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हिंदू दुर्दशा देखी न जाई-3

शंकर शरण । भाजपा की समालोचना करने वाले जाने-माने हिन्दू या हिन्दू-हितैषियों पर कीचड़ उछाला जा रहा है। उन का मजाक उड़ाया जाता है। ठोस बातों पर उत्तर देने के लिए बदले उन्हें चिढ़ाया, या झूठी तोहमत लगाई जाती है। यह किसी भी सोशल मीडिया मंच पर देख सकते हैं। जैसा मधु किश्वर ने लिखा, “जो भी मोदी सरकार या भाजपा को अपना सच्चा फीडबैक देते हैं, उन सब को दुश्मन बताया जाता है। क्या भाजपा को केवल चमचे चाहिए?”

कूनराड एल्स्ट 

यदि आप में कोई आदर्श है, यदि आप कोई गंभीर उद्देश्य सामने रखते हैं, उस के लिए सत्ता लेना चाहते हैं – तो स्वभाविक रूप से आप अपनी गतिविधियों पर लोगों की सत्यनिष्ठ प्रतिक्रिया जानना चाहेंगे। ताकि पता चले कि उस का क्या परिणाम हो रहा है, वह अपेक्षित दिशा में है या नहीं, ताकि आप अपना काम और सुधार बना सकें।  किन्तु यदि आप केवल ‘आफिस’ और उस से जुड़ी सुख-सुविधाएं चाहते हैं, तब आप को केवल भक्त चाहिए! जो आप की जयकार, ठकुरसुहाती करें। तो बताइए, भाजपा क्या चाहती है?

साफ दिख रहा है कि भाजपा की समालोचना करने वाले जाने-माने हिन्दू या हिन्दू-हितैषियों पर कीचड़ उछाला जा रहा है। उन का मजाक उड़ाया जाता है। ठोस बातों पर उत्तर देने के लिए बदले उन्हें चिढ़ाया, या झूठी तोहमत लगाई जाती है। यह किसी भी सोशल मीडिया मंच पर देख सकते हैं। जैसा मधु किश्वर ने लिखा, “जो भी मोदी सरकार या भाजपा को अपना सच्चा फीडबैक देते हैं, उन सब को दुश्मन बताया जाता है। क्या भाजपा को केवल चमचे चाहिए?”

संघ-भाजपाई व्यंग्य से कहते हैं कि वे इतनी ऊँचाई पर ऐसे पहुँच गए? उन्होंने जनता की प्रतिक्रिया को जाना समझा है। उन के अनुसार, हिन्दू बौद्धिक बस अपनी बातों को ही ‘फीडबैक’ समझते हैं और ‘सामान्य आदमी के फीडबैक को कुछ नहीं समझते।’ इस तरह, संघ के लोग आलोचनाओं को अनसुना कर अपनी उपलब्धियों पर फूलते रहते हैं।

किन्तु वे उपलब्धियाँ क्या हैं? वे खुद माने बैठे हैं कि उन्होंने बहुत उपलब्ध कर लिया। सचाई यह है कि उन्होंने केवल चुनाव जीते, जो विरोधियों ने भी काफी जीते हैं। किन्तु संघ-भाजपा के लोग जैसे ही सत्ता में आते हैं, वे मानो दबाववश सारा हिन्दू एजेंडा छोड़ देने को मजबूर हो जाते हैं (उन के अंधभक्त या विरोधी चाहे दावा जो करें)। उलटे, वे दुश्मनों का एजेंडा लागू करने में लग पड़ते हैं।

मैंने आर.एस.एस. को कभी किसी विषय में हिन्दू जीत का प्रयास करते नहीं सुना। वे विभिन्न चुनावों आदि में आर.एस.एस.-भाजपा की जीत पाते हैं। किन्तु उन की तुष्टीकरण और सेक्यूलरवादी नीतियाँ हिन्दू हितों, हिन्दू कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की कीमत पर चलाई जाती हैं। यह तो ‘जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काटते जाने’ का ही उदाहरण है। 

संघ कार्यकर्ता ‘जमीनी काम’ करने का दंभ पालते हैं। पर कौन से काम? सेक्यूलर, आपदा-राहत, और विकास के काम – न कि जिस के लिए डॉ. हेडगेवार ने आर.एस.एस. की स्थापना की थी।  चर्च-मिशनरी लोग ऐसे राहत कार्यों को अपनी वैचारिक परियोजना से जोड़ कर चलाते हैं। संघ ऐसा नहीं करता। यह केवल अपने को भला समाजसेवी दिखा कर, अपने मुँह मियाँ मिट्ठू होता रहता है। जो वैचारिक कार्य चलाता भी है. वह असल समस्याओं पर निष्प्रभावी रहता है। ठोस परिणामों का आकलन करके देखें तो हिन्दू धर्म और समाज हार रहा है, उस की जमीन दिनो-दिन छिनती जा रही है!

इस आलोचना को कुछ लोग ‘असंख्य निःस्वार्थ कार्यकर्ताओं के त्याग का मजाक उड़ाना’ कहते हैं। किन्तु, दरअसल, आर.एस.एस. के नेतागण ही उन कार्यकर्ताओं का मजाक उड़ा रहे हैं। वे सभी त्याग, बलिदान हिन्दू लक्ष्य के लिए किए गए थे। किन्तु ऐसे हिन्दुओं की सारी रचनात्मक ऊर्जा को एकत्र कर उसे संघ-भाजपा के अपने स्वार्थ में लगा दिया जाता है। उदाहरण के लिए, उन के द्वारा चलाई जा रही इस्लामी तुष्टीकरण नीतियों में जो सरकारी नीतियों और संघ के क्रियाकलाप, दोनों स्तरों पर हो रहे हैं।

वे अपनी हर आलोचना को पूर्वग्रह, केवल कुर्सी तोड़ने वाले बौद्धिकों का अहंकार बताते हैं। किन्तु हानिकर रणनीतियों की गलतियाँ दिखाने में कौन सा दुराग्रह, या अहंकार है? हमें अनेक संघ कार्यकर्ताओं के अच्छे कामों के बारे में बखूबी मालूम है। उस से हमें कोई विरोध नहीं। लेकिन हम यह देखने से कैसे रह सकते हैं कि आर.एस.एस. के बड़े लोग लाखों लोगों की उस सारी ऊर्जा का उद्देश्यांतर करके कहीं और लगा देते हैं? 

हिन्दू राजनीतिक आंदोलन का अध्ययन करते हुए मैंने पाया कि आर.एस.एस. के पदाधिकारी सदैव चलते-फिरते,  ‘प्रवास’ में रहते हैं। जैसे, कोल्हू में बैल चलता रहता है। एक अंदरूनी व्यक्ति ने मुझे बताया कि उन के बीच यह स्टेटस-सिंबल जैसा है, कि कौन कितनी यात्राओं में रहता है! लेकिन सदैव चलते रहना तो काम करना नहीं है। काम के आकलन-मूल्याकंन आधार तो भिन्न होंगे।

सचमुच, जनसंघ-भाजपा जब से सक्रिय हैं तब से यह शोध करना विस्मयकारी होगा कि कितने हिन्दू-विरोधी फैसले कांग्रेस और अन्य द्वारा किए गए, जिन में भाजपा ने सक्रिय सहयोग किया, समर्थन दिया, चुप रही, या विरोध किया।

 केवल जड़-सूत्र रटने वाले में यह विशेषता प्रायः देखी जा सकती है। वे किसी मतवाद को खूब कोसते हुए भी उस से गहराई से प्रभावित हो जाते हैं। इस का वर्तमान उदाहरण संघ-भाजपा भी है। वे नेहरूवाद को खरी-खोटी सुनाते हैं, जबकि वास्तव में नेहरूवाद की ओर से ही आक्रामक दस्तों में बदल गए हैं। वे हर नेहरूवादी विचार को ही अपनी नीतियों में लागू कर रहे हैं। 

उसी तरह, जातिवादी नीतियाँ। वे चाहे इंकार करें, पर भाजपा नेता अपने को सोशल जस्टिस, सकारात्मक पक्षपात, आदि के पैरोकार बनने को उतावले हैं। इस में कुछ भी धर्म-सम्मत नहीं है, केवल औसतबुद्धि वालों द्वारा चालू वैचारिक फैशनों की नकल भर है।

अतः यदि आर.एस.एस. यह समझता है कि वही अपने देश-समाज को संचालित कर रहा है तो उसे लज्जित होना चाहिए। इस के अस्तित्व की पूरी अवधि में हिन्दू समाज पीछे ही घिसटता गया है। यहाँ तक कि अंग्रेजों से स्वतंत्रता पाना (जो गैर-संघ हिन्दुओं का कार्य था) भी देश-विभाजन द्वारा गंभीर रूप से कलंकित हुआ। मैं संघ के लोगों को चुनौती देता हूँ कि वे अपने अस्तित्व के गत सौ सालों में हिन्दुओं की एक भी अकलंकित जीत का उदाहरण दें।

हालाँकि हर कहीं, मौके का फायदा उठाने वाले यही घमंड दर्शाते हैं:  “कम से कम हम कुछ *करते* तो हैं।” हाँ, जरूर। घोड़ा भी गाड़ी में जुता हुआ यही *करता* है। मगर करता क्या है? वहीं, जो गाड़ी हाँकने वाला उसे हुक्म देता है। आर.एस.एस. के घमंड के विपरीत यह कोई हिन्दू समाज के लोग नहीं, बल्कि किसी अदृश्य गाड़ीवान द्वारा हाँके जा रहे पैदल सिपाही है। जिन्हें नहीं मालूम कि वे कहाँ जा रहे हैं।

कोई सार्थक वैकल्पिक कार्य-प्रणाली या मॉडल बनाना अकल्पनीय नहीं है। इस में केवल गलतियों से सीखने की जरूरत और थोड़ी कल्पनाशीलता चाहिए। आर.एस.एस. जैसे चल रहा है, चलता रहे। किन्तु इसे अपनी गलतियों पर सचमुच खुले मन से विचार करने की आवश्यकता है, कि कहाँ से वे राह भूल-भटक गए। इस पर जबरन पर्दा डाले रखकर, और ‘सब ठीक है’ की भंगिमा अपना कर वे किसी का भला नहीं करेंगे।

अनेक हिन्दू अपने समाज के अस्तित्व के संघर्ष को मानो दर्शकदीर्घा से एक खेल की तरह देख रहे हैं। पर, अपने खात्मे का इंतजार कर रहा अंतिम हिन्दू असंख्य लोगों की ऐसी आत्मकेंद्रितता को शाप देगा जिन ने यह हिसाब लगाकर हिन्दू-शत्रुओं को सहूलियतें देना तय किया हुआ है कि इस के दुष्परिणामों से उन्हें कोई हानि नहीं होने वाली! (जहाँ देश के विविध हिस्सों में हिन्दुओं को सामूहिक रूप में खत्म और विस्थापित किया गया, वहीं तमाम नेता बड़े-छोटे नगरों, बस्तियों में भारी हिन्दू जनसंख्या के बीच अपने-अपने घरों, ऑफिसों में सुरक्षित रहे। उन्हें कोई हानि न हुई। वे मानो इसे स्थाई स्थिति समझते हैं, कि आम हिन्दू हितों से उन के निजी हित जुड़े हुए नहीं हैं। – अनु.)।

अपनी सांस्कृतिक पहचान की उपेक्षा करके आप एक बहुमूल्य विरासत को फेंक रहे हैं। अपने ‘विकांस’ के नारे के साथ आप अन्य लोगों के मामूली नकलची भर बनते हैं। आप अपनी संख्या में भले सुख महसूस करें, किन्तु एक विशिष्ट सभ्यता के रूप में आप मिट जाने की ओर हैं। (समाप्त)

साभार लिंक

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