प्राप्ति

भगवान् कृष्ण के परम धाम पधारने पर भगवान् ने अपना ‘पांचजन्य’ नामक शंख अग्नि में डाल दिया। अग्नि देवता ने प्रसन्न होकर वही शंख अग्निहोत्रादि करने वाले महर्षि सान्दिपनी को प्रदान कर दिया था। दैवयोग से वही शंख आचार्य वराहमिहिर को मिल गया, वे उसे विक्रमार्क की युद्ध यात्रा के समय शत्रु दल का नाश करने के लिए बजाया करते थे।

आचार्य वराह मिहिर के पुत्र पृथुयश को इन्दौर (इन्द्रपुर) का राज्य मिलना

श्री पृथुयश अपने पिता की भांति ही लोकप्रसिद्ध विद्वान् थे। एक समय वह सम्राट् विक्रमादित्य की सभा में गये और उनकी गोदी में चढ़कर बैठ गये। सम्राट् ने प्रसन्न होकर उन्हें इन्दौर (इन्द्रपुर) का राज्य प्रदान कर दिया। आचार्य वराहमिहिर ने कहा कि हम लोग ब्राह्मण हैं, हमसे राज्य नहीं होगा, हम तो सरस्वती के पुजारी हैं। सम्राट् विक्रमादित्य ने कहा कि मैं इस बालक को जो वस्तु एक बार दे चुका हूँ वह वापिस कैसे ले सकता हूँ। अतः आपको मेरी प्रार्थना माननी ही होगी। इस पर आचार्य वराहमिहिर ने इन्दौर राज्य का भार उज्जैन के दक्ष मन्त्रियों के जिम्मे लगा दिया। वहां से प्राप्त आय से अवन्ति में ‘आदित्यदास’ नाम के विद्यालय की स्थापना की। प्रत्येक वर्ष दस हजार छात्रों के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था कर दी।

आचार्य वराहमिहिर के वंशज

श्री पृथुयश के पुत्र विद्वद्वर्य श्रीशेष जी हुए और इनके पुत्र क्रमशः श्रीगणपति, श्रीनिधिरूप, श्रीसोमकान्त, श्रीधर, श्रीरघुनाथ, श्रीबलभद्र, श्रीमान्धाता, श्रीशालग्राम, श्रीभारद्वाज, श्रीकृष्ण दा एवं श्रीकुसुमाकर आदि-आदि विद्वान् हुए।

श्री पृथुयश के बाद लगभग 145 वीं पीढ़ी में होने वाले विद्वान् पं. बालकृष्ण ने सं. 1972 वि. (सन् 1915 ई.) की आषाढ़ शुक्ल षष्ठी को पटना नगर में ‘वराहमिहिर पुस्तकालय’ की स्थापना की, जिसके तत्वावधान में आचार्य वराहमिहिर की जीवनी को प्रकाशित किया गया। सम्राट् विक्रमादित्य द्वारा आचार्य वराहमिहिर के पुत्र श्री पृथुयश को प्रदान किया गया इन्दौर का राज्य प्रशासन भी पृथुयश के वंशज श्रीनन्दलाल मालवीय तक उनके अधीन चलता रहा। श्रीनन्दलाल ने प्रसन्नता पूर्वक इस राज्य को मराठा वीरों को सौंप दिया। मराठा शासकों का स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ काल बाद तक इन्दौर पर शासन रहा।

ज्योतिर्गणे शास्त्र पथतिवृत्तौ । यद्ब्रह्महत्यां मुनयो वदन्ति ।

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