सोवियत संघ के ढ़हने के 25 साल: गोर्वाच्योब ने सोवियत संघ को तोड़कर ‘स्टालिनवाद’ से आखिर किस बात का लिया था बदला?

26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ टूट कर बिखर गया। दुनिया की एक तिहाई आबादी को तानाशाहीपूर्ण साम्यवादी व्यवस्था के अधीन लाने वाले सोवियत संघ के बिखरने का कारण क्या रहा? परमाणु शक्ति से लेकर दुनिया में पहली बार अंतरिक्ष में मानव को भेजने वाले सोवियत संघ के 15 टुकड़े हो गए। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में रूस को इसका प्रतिनिधित्व मिला और फिर रसिया कई तरह के संकटों से घिरता चला गया। वर्तमान में राष्ट्रपति पुतिन के नेतृत्व में यह फिर से अमेरिका को चुनौती देने की स्थिति में आ चुका है। मेरी आगामी पुस्तक ‘कहानी कम्युनिस्टों की'(1917-1964) का पहला खंड 15 जनवरी को बाजार में आ रहा है, जबकि यह तीसरे खंड की विषय वस्तु है। लेकिन इस साल सोवियत विखंडन के 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में मैंने ‘यथावत’ पत्रिका के लिए एक लेख लिखा है, जो आप पाठकों के लिए प्रस्तुत है। आज की पीढ़ी को शायद ही पता हो कि आखिर सोवियत संघ का विखंडन क्यों हुआ, किस तरह से इसके बाद रसिया का विकास हुआ और किस तरह से पुतिन सत्ता में आकर इतने मजबूत हुए! हिंदी या अंग्रेजी में भी आपको इस संपूर्णता के साथ सोवियत विखंडन पर कोई आलेख नहीं मिलेगा। आपके लिए एक रोमांचपूर्ण इतिहास से पर्दा उठाता यह आलेख….संदीप देव।

बर्लिन की दीवार के ढहने के 25 साल पूरे होने पर सन् 2014 में अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों ने जबरदस्त जश्न मनाया था। बर्लिन की दीवार 9 नवंबर 1989 में ढही थी, जिसे सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच शीतयुद्ध के खात्मे के तौर पर देखा जाता है। लेकिन यह किसने कल्पना की थी कि दुनिया की एक तिहाई आबादी को अधिनायकवादी साम्यवादी व्यवस्था के अधीन लाने वाले सोवियत संघ का वजूद ही एक दिन समाप्त हो जाएगा! बर्लिन की दीवार के ढ़हने के करीब तीन साल बाद ऐसा ही हुआ, और सोवियत संघ 15 टुकड़ों में विभक्त हो गया।

26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ का विघटन हो गया। इस साल 2016 में सोवियत संघ के विघटन का भी 25 वर्ष पूरा हो गया है, लेकिन बर्लिन की दीवार के ढहने के समान अमेरिकी और पश्चिमी यूरोपीय देशों में इसको लेकर कहीं कोई जश्न नहीं है! बल्कि रूस और सीरिया की ओर से अलेप्पो शहर पर की गई संयुक्त कार्रवाई ने दुनिया को फिर से ‘शीत युद्ध’ के दौर की याद दिलानी शुरु कर दी है! अमेरिका ने अलेप्पे शहर पर की गई कार्रवाई को बर्बरतापूर्ण बताते हुए इसे युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा है, तो वहीं रूसी राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन ने अमेरिका के इस कदम पर विरोध जताते हुए इसे साफ तौर पर रूस और अमेरिका के बीच संबंधों के खराब होने का परिणाम बताया है। पुतिन ने यह भी कहा कि ओबामा प्रशासन संवाद करने की जगह आदेश देने की प्रवृत्ति दर्शा रहा है, जिसे रूस उचित नहीं मानता।

सीरिया संकट के आलोक में देखें तो सोवियत संघ के विघटन के 25 साल बाद दुनिया फिर से वहीं खड़ी दिखती है, जहां वह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद खड़ी थी! ऐसा लगता है कि सोवियत संघ के विघटन से अपनी प्रभावकारी भूमिका को खो चुका रूस, फिर से दुनिया में अपने दबदबे को कायम करना चाहता है। उसकी मंशा पश्चिमी देशों से अपने अपमान का बदला लेने की है, जो सोवियत संघ के विघटन के बाद से उसे लगातार महसूस हो रहा है! रूस को लगा रहा है कि शीत यु़द्ध के खात्मे के बाद एक राष्ट्र के तौर पर उसे जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला है, और इसे प्रभाव बढ़ाकर ही हासिल किया जा सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सोवियत संघ के विघटन के बाद फिर क्या बदला?

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1991 के 26 दिसंबर को सोवियत रिपब्लिक घोषणा पत्र संख्या- 142 एच पर हस्ताक्षर कर सोवियत संघ के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाईल गोर्वाच्योब ने सोवियत संघ के विघटन को ज्यों ही औपचारिक रूप दिया, 15 गणतांत्रिक राज्यों का समूह सोवियत संघ से टूट कर रातों रात अलग हो गया। इस घोषणा के बाद पूर्व सोवियत संघ के सभी राष्ट्र स्वतंत्र हो गए। उन्होंने स्वतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रमंडल (CIS) का गठन जरूर किया, जिसमें सभी राष्ट्र संप्रभुता के साथ शामिल हुए, लेकिन इसके अलावा अमेरिकी नेतृत्व वाले NATO सहित अन्य गठबंधनों में शामिल होने की भी उन्हें स्वतंत्रता मिल गई। मिखाईल गोर्वाच्योब सोवियत संघ के आखिरी राष्ट्रपति साबित हुए। उन्होंने सोवियत परमाणु प्रक्षेपास्त्र लांचिंग कोड रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्ससिन को सौंप दिया, जिसका अर्थ यह था कि संयुक्त राष्ट्र संघ में सोवियत संघ की दावेदारी पर अब केवल रूस का अधिकार था, न कि 14 उन राज्यों का, जो संघ से अलग हुए थे। क्रेमलिन में सोवियत संघ के झंडे को हटाकर 1917 के साम्यवादी क्रांति के पहले के रूसी झंडे को औपचारिक झंडा मानते हुए फहरा दिया गया और एक झटके में दो ध्रुवीय विश्व एक ध्रुवीय रह गया।

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11 मार्च 1985 में 54 साल के मिखाइल गोर्वाच्योब सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने। केंद्रीयकृत शासन प्रणाली, खराब अर्थव्यवस्था और क्रूरतम राजनीतिक ढांचा गोर्वाच्योब को विरासत में मिली। सोवियत संघ को ‘स्टालिनवाद’ से मुक्ति दिलाने का अभियान तो निकिता ख्रुश्चेव ने 1956 में अपने गुप्त भाषण में स्टालिन की क्रूरता को उजागर कर पहले ही शुरु कर दिया था, लेकिन इसे अंजाम तक पहुंचाया मिखाइल गोर्वाच्योब ने। वास्तव में गोर्वाच्योब और उनका परिवार 1930 के दशक में स्टालिनवादी क्रूरता का शिकार हो चुका था, जिसके कारण गोर्वाच्ययोब के मन में कहीं न कहीं स्टालिनवाद के खिलाफ वह बीज अंकुरित था, जिसने 1991 में सोवियत संघ को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास किया और सोवियत संघ टूट गया।

गोर्वाच्योब के दादा किसान थे, जिसे स्टालिन के आतंक के राज में गिरफ्तार किया गया था। उनकी पत्नी राइसा के नाना को भी गिरफ्तार किया गया था। आर्ची ब्राउन की पुस्तक ‘द राइज एंड फॉल ऑफ कम्युनिज्म’ के अनुसार, राइसा गोर्वाच्योब ने कहा- ‘दुश्मन की पत्नी होने की वजह से मेरी नानी भूख और विषाद के कारण मृत्यु को प्राप्त हुई। अपने पीछे वह चार बच्चों को भाग्य के भरोसे छोड़ गई।’

मिखाईल गोर्वाच्योब के परिवार को 1930 के दशक में जिस विपत्ति का सामना करना पड़ा, वह जोसेफ स्टालिन से किसी निजी दुश्मनी के कारण नहीं, बल्कि स्टालिनवादी तानाशाही क्रूर व्यवस्था के कारण, जिसे आखिर में ढहाने का श्रेय गोर्वाच्योब को ही गया। गोर्वाच्योब ने सोवियत संघ में मार्क्सवादी-लेनिनवादी-स्टालिनवादी व्यवस्था को एक तरह से पुनःसंगठित किया और उसमें पूरी तरह से बदलाव ला दिया। आर्ची ब्राउन लिखते हैं- ‘1988 की गर्मियों में गोर्वाच्योब ने अतिवादी बदलाव को व्यवस्थित रुपांतरण में तब्दील करने का काम शुरू कर दिया था।’

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “गोर्वाच्योब ने ‘पेरेस्त्रोइका’ (सरकार का नियंत्रण कम करना) और ‘ग्लासनोस्त’ (खुलेपन और पारदर्शिता को अपनाने की कोशिश) नाम की दो नीतियां शुरू कीं। गोर्बाचोफ को लगा कि इससे निजी उद्यम को फायदा होगा, नवोन्मेष बढ़ेंगे और आगे चलकर विदेशी निवेश भी सोवियत संघ में होगा। उन्होंने मजदूरों को हड़ताल करने का अधिकार दिया ताकि वो बेहतर वेतन और काम के हालात की मांग करें। सोल्जेनित्सिन और जॉर्ज ऑरवेल जैसे लेखकों की किताबों पर लगा प्रतिबंध हटाया गया। राजनीतिक कैदियों को रिहा किया गया और अखबारों को सरकार की नीतियों की आलोचना के लिए प्रोत्साहित किया गया। पहली बार चुनाव की कोशिश हुई और इसमें कम्युनिस्ट पार्टी शामिल हुई। नतीजतन ज्यादा राशन खरीदने के लिए लोगों की लाइनें लग गईं। कीमतें बढ़ने लग गईं और लोग गोर्बाचोफ के शासन से परेशान होने लगे। उसी साल 25 दिसंबर की रात गोर्बाचोफ ने इस्तीफा दिया और अगले दिन उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए गए, जिसके तहत सोवियत संघ के सभी अंग अलग अलग हो गए।”

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दरअसल केंद्रीयकृत साम्यवादी व्यवस्था के कारण सोवियत संघ में आर्थिक सुधारों का पहिया पूरी तरह से रुका पड़ा था। साम्यवादी व्यवस्था सोवियत समाज में बदलाव लाने में अक्षम और प्रभावहीन साबित हो रहा था। जिस वर्ग की समाप्ति का सपना सर्वहारा को दिखाते हुए उनके नाम पर अधिनायकवादी व्यवस्था की स्थापना लेनिन ने 1917 में की थी, वह दमनात्मक और अत्याचारपूर्ण व्यवस्था में तब्दील हो चुका था। समाज में सुधार का कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा था। शीत युद्ध के दौरान पूंजीवादी अमेरिका से प्रतिस्पर्द्धा करते-करते हथियारों और परमाणु आयुधों की दौड़ में सोवियत संघ पीसता जा रहा था। अधिनायकवादी केंद्रीकृत व्यवस्था की जगह उदारीकरण और लोकतंत्रात्मक व्यवस्था की जरूरत सोवियत समाज में महसूस की जाने लगी थी। 1980 के दशक के मध्य आते-आते आर्थिक विफलता ने लोगों में रोष उत्पन्न करना शुरू कर दिया था। सर्वहारा की बात करने वाले कम्युनिस्ट पार्टी ने एक नए राजनीतिक अभिजात वर्ग को जन्म दिया था। इस राजनीतिक अभिजात वर्ग और जनता के बीच अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ती जा रही थी। सोवियत संघ के देशों और पश्चिमी पूंजीवादी देशों के बीच लोगों के रहन-सहन और जीवनशैली में जमीन-आसमान का अंतर उत्पन्न हो चुका था। यहां तक कि एशिया के नए देश भी सोवियत संघ से अधिक आर्थिक विकास दर को हासिल कर रहे थे।

10 मार्च 1985 को चारनेनको की मृत्यु के समय मिखाईल गोर्वाच्योब कम्युनिस्ट पार्टी के द्वितीय महासचिव थे। प्रमुख क्रेमलिन लीडरशिप ने उन्हें सोवियत नेतृत्व में पहले पायदान पर खड़ा कर दिया। पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति द्वारा गोर्वाच्योब को न केवल पार्टी का महासचिव नियुक्त किया गया, बल्कि उन्हें देश का प्रमुख भी बना दिया गया। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि गोर्वाच्योब सोवियत संघ की विदेश नीति को बदलने का कदम उठाएंगे, लेकिन गोर्वाच्योब के दिमाग में तो कुछ और ही था। उन्होंने आते ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पारदर्शिता की बात की और बदलाव की दिशा में कदम बढ़ा दिया। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर्ची ब्राउन के अनुसार, ‘गोर्वाच्योब को न तो किसी सुधारवादी होने के कारण चुना गया था न नरमवादी होने के कारण, बल्कि वह उस वक्त पार्टी में राजनीतिक रूप से सबसे मजबूत स्थिति में थे, साथ ही वह काफी उत्साही और तीक्ष्ण बुद्धि वाले भी थे, जिस कारण पार्टी के चयनकर्ताओं ने उन्हें चुना था। इसके साथ अन्य सोवियत नेताओं की अपेक्षा उनका युवा होना भी उनके पक्ष में गया था।’

मजबूत स्थिति को हासिल करते ही गोर्वाच्योब ने सुप्रीम सोवियत के प्रेसीडियम के चेयरमैन आंद्रे ग्रोमायको के साथ समझौतावादी रुख अख्तियार किया। नियमानुसार आंद्रे ग्रोमायको राज्य के प्रमुख थे, इसलिए गोर्वाच्योब ने तीन साल तक ग्रोमायको का पूरा विश्वास अर्जित करने में लगाया। यह ग्रोमायको ही थे, जिसने गोर्वाच्योब का नाम 11 मार्च 1985 में पोलित ब्यूरो की बैठक में आगे बढ़ाया था, इसलिए उन्हें गोर्वाच्योब पर भरोसा था कि वह सोवियत विदेश व अर्थनीति को पूर्ववत जारी रखेंगे। लेकिन गोर्वाच्योब तो ‘पेरेस्त्रोइका’ और ‘ग्लासनोस्त’ की नीति को लागू करने का मन बना चुके थे। आंद्रे ग्रोमायको 1957 से लगातार 30 साल तक सोवियत संघ के विदेश मंत्री रहे, इसलिए उनकी मर्जी के बिना विदेश नीति में बदलाव संभव नहीं था, वह भी तब जब गोर्वाच्योब के नेतृत्व संभालने के तीन महीने के भीतर ग्रोमायको और भी अधिक सम्मानित पद पर पहुंचते हुए राज्य प्रमुख बन चुके थे।

गोर्वाच्योब ने सबसे पहले पार्टी के प्रथम सचिव एडवर्ड शेवर्डनाडेज को सोवियत संघ का विदेश मंत्री बनाने का प्रस्ताव पार्टी में पेश किया और उसे पास करवा लिया। शेवर्डनाडेज को इससे पहले विदेश मंत्रालय का कोई अनुभव नहीं था। उन्हें केवल गोर्वाच्योब के साथ अच्छे रिश्ते होने का पुरस्कार दिया गया था। गोर्वाच्योब व शेवर्डनाडेज दोनों ने एक नए दृष्टिकोण के साथ सोवियत संघ की बंद विदेश नीति को पश्चिमी देशों के लिए खोलने की दिशा में कदम बढ़ाया। अमेरिका से रिश्ते सुधारे गए। अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के साथ गोर्वाच्योब ने निशस्त्रीकरण के समझौते पर हस्ताक्षर किए। ग्रोमायको के विदेश मंत्री रहते यह कभी संभव नहीं था। इस तरह सोवियत संघ की विदेश नीति में नई खिड़कियां खुली, जो उसे अमेरिका व पश्चिमी देशों के नजदीक लेकर गई।

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गोर्वाच्योब की दूसरी समस्या देश की खस्ताहाल आर्थिक व्यवस्था को गति देना था। सोवियत संघ का समाज शराब की लत में बुरी तरह से जकड़ा हुआ था। गोर्वाच्योब ने सबसे पहले मई 1985 में शराबबंदी लागू की, जिस कारण पोलित ब्यूरो में उनका विरोध हुआ। इसकी वजह से सोवियत संघ में शराब के बड़े-बड़े दूकान बंद हो गए, जिस कारण सोवियत संघ में शराब का काला बाजार निर्मित हो गया, जिसे समाप्त करने के लिए कड़े कदम उठाए गए। पार्टी के अंदर सभी ने गोर्वाच्योब के इस तरह के सुधारों का विरोध किया। वह अकेले थे, जिन्होंने आर्थिक सुधारों की वकालत की।

गोर्वाच्योब ने पार्टी के अंदर इसे लेकर बहस को बढ़ाया और इसकी व्यवस्था की कि महासचिव से असहमति रखते हुए भी लोग खुलकर अपनी बात कहें। यही नहीं, उन्होंने पार्टी के अंदर के रुढि़वादी कम्युनिस्ट सदस्यों को पत्र लिखने का तरीका निकाला, ताकि संवाद को गति दिया जा सके। धीरे-धीरे पार्टी के रूढि़वादी सदस्यों जैसे- निकोलॉय टिकोनोव, ग्रिगोरी रामानोव व विक्टर ग्रिसिन को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया गया। मंत्रीमंडल के अध्यक्ष टिकोनोव को हटा दिया और उसकी जगह अपने समर्थक राइझोकोव को नियुक्त कर दिया। राइझोकोव को सोवियत आर्थिक व्यवस्था में सुधार का मुख्य दायित्व सौंपा गया। और इस तरह से पार्टी के अंदर गोर्वाच्योब ने शक्ति के केंद्र को बदल कर अपने पक्ष में कर लिया। अब वह कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थे। गोर्वाच्योब ने विशेषज्ञों की एक टीम बनाई, जिसने देश की अर्थव्यवस्था में उदारीकरण की वकालत की। बोरिस येल्तसिन, जो आगे चलकर रूस के राष्ट्रपति बने, उन्हें भी गोर्वाच्योब ने ही आगे बढ़ाया। ग्रिसिन को हटाकर गोर्वाच्योब ने येल्तसिन को मास्को पार्टी संगठन का प्रमुख बनाया। और इस तरह से गोर्वाच्योब सोवियत संघ को आर्थिक सुधार, उदारीकरण और लोकतांत्रिकरण की दिशा में आगे बढ़ाने में जुट गए।

बी.एन.खन्ना एवं लिपाक्षी अरोड़ा अपनी पुस्तक ‘भारत की विदेश नीति’ में लिखते हैं- “सन् 1989 के अंत में शीतयुद्ध समाप्त हो गया, परंतु सोवियत संघ में मिखाईल गोर्वाच्योब द्वारा आरंभ किए गए सुधारों की प्रक्रिया ने एक नया वातावरण उत्पन्न कर दिया। सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप के अनेक सोवियत समर्थक देशों में 1991 में अप्रत्याशित परिवर्तन हुए। साम्यवाद का आकस्मिक शक्तिपात हुआ, तथा पूर्वी यूरोप के देशों में लोकतांत्रिक सरकारों की स्थापना हुई। स्वयं भूतपूर्व सोवियत संघ में गोर्वाच्योब के सुधारों से उत्साहित होकर जनता ने लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त किए। सोवियत संघ में जहां 70 वर्ष से साम्यवादी दल द्वारा पूरी तरह से नियंत्रित अर्थव्यवस्था एवं राजनीति थी, वहां इन दोनों व्यवस्थाओं ने नया रूप प्राप्त किया। सुधारों ने साम्यवादी दल के एकाधिकार को भी समाप्त किया और 1991 में बहुदलीय लोकतंत्र के सि़द्धांत को स्वीकार कर लिया गया।”

लेखक द्वय आगे लिखते हैं- “अगस्त 1991 में कट्टरपंथी साम्यवादियों ने गोर्वाच्योब को अपदस्थ करने का असफल प्रयास किया। उनका प्रयत्न था कि सत्ता पुनः साम्यवादियों के हाथों में आ जाए। सोवियत संघ में अगस्त संकट के समय भारत से एक ऐसी भूल हो गई, जिसके लिए बाद में इस देश को पछताना पड़ा। भारत सरकार की ओर से, गोर्वाच्योब को अस्थायी रूप से अपदस्थ किए जाते ही, यह कहा गया कि वह सोवियत संघ का आंतरिक मामला था, और भारत, जो भी सरकार मास्को में होगी, उसके साथ मान्यतापूर्वक व्यवहार करेगा।”

उनके अनुसार, “दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का आकस्मिक विघटन हो गया। दो में से एक महाशक्ति का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। सोवियत संघ के स्थान पर 15 स्वतंत्र प्रभुसत्ता-संपन्न देशों ने संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता प्राप्त कर ली। रूस गणराज्य को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सोवियत संघ का उत्तराधिकारी राज्य स्वीकार किया और उसे सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता प्रदान की गई। विघटन के समय सोवियत संघ के भूतपूर्व गणराज्यों ने एक ढीला संघ स्थापित किया, जिसको स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रकुल कहा गया।”

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर्ची ब्राउन के अनुसार, ‘उदारीकरण और लोकतांत्रिकरण के कारण व्यवस्था संकट के दौर में पहुंची और सोवियत संघ टूट गया।’ ब्राउन के मुताबिक, ‘यदि गोर्बाचोफ आर्थिक सुधार की दिशा में कदम न बढ़ाते तो शायद आज भी सोवियत संघ का अस्तित्व बना रहता।’ उनके अनुसार, ‘जिस तेजी से सोवियत संघ टूटा वो भी एक ही रात में, वो सभी के लिए चकित करने वाला था!’

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दरअसल गोर्वाच्योब के सुधारों से घबरा कर उन्हें अपदस्थ करने की कोशिश साम्यवादियों के जिस गुट ने किया था, उसे सोवियत जासूसी संस्था KGB के प्रमुख का समर्थन प्राप्त था। गोर्वाच्योब की नई विदेश व आर्थिक नीति के कारण सोवियत संघ की जासूसी संस्था KGB बेहद नाराज हो गई। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “19 अगस्त 1991 के दिन केजीबी प्रमुख समेत आठ कम्युनिस्ट अधिकारियों ने सोवियत नेता मिखाइल गोर्बोचेफ को सत्ता से बेदखल कर दिया और एक आपात समिति का गठन किया। इस मुहिम के बाद गोर्बोचेफ को हिरासत में ले लिया गया था और मॉस्को की गलियों में टैंक प्रवेश कर गए। रेडियो पर घोषणा कर लोगों को कहा गया कि गोर्बोचेफ खराब स्वास्थ की वजह से अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभा पा रहे हैं। सोवियत संघ के न्यूज चौनलों ने गोर्बोचेफ की नीतियों की आलोचना भरी खबरें चलानी शुरु कर दी। KGB प्रमुख समेत आठ कम्युनिस्ट अधिकारियों ने अपातकाल की घोषणा करते हुए कहा कि वे देश को बर्बाद होने से बचाना चाहते हैं।

आठ दिसंबर 1991 को रूस, यूक्रेन और बेलारूस के नेताओं ने आपस में मुलाकात की और एक संधि पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेंडेंट स्टेट्स (CIS) का गठन किया गया। रूस ने खुद को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। 25 दिसंबर को मिखाइल गोर्बोचेफ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके अलगे दिन संसद ने सोवियत संघ का अस्तित्व खत्म होने की घोषणा कर दी। 1993 में रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और सोवियत युग के समय में चुनी संसद के बीच संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया। येल्तसिन ने रूसी संसद को भंग करने का आदेश दे दिया। तीन अक्तूबर को कई सांसदों और उनके समर्थन में उतरे हथियारबंद जनसेना ने मॉस्को में कई सरकारी इमारतों पर धावा बोल दिया और एक टीवी केंद्र पर कब्जा करने की कोशिश की। अगले दिन संसद पर टैंक से गोले बरसाए गए। कई लोग इस दौरान मारे गए। इस संघर्ष में येल्तसिन की जीत हुई जिसके बाद रूस ने नए संविधान के लिए मतदान किया।”

अब सवाल उठता है कि 1917 में बोल्शेविक क्रांति के बाद दुनिया में पहली मार्क्सवादी-लेनिनवादी साम्यवादी शासन व्यवस्था वाले, जर्मनी तानाशाह एडोल्फ हिटलर के साथ 23 अगस्त 1939 को ‘अनाक्रमण समझौता’ कर पूरी दुनिया को द्वितीय विश्व युद्ध में झोंकने वाले, विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के साथ शीतयुद्ध में पड़ने वाले, पूरे पूर्वी यूरोप को अपने गुट में करने वाले, दुनिया की दूसरी परमाणु शक्ति कहलाने वाले, अंतरिक्ष में पहला उपग्रह और मानव भेजने वाले सोवियत संघ का विघटन आखिर क्यों हुआ? विशेषज्ञों के अनुसार, सोवियत संघ की तानाशाही वाली केंद्रीकृत शासन व्यवस्था, लालफीताशाही वाली नौकरशाही व्यवस्था, सरकार नियंत्रित अर्थव्यवस्था, युद्ध जैसी स्थिति वाली विदेश नीति, लोगांे के मौलिक अधिकारों का हनन और उनमें स्वतंत्रता की इच्छा का पनपना और आखिर में मिखाईल गोर्वाच्योब की सुधारवादी नीति ही सोवियत संघ के विघटन का प्रमुख कारण बनी।

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सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस में नए संकटों का दौर शुरु हुआ। 11 दिसंबर 1994 में रूस और चेचेन्या के बीच युद्ध की शुरुआत हुई। चेचेन्या में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। वहां की बिगड़ती कानून व्यवस्था को देखते हुए रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने चेचन्या में रूसी सेना को भेज दिया। दो साल तक चले संघर्ष में हजारों लोग मारे गए। चेचन विद्रोहियों ने 14 जून, 1995 में रूस को सबक सिखाने के लिए दक्षिण रूस के बुदयोनफस्क में करीब 1600 लोगों को बंधक बना लिया। इन चरमपंथियों की मांग थी कि रूस चेचन्या में सैन्य कार्रवाई बंद करे और चेचन नेता दुदायेव से बात करे। रूस को चेचन विद्रोहियों की इन मांगों के आगे झुकना पड़ा। उसने बंदियों को छोड़े जाने के बदले चरमपंथी बासायेव और उसके साथियों को चेचन्या वापस जाने की अनुमति दे दी।

रूस चेचन्या संकट से निकला ही था कि ऋण संकट में फंस गया। आर्थिक रूप से तबाह रूस ने अगस्त, 1998 में सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की कि वो अपना ऋण नहीं चुका सकता है और प्रतिभूतियों का भुगतान नहीं कर सकता। इसके बाद रूसी मुद्रा की विनिमय दर काफी कम हो गई। एक महीने में रूसी रूबल की कीमत 70 फीसदी तक कम हो गई।

अगस्त, 1999 में चेचन चरमपंथियों ने रूस पर फिर से हमला किया। दागीस्तान और मास्को के कई अपार्टमेंट पर हमला किए गए। रूस ने फिर से चेचन्या में अपने सैनिक भेजे, जिसके कारण 30 सितंबर, 1999 को चेचन्या में दूसरा युद्ध शुरु हो गया। यह लड़ाई वैसे तो औपचारिक रूप से एक साल में समाप्त हो गया, लेकिन आतंकवाद को समाप्त करने के नाम पर यह लड़ाई करीब 10 साल तक चलता रहा, जिसमें 40 हजार से ज्यादा लोग मारे गए।

चेचन्या युद्ध के दौरान ही 31 दिसंबर 1999 को रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने देश को संबोधित करते हुए कहा कि वे समय से पहले अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं, इसलिए रूसी जनता से माफी मांगते हैं। येल्तसिन ने व्लादिमीर पुतिन को वहां का कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया। इसके तीन महीने बाद ही पुतिन को राष्ट्रपति चुनाव में जबरदस्त सफलता मिली। उसके बाद से ही पुतिन की पार्टी वहां लगातार सत्तासीन है। चेचन्या के विद्रोहियों के अलावा रूस को जॉर्जिया की क्रांति, यूक्रेन संकट, सीरिया संकट आदि से भी जूझना पड़ा। पुतिन के नेतृत्व में रूस फिर से अपनी खोई हुई शक्ति को प्राप्त करने में जुटा हुआ है, जिसमें उसे काफी हद तक सफलता मिलती दिख रही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी रूसी राष्ट्रपति पुतिन पर यह आरोप लगा कि वह वहां के चुनाव को अपने तरीके से प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के चुने हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जीत के लिए रूस और पुतिन ने हस्तक्षेप किया है। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इसे लेकर सवाल उठाया है। सीरिया के मुद्दे पर जिस तरह से अमेरिका और रूस के बीच तनातनी चल रही है, वह फिर से शीतयुद्ध कालीन विश्व की याद को ताजा कर रहा है। रूस जहां अपनी खोई हुई साख को पाने की कोशिश में जुटा है, वहीं अमेरिका उसे एक पराभव राष्ट्र मान कर चल रहा है और यही दोनों के बीच तनातनी का कारण बना हुआ है। सीरिया संकट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिसमें यह खतरा उत्पन्न हो गया है कि कहीं यह युद्ध तीसरे विश्व युद्ध की भूमिका न रच दे!

बीबीसी से बात करते हुए जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर सिक्योरिटी स्टडीज के सीनियर फेलो और पूर्व वरिष्ठ सी.आई.ए अधिकारी पॉल.आर. पीलर ने कहा, “रूस के साथ संबंध को लेकर शुरुआती गलतियां पश्चिमी देशों ने की हैं। रूस के साथ संबंध गलत दिशा में उस वक्त चले गए जब पश्चिम के देशों ने सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस को एक राष्ट्र के तौर पर सम्मान नहीं दिया। रूस का एक राष्ट्र के तौर पर नए देशों की बिरादरी के बीच सम्मान होना चाहिए था। लेकिन इसके बजाए उसे सोवियत संघ के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा गया है जो कि पश्चिमी देशों के अविश्वास की मुख्य वजह रही है।” उनके अनुसार, “नाटो के विस्तार के नाम पर पोलैंड, चेक रिपब्लिक और हंगरी जैसे देशों को इसमें शामिल करके इसे और गहरा दिया गया। ये सभी देश परंपरागत रूप से रूस के विरोधी रहे हैं। रूस के खिलाफ संघर्ष का इनका इतिहास रहा है। लेकिन नाटो का विस्तार सिर्फ यहीं पर नहीं रूका। इसके बाद तो नाटो में तीन बाल्टिक राज्यों को भी जोड़ा गया जो सोवियत संघ के हिस्से रह चुके थे। रूस को जॉर्जिया या यूक्रेन के पश्चिमी बिरादरी में शामिल होने का विरोध करना चाहिए।”

ब्रिटेन की खुफिया इंटेलीजेंस सर्विस (M 16) के पूर्व मुखिया सर जॉन सैवर्स हाल के मुताबिक, “पश्चिम के देशों ने पिछले आठ सालों में रूस के साथ अपने रणनीतिक संबंधों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। अगर अमरीका और रूस के बीच नियमों को लेकर स्पष्ट समझदारी विकसित की जाती तो सीरिया, यूक्रेन और उत्तरी कोरिया को लेकर क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान निकालना आसान होता।” उनके अनुसार, ‘अमरीका के अगले राष्ट्रपति पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होगी कि वो नए सिरे से रूस के साथ संबंधों को विकसित करें।’

26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ से टूट कर अलग हुए वो 15 गणराज्य-

– अरमेनिया
– अजरबेजान
– बेलारूस
– इस्टोनिया
– जॉर्जिया
– कजाकिस्तान
– किर्गिस्तान
– लताविया
– लिथुआनिया
– मोलडोवा
– रसिया
– तजाकिस्तान
– यूक्रेन
– तुर्कमेनिस्तान
– उजबेकिस्तान

साभारः यथावत (1 से 15 जनवरी 2017)

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Sandeep Deo

Sandeep Deo

Journalist with 18 yrs experience | Best selling author | Bloomsbury’s (Publisher of Harry Potter series) first Hindi writer | Written 8 books | Storyteller | Social Media Coach | Spiritual Counselor.

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