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हिंदुत्व (RSS) का वाम या दक्षिण नहीं है: दत्तात्रेय होसाबले ने कहा, पर घटनाएं बताती हैं कि RSS के कारण प्रताड़ित हो रहा है आम धार्मिक और धर्म परायण हिन्दू!

Sonali Misra. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसाबले ने दो दिन पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवं संघ के नेता राम माधव की पुस्तक के लोकार्पण के अवसर कर भारतीय वैचारिक परिदृश्य के विषय में बात करते हुए कहा कि वाम और दक्षिण जैसी कोई चीज़ भारत में नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व न ही वाम और न ही दक्षिण है, बल्कि उन्होंने कहा

“मैं खुद आरएसएस से हूँ और मैंने कभी भी संघ के प्रशिक्षण शिविरों में यह नहीं कहा कि हम दक्षिण पंथी हैं। हमारे कई विचार वामपंथी विचार हैं, और कई निश्चित ही इन कथित दक्षिणपंथी विचार!” उन्होंने कहा कि “बाएँ और दाएँ दोनों ही ओर के विचारों के लिए स्पेस होता है, क्योंकि यह मानवीय अनुभव हैं। भारतीय परम्परा में कोई भी पूर्णविराम नहीं है, वाम और दक्षिण वर्तमान दिन की जियोपॉलिटिक्स के लिए ही उचित है।”

उसके आगे उन्होंने कहा कि “यही कारण है कि बाएँ और दाएँ का, पूर्व का और पश्चिम का भौगोलिक, धार्मिक और राजनीतिक विभाजन अब कमजोर हो चुका है। और आज विश्व एक दूसरे के विचारों को अपना रहा है। यही हिंदुत्व है। हमें सभी में से बेस्ट को लेना है और फिर उसे अपने अनुसार ढालना है।”

उन्होंने कहा कि हमने कथित राजनीतिक, वाम, दक्षिण, पूंजीवादी और कथित वामपंथी विचारों पर इतना विवाद कर लिया कि दोनों मर गए और फिर उन्होंने कहा कि कुछ पूंजीवादी विचार और कुछ वामपंथी विचार हैं, वही इस दुनिया का नेतृत्व करेंगे क्योंकि वह मानवीय अनुभवों से परिपूर्ण हैं।

फिर उन्होंने अवधारणात्मक पूर्व की बात की, कि पूर्व एक अवधारणा है, यह किसी क्षेत्र या धर्म के आधार पर नहीं है बल्कि विश्व के दृष्टिकोण के आधार पर है। पूर्व में रहने वाले भी पश्चिमी हो सकते हैं, और अब पश्चिम में भी शोधार्थी एक नए पैराडाइम पर काम कर रहे हैं, शोध कर रहे हैं। इस धरती की कभी न ख़त्म होने वाली शान्ति के लिए एक ऐसे मानव की शोध में है जो वाम और दक्षिण के विचारों से दूर होगा, पूंजीवादी और वामपंथी विचारों से दूर होगा, वह एकात्म मानवतावादी होगा और वही हिंदुत्व का सार है।”

उसके बाद उन्होंने दीन दयाल जी के एकात्म मानवतावाद के विषय में बात करते हुए जर्मनी की दीवार के ढहने की बात की और कहा कि जर्मनी के लोग राष्ट्रीय पहचान को नहीं भूले। फिर उन्होंने यूएसएसआर के विघटन की बात करते हुए कहा कि जहाँ एक ओर जर्मनी ने बर्लिन की दीवार ढहाई तो वहीं यूएसएसआर विखंडित हुआ, क्योंकि वह जबरन एक थे। इसलिए न ही बलात विभाजित किया जा सकता है और न ही बलात जोड़ा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि संस्कृति ही इसका आधार है।

आगे उन्होंने नॉन-वेस्टर्न दृष्टिकोण की बात की और राम मनोहर लोहिया के राम, कृष्ण और शिव निबंध की बात करते हुए कहा कि यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है, और नॉन-वेस्टर्न दृष्टिकोण है, जिससे लोग शान्ति से रह सकें।

इस पूरे संबोधन से कथित वैचारिक एकता का सार तो प्राप्त होता है, परन्तु कुछ घटनाओं के परिदृश्य में प्रश्न उत्पन्न होते हैं। इस पूरे संबोधन में हिन्दू शब्द आया है, हिन्दू संस्कृति आई है, परन्तु हिन्दू धर्म को मात्र सांस्कृतिक बताकर छोड़ दिया है। क्या हिन्दू धर्म मात्र सांस्कृतिक है और उसका कोई अस्तित्व नहीं? धार्मिकता और आध्यात्मिकता कहाँ हैं? हिन्दू मात्र संस्कृति नहीं है, वह आध्यात्मिकता है और धर्म है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा मात्र तभी तक भारतीय है, जब तक हिन्दू बहुसंख्यक है। धर्म के बदलते ही संस्कृति नहीं बदलती है क्या?

यदि नहीं, तो पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हिन्दू धर्म के विलुप्त होते ही संस्कृति क्यों बदल गयी?  ईरान में वैदिक अग्नि पूजक पारसी धर्म का विलोप होते ही पारसी संस्कृति और धर्म का विलोप हो गया, और आज वह इस्लामिक संस्कृति है और बुर्का तहजीब आ गयी, जो वेदों में कहीं भी नहीं है! अर्थात जिस हिन्दू संस्कृति की बात दत्तात्रेय होसाबले कर रहे हैं, वह विशुद्ध रूप से धार्मिक हिन्दू संस्कृति है, और जहाँ जहाँ से हिन्दू धर्म विलुप्त हुआ, वहाँ की संस्कृति तहजीब में बदल गयी! इसलिए धर्म और संस्कृति का भ्रम दूर करना ही होगा! धर्म और संस्कृति अलग नहीं हैं, जो धार्मिक हिन्दू है, वही धार्मिक हिन्दू संस्कृति है.

और जो सबसे महत्वपूर्ण बात इस पूरे संबोधन में गायब थी, वह यह कि अंतत: इस कथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, जिसका मूल आरएसएस हिंदुत्व में बताता है, उसके कारण खतरा क्या है और उसके शिकार कौन हैं और हिन्दुओं पर आक्रमण क्या वेस्ट कर रहा है या कोई और?

जिस समय आरएसएस स्वयं को वाम और दक्षिण से मुक्त कर रहा था, उसी समय अमेरिका से एक महत्वपूर्ण समाचार आया।

यह समाचार था कि कैसे वेस्ट अर्थात पश्चिम में, अमेरिका के एक कॉलेज में तीन हिन्दू प्रोफेसर्स को केवल इसलिए एक मुस्लिम लड़की ने अपना शिकार बनाने की कोशिश की, क्योंकि वह हिन्दू थे। वह धार्मिक रूप से हिन्दू नामधारी थे इसलिए वह शिकार हुए।  अमेरिका में डार्टमाउथ कॉलेज में एक मुस्लिम छात्रा ने अपने प्रोफेसर्स पर आरोप लगाया कि उन्होंने उसे उसके मजहब के आधार पर प्रताड़ित किया।

यह उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सांस्कृतिक नहीं बल्कि हिन्दू नामधारी धार्मिक व्यक्ति वेस्ट का नहीं, बल्कि इस्लाम का शिकार है। वह इस्लामी जिहाद के निशाने पर है, फिर चाहे वह किसी भी रूप में हो, वह लाल वामपंथ के निशाने पर है!

इस कॉलेज की एक कम्प्यूटर साइंस की शोधार्थी महा हसन अलाश्वी ने अपने तीन हिन्दू प्रोफेसर्स पर आरोप लगा दिया कि उसे इसलिए फेल किया जा रहा है क्योंकि तीन प्रोफ़ेसर हिन्दू हैं और ऐसा उसका विश्वास है कि हिन्दू मुस्लिमों से चिढ़ते हैं, उनसे घृणा करते हैं, इसलिए उन तीनों ने उसे निशाना बनाया है

उसने इन दावों के साथ यह भी दावा किया था कि उसके शोध सलाहकार डॉ अल्बर्टो क्वात्रिनी ली ने भी उसका यौन शोषण करने का प्रयास किया था, पर ली ने उसके इस दावे को झूठा साबित कर दिया था क्योंकि वह उन तिथियों पर वहां थे ही नहीं!

उसके बाद महा हसन ने अपने कोर्स के सम्बन्ध में प्रोफ़ेसर प्रसाद जयंती से अनुमति माँगी। परन्तु उसके आगे कोर्स के लिए नियमों के अनुसार उसके अंक नहीं थे, या कहें उसका प्रदर्शन ठीक नहीं था, तो प्रोफ़ेसर जयंती ने उसकी इच्छानुसार कोर्स में आगे बढ़ने से इंकार कर दिया। क्योंकि उसके अंक नहीं थे। या नियमानुसार उसकी कोई कमी थी।

परन्तु महा हसन ने पहले तो यह कहा कि वह उसे इसलिए रोक रहे हैं क्योंकि उसने उनके  उनके पूर्व सहकर्मी के खिलाफ यौन शिकायत दर्ज कराई है। फिर महा ने एक और चाल चलते हुए कहा कि उसके खिलाफ यह कार्यवाही इसलिए की जा रही है क्योंकि वह एक मुस्लिम है। और महा ने प्रसाद जयंती को ही नहीं बल्कि दो और कम्प्यूटर साइंस के प्रोफेसर्स अमित चक्रबर्ती और दीपर्नाब चक्रबर्ती को भी इस शिकायत के दायरे में ले लिया।

9 जून को 2020 को इसने प्रोफ़ेसर जयंती के खिलाफ “सत्ता के दुरूपयोग” का आरोप लगाते हुए पोस्ट लिखा था कि प्रोफ़ेसर जयंती ने अपनी सत्ता के दुरूपयोग के चलते उसे फेल किया है। हालांकि कॉलेज ने जब जांच कराई थी तो पाया था कि प्रोफ़ेसर ने किसी भी नियम का कोई उल्लंघन नहीं किया है और न ही डार्टमाउथ की किसी नीति का कहीं उल्लंघन किया है।

परन्तु महा हसन यहीं नहीं रुकी और उसने कहा कि यह रिपोर्ट झूठी है और फिर दूसरी जाँच के लिए भूख हड़ताल चालू कर दी। उस भूख हड़ताल को हिन्दुओं को गाली देने के लिए प्रयोग किया गया,

जब कॉलेज में महा के लिए समर्थन बढ़ा, और सोशल मीडिया पर भी यह बात उठने लगी तो दबाव से डरकर डार्टमाउथ कॉलेज के रजिस्टर और ग्वारिनी स्कूल ऑफ ग्रेजुएट एंड एडवांस्ड स्टडीज, के असिस्टेंट डीन ने महा के दावों की जाँच के लिए बाहरी जाँच का प्रस्ताव दिया।

महा के आरोप और आरएसएस के दावों पर दृष्टि डालनी आवश्यक है:

महा ने शिकायत में लिखा था कि उसका विश्वास है कि हिन्दुओं को मुसलमानों को प्रताड़ित देखना अच्छा लगता है, और फिर उसने कहा कि उसे लगता है कि हिन्दू फैकल्टी सदस्य उसे गाली दे रहे थे। और उसने अपने किसी भारतीय स्रोत से सुना था कि प्रोफ़ेसर जयंती का सम्बन्ध हिन्दू वादी संगठन- आरएसएससे है!

यहाँ पर ध्यान देना है कि उसने यह सुना कि वह एक “हिंदूवादी संगठन” आरएसएस के सदस्य हैं! और उसने अपने दावे में कोई ठोस कारण या तथ्य नहीं दिए गए थे। परन्तु उसे नहीं पता होगा कि आरएसएस तो धार्मिक हिन्दू में विश्वास ही नहीं करता, आरएसएस के लिए भौगोलिक और सांस्कृतिक हिन्दू ही हिन्दू है! फिर प्रोफेसर जयंती पर आरएसएस का होने का आरोप कैसे लगा दिया?

इतना ही नहीं महा हसन ने प्रोफ़ेसर की बेटी को भी इसमें घसीट लिया। महा हसन का समर्थन करने वाले लोगों ने प्रोफ़ेसर जयंती के बहाने हिंदुत्व और हिन्दुओं को भी खूब अपशब्द कहे।

क्या वह सांस्कृतिक हिन्दू के लिए थे या धार्मिक हिन्दू के लिए?

प्रोफ़ेसर जयंती को धमकियां भी मिलीं, जो उन्होंने पुलिस के साथ साझा की।

हालांकि महा हसन अपने इस दावे के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं दे पाई कि प्रोफ़ेसर जयंती आरएसएस से जुड़े थे।

यह पूरी घटना अत्यंत हैरान करने वाली है, दो कारणों से! एक तो यह कि धार्मिक हिन्दुओं को मात्र इस आधार पर निशाना बनाना बहुत आसान हो गया है कि वह हिन्दू है! और यदि वह अपने धार्मिक विधि विधानों का पालन कर रहा है, तो उसे “संघी” कहकर अपमानित करना और भी सरल हो गया है, जबकि संघ के अनुसार हिंदुत्व में मूर्तिपूजा नहीं है, संघ के अनुसार हिंदुत्व में समान डीएनए कल्चर है, और उनके अनुसार हिन्दू भी भौगोलिक हिन्दू है, धार्मिक और अध्यात्मिक हिन्दू नहीं। हालांकि प्रोफ़ेसर जयंती और उनके दोनों साथियों को कॉलेज से क्लीन चिट मिल गयी है

एक पैटर्न दिखाई देता है। जैसे पहले हिन्दुओं की मेधा को नष्ट किए जाने के लिए मन्दिरों को तोड़े जाने का षड्यंत्र रचा गया, वैसे ही अब मेधाओं को तोड़े जाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।

हिन्दुओं की मेधा का प्रमाण आज पूरे विश्व में पसरा है, और चूंकि आज धार्मिक हिन्दू अपनी धार्मिक पहचान छिपाते नहीं हैं, तो वह और निशाने पर आ रहे हैं। प्रोफेसर जयंती पर क्यों आरएसएस का होने का आरोप लगा, यह नहीं पता, पर आरएसएस की ओर से भी यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि प्रोफ़ेसर जयंती उसके सदस्य थे या नहीं!

अभी अक्टूबर को कई अमेरिकी राज्यों में हिन्दू हेरिटेज मंथ के रूप में मनाया जा रहा है, क्योंकि धार्मिक हिन्दुओं के त्यौहार अधिकतर इसी माह में आते हैं, यह याद रखा जाए कि जिस संस्कृति को पूरा विश्व सम्मान दे रहा है, वह हिन्दुओं की धार्मिकता से जुडी है, आध्यात्मिकता से जुडी है! सांस्कृतिक हिंदुत्व केवल तभी तक है, जब तक अध्यात्मिक हिंदुत्व है, जब तक धार्मिक हिंदुत्व है! उस संस्कृति को जीवित रखने के लिए जीवंत धर्म राम को पुन: जीवन में लाना पड़ता है! प्रभु श्री राम हमारे धर्म के जीवंत प्रतीक हैं, परन्तु राम को केवल संस्कृति मानने वाला संघ प्रभु श्री राम को इमामे हिन्द जैसी तुच्छ उपमा देने वालों के साथ खड़ा दिखता है!

एक प्रश्न बार बार उभर कर आता है कि क्या धार्मिकता और आध्यात्मिकता रहित आरएसएस के इस भौगोलिक और सांस्कृतिक हिंदुत्व का शिकार धार्मिक और आध्यात्मिक हिन्दू हो रहे हैं? क्योंकि हमने अपने लेख में भी इस विषय में कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए थे कि कैसे किसी भी धार्मिक कर्मकांड करने पर संघी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है और फिर न केवल जिहादी आतंकवादी बल्कि साथ ही वह पश्चिमी एकेडमिक आतंकवाद के भी निशाने पर आ जाते हैं!

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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