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अदालत ने मेरी पुस्तक के एक और तथ्य पर लगाई मुहर! गुलबर्ग सोसायटी में तीस्ता सीतलवाड़ की साजिश हुई उजागर!

गुजरात के गुलबर्ग सोसायटी पर आए स्पेशल कोर्ट के निर्णय ने मेरी पुस्तक ‘निशाने पर नरेंद्र मोदीः साजिश की कहानी-तथ्यों की जुबानी’ के एक और सच पर मुहर लगाने का कार्य किया है! इससे पहले Teesta setalvad के एनजीओ के फर्जीवाड़े पर मेरी पुस्तक में हुए खुलासे पर भी उस समय मुहर लग गई, जब केंद्रीय गृहमंत्रालय ने उसके ‘सबरंग ट्रस्ट’ को अवैध गतिविधियों में लिप्त पाते हुए उसका FCRA पंजीकरण रद्द कर दिया। इशरत जहां के आतंकी होने के पूरे सबूत भी मेरी इसी पुस्तक में 2013 में मौजूद थे, जिसका खुलासा आज तक हो ही रहा है! यह उन पत्रकारों के मुंह पर तमाचा है, जो मुझे बार-बार यह चेतावनी दे रहे थे कि नरेंद्र मोदी पर पुस्तक लिखकर तुमने अपने करियर को बर्बाद कर लिया है! सच के लिए एक क्या, हजार करियर बर्बाद हो जाएं, मुझे फर्क नहीं पड़ता है!

17 जून 2016 को गुलबर्ग सोसायटी पर फैसला सुनाते हुए स्पेशल कोर्ट ने टिप्पणी की-“जिस भीड़ ने 69 लोगों की जान ली उनका मकसद जान लेना नहीं था बल्कि वे लोग पूर्व सांसद एहसान जाफरी के गोली चलाने की वजह से हिंसक हो गए थे।”

अदालत ने शुक्रवार को आए अपने इस फैसले में दोषी पाए गए 24 लोगों में से 11 को आजीवन कारावास की और एक को 10 साल की सजा सुनाई है। अन्य 12 को 7 साल की सजा सुनाई गई है। ज्ञात हो कि 28 फरवरी 2002 को गुजरात दंगे के दौरान गुलबर्ग सोसायटी पर हमला कर हिंसक भीड़ ने 69 लोगों की जान ले ली थी। मरने वालों में कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी भी थे।

स्पेशल कोर्ट के जज पीबी देसाई ने 17 जून को दिए अपने फैसले में लिखा है- “जैसे ही एहसान जाफरी की तरफ से गोली चलाई गई भीड़ हिसंक दंगाईयों में बदल गई और उन्होंने इतने भयंकर नरसंहार को अंजाम दिया।”

अदालत ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि एहसान जाफरी चुपचाप अपने घर में बैठे थे और उन्होंने कुछ नहीं किया था! साथ ही कोर्ट ने इस
बात को भी मानने से इंकार कर दिया कि जाफरी ने गोली अपने बचाव में चलाई थी। कोर्ट ने कहा, ‘उनकी फायरिंग में 15 लोग जख्मी हुए थे। उनमें से एक शख्स गंभीर रुप से घायल था।’

अब मेरी पुस्तक ‘निशाने पर नरेद्र मोदीः साजिश की कहानी-तथ्यों की जुबानी’ का वह हिस्सा देखिए, जो मैंने गुलबर्ग सोसायटी के बारे में लिखी थी! मेरी पुस्तक की पृष्ठ संख्या- 43-44 पर लिखा है- “घटना के चार साल बाद इस केस में सिटीजन फाॅर जस्टिस एंड पीस एनजीओ चलाने वाली तीस्ता सीतलवाड़ के कहने पर एहसान की पत्नी जाकिया जाफरी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 63 लोगों को इसमें अभियुक्त बनाया था, जिसमें अदालत ने नरेंद्र मोदी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।”

आगे मैंने लिखा था- “घटना के वक्त अपनी पहली प्राथमिकी में जाकिया जाफरी एहसान जाफरी की पत्नी- ने यह दर्ज कराया था कि उन्हें व उनके साथ के अन्य लोगों को गुजरात पुलिस ने ही बचाया था, लेकिन चार साल बाद वह तीस्ता के कहने पर नरेंद्र मोदी व अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने पहुंची थीं। तथ्य तो यह है कि उत्तेजित भीड़ पर पहले एहसान जाफरी ने अपने हथियार से गोली चलाई थी, जिसके बाद भीड़ भड़क उठी। गुजरात पुलिस ने मौके पर पहुंच कर दंगाई भीड़ पर गोली चलाई, जिसमें पांच हिन्दू दंगाई मारे गए थे। पुलिस ने गुलबर्ग सोसायटी को घेर कर खड़े करीब 10 हजार दंगाईयोें के बीच से लगभग 180 लोगों को बचाया था।”

आप देखिए कि मैंने ‘निशाने पर नरेंद्र मोदीः साजिश की कहानी-तथ्यों की जुबानी’ पुस्तक में जो बात 2013 में लिखी थी, वही आज अदालत के निर्णय में भी आया है। इससे जाहिर होता है कि सत्य को छुपाया नहीं जा सकता, भले ही वह प्रकट होने में थोड़ा समय ले!

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