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ज्ञानवापी और कबजेदारों का अंधविश्वास।

आनंद राजाध्यक्ष। चार अलग मुद्दों के संदर्भों से बात स्पष्ट होगी, आप से धैर्य से पढ़ने की प्रार्थना है। (१) वर्षों पहले जब इस्लाम का नाम लेकर फ़ेसबुकपर लिखना संभव था तब मैंने दर उल हर्ब और उसके विपरीत की व्याख्या पर एक पोस्ट लिखी थी । एक जनाब तशरीफ़ ले आए, आइडी पर लिखा था एडवोकेट सय्यद। दुआ सलाम के बाद डींग हाँकने लगे कि आप का वास्ता अभीतक किसी पढे लिखे सय्यद से नहीं पड़ा है इसलिए कुछ भी लिखे जा रहे हैं आप।

मैंने कहा जनाब अपना मुद्दा रखिए। तो बोले कि बताइए कुर’आन में ये दर उल हर्ब कहाँ लिखा है? मैंने कहा कि मैंने कब लिखा कि ये कुर’आन में लिखा है ? मेरी पोस्ट पढ़कर जवाब दें। अब काफिर से हार माने तो ईमान संकट में, इसलिए बोले तो हदीस में से दिखाइए। मैंने वही जवाब दिया कि मैंने वैसा भी नहीं लिखा। तो बोले कि सीरत में दिखाइए।

मैंने फिर से वही जवाब दिया कि मैंने सीरत का भी नाम नहीं लिया है। फिर मैंने उनको बताया कि विकि में तो इसे इब्न तैय्यमिया के नाम से बताया गया है जिनको शेख उल इस्लाम माना जाता है। क्या आप ने सोचा था यह मुझे मालूम नहीं होगा ? फिर इब्न तैय्यमिया की थोड़ी बैकग्राउन्ड भी बताई कि कैसे उसे अपने ज़िंदगी में जेल भी हुई थी और कैसे समय समयपर उसके लेखन पर बैन भी लगता रहता है और अनुकूल समय देखकर फिर से उठ जाता है।

फिर उनको पूछा कि क्या आप इस doctrine को गलत बताने और इब्न तैय्यमिया की निंदा करता हुआ विडिओ बनाने को तैयार हैं ? हम लोग वायरल करेंगे। क्या आप नहीं मानते कि अगर ये हुजूर के अलफाज नहीं हैं तो इसपर कत्ल ओ गारद गलत हैं ? क्या आप नहीं मानते कि सदियों से करोड़ों मासूमों की जानें गई हैं ?

सय्यद साहब मुझपर लानते भेजते हुए निकल लिए कि मैं कुछ नहीं जानता। वैसे, मुझे जो जानना था, उनकी बातों से समझ आ गया था। वैसे आजकल इस doctrine के जनक अबू हनीफ़ा बताये जा रहे हैं। हो सकता है भविष्य में और किसी का नाम लिया जाएगा, लेकिन यह तथ्य अपनी जगह पर स्थिर है कि यह doctrine तीनों किताबों में कहीं भी न हो कर भी करोड़ों निर्दोष जानें निगल चुकी है, निगल रही है और निगलती रहेगी। क्योंकि ये doctrine दूसरे का छीनकर उनको कुछ देती है तो उनकी नजर में वो सही है।

(२) इसी तरह आप किसी आलिम साहब से पूछिए कि क्या गज़वा ए हिन्द कुर’अन का हिस्सा है? वे तपाक से बोलेंगे कि नहीं है। फिर आप पूछिए कि क्या सही बुखारी या सही मुस्लिम में है ? जवाब वही होगा कि वहाँ भी नहीं है। फिर पूछिए कि क्या अल नसाई / निसाई को सही बुखारी या सही मुस्लिम के बराबर माना जाता है ?

अब उनके पास आप को जवाब देने का समय नहीं होगा। आप को खा जानेवाली नज़रों से घूरेंगे, आप से कहेंगे कि तशरीफ़ ले जाएँ। हो सकता है बेहद तरस खानेवाली नजर से भी देखा जाएगा कि हे मूढ़ बालक तुम बहुत ही अज्ञानी हो। तुम से फिर कभी चर्चा करेंगे क्योंकि यह लंबी चर्चा होगी और अभी उतना समय नहीं। घुमा फिरा के वही बात, ढाक के तीन पात।

नेट पर कुछ आलिमों के विडिओ भी मिलेंगे जो बताते हैं कि गज़वा ए हिन्द सदियों पहले हो चुका। कुछ बताते हैं कि यह होने से रहा, क्या भारत की सेना से वे निपट पाएंगे?

मुझे लगता है कि ये दोनों तरह के लोग भारत के हिंदुओं को क्लोरोफॉर्म सूंघा रहे हैं, अफीम पिला रहे हैं। ताकि सभी ब्रॉइलर मोटे हों, कोई बाज बने ही नहीं। क्योंकि ये इस तरह के लोग बहुत कम संख्या में हैं, अधिकतर आप को गजवा ए हिन्द के लिए प्रेरित करते ही मिलेंगे, न केवल पाकिस्तान के नागरिकों को बल्कि पाकिस्तान की सेना को भी। और हम आरिफ़ साहब या तारेक साहब को सुनकर अपनी गलतफहमी को पुख्ता करना चाहते हैं कि चूंकि उनकी किताब ऐसा कुछ नहीं कहती, हम सुरक्षित हैं। गांधी जी ऐसे ही एक क्लोरोफॉर्म थे जो हमारे पूर्वजों को बेहद प्रिय थे। सब को सन्मति देने की बातें करते थे, हमको सद्गति भी नहीं दी, दुर्गति ही दे गए। अस्तु। इससे अधिक मूर्खता कहीं मिलती हो तो मुझे पता नहीं। होगी भी, मैं कोई सर्वज्ञ थोड़े ही हूँ ?

(३) कुछ महीनों पहले तारेक फतह साहब का संजय दीक्षित जी के साथ एक लाइव हुआ था जिसकी क्लिप इस पोस्ट के कमेन्ट में जोड़ी है। फतह साहब कहते है कि आप को वो थ्योरी पता है या नहीं कि जहां इनकी पहले हुकूमत हुआ करती थी उसे वापस अपनी हुकूमत में लाना इनपर फर्ज है।

फिर फतह साहब बड़े ही धूर्तता से मुद्दा ग्रीस और स्पेन पर ले गए, भारत की बात ही नहीं की। लेकिन असली मुद्दा तो इसी कथित फर्ज का है, क्योंकि यही फर्ज तो दुनिया का मर्ज है। भारत में जगह जगह मिनी पाकिस्तान इसीलिए बनाए जा रहे हैं, अवैध बांग्लादेशी और रोहींग्याओं को बड़ी संख्या में बसाकर उनकी बेतहाशा पैदाइश इसीलिए तो करवाई जा रही है। ये फर्ज वाली थ्योरी भी तीनों किताबों में मिलने से रही, लेकिन मजाल है कोई बडा आलिम कह दे कि यह कोई फर्ज नहीं, शांति से सहजीवन ही सही है। वैसे शांति स सहजीवन को तो किताब ही सीधा मना कर देती है, ९:१२३ सब से बड़ा उदाहरण है। अस्तु।

(४) मौलाना आजाद का उद्धरण आप को B. R. Nanda द्वारा लिखित पुस्तक GANDHI Pan Islamism, Imperialism and Nationalism in India के पृष्ठ क्रमांक ११८ पर मिलेगा । स्क्रीन शॉट संलग्न है तथा संदर्भ को हरे लाइन से मार्क किया है। पढिए।

अब बात ये है कि “किताब” में ऐसा ठेठ संदर्भ हरगिज नहीं मिलेगा, पूछनेपर उलेमा बोलेंगे हमें दिखाइए ऐसा कहाँ लिखा है। अरबी के लफ़्ज़, नुक्ता, ज़ेर जबर, पेंच सब पर बहस करेंगे और साबित करेंगे कि किताब में ऐसा नहीं लिखा है, लेकिन यह नहीं बोलेंगे कि कौम को ऐसा सोचना गलत है, जिसने भी उनके दिमाग में यह फितूर डाल दिया है वो उनको गुमराह कर रहा है। और अगर कोई बोले भी तो कौम उसको माननेवाली नहीं। सहमे भेड़ों को देखकर लार टपकाते भेड़ियों को शाकाहार पर थोड़े ही लाया जा सकता है ? भेड़ों को बचना है तो सींगों का उपयोग सीखना होगा।

बात इसी एकतरफा फायदे के अंधविश्वास की है। मान्यता यह भी है कि जब लड़ कर छीनी हुई चीज को वापस मूल मालिक के पास जाने से रोका जा सकता है तो हिंसा से रोकना भी फर्ज है और मजबूरी न हो तो न लड़ना लानती काम है जो इन्हें जहन्नम भेजेगा पर्मानंट पकोड़ा या कबाब बनाने के लिए। इतना स्पष्ट लिखा कहीं नहीं मिलेगा सही किताबों में लेकिन आचरण इससे रत्ती भर भी अलग नहीं होगा, क्या दिखाई नहीं दे रहा ? मौलाना मदनी की राम मंदिर को लेकर प्रतिक्रिया भूल गए ? क्या उनको कहीं भी यह लगता था कि ये तो छीन लिया था हमारे पूर्वजों ने जो गलत काम किया था ? ब्रोकन मॉरल कम्पास यही है जो छीनना सही ठहराता है बशर्तें मान्यता अलग हो।

वैसे आज पाकिस्तान मे अहमदिया और शिया को काफिर करार दिया जा रहा है वह और क्या है, लूटने को दूसरे धर्म के काफिर बचे नहीं तो अपनों को ही काफिर करार दिया जा रहा है। अस्तु, ज्ञानवापी के कारण भेड़ की खाल उतर कर भेड़िया स्पष्ट दिखाई दे रहा है। और यह भी सनद रहे कि प्रतिकार न हो तो एक्सपोज होने से ऐसों को कोई फरक नहीं पड़ता बल्कि वे अधिक मजबूत होते हैं। मरणासन्न दत्ताजी शिंदे ने अबदाली को उत्तर दिया था कि बचेंगे तो और भी लड़ेंगे। आज कहना होगा कि लड़ेंगे तो ही बचेंगे।

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1 Comment

  1. प्रदीप says:

    अत्यन्त स्पष्टता से वर्तमान स्थिति का विश्लेषण किया गया है। मेरी प्रार्थना है कि सभी इस पर विचार करें और कार्यान्वयन करें क्योंकि इस आलेख के अन्तिम शब्द “लड़ेंगे तो ही बचेंगे” अटल सत्य हैं। इंडिया स्पीक्स को इसके लिए साधुवाद।

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