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तो क्या Attorney general ने अपनी ही (मोदी) सरकार को नीचा दिखाने के लिए यह खेल खेला?

भारत सरकार के महान्यायवादी, अर्थात Attorney general(AG) से इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि उन्हें कानून की सामान्य जानकारी होगी? लेकिन उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अटर्नी जनरल ने जिस तरह से मामले को पेश किया, वह साफ तौर पर उनके अनाड़ीपन को उजागर करता है! अटर्नी जनरल मामूली कानूनी पहलू के बारे में न जाने ऐसा कैसे हो सकता है? तो क्या यह अटर्नी जनरल की जानबूझ कर की गई कोशिश थी, जिसके कारण मोदी सरकार को शर्मिंदा होना पड़ा? क्या अटर्नी जनरल अपनी ही सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश करने में जुटे थे? क्या कांग्रेस सरकार के वकील कपिल सिब्बल के हित में अटर्नी जनरल ने उत्तराखंड मामले में अदालतों में सच रखने से परहेज किया?

पाठकों को यह जानकार बेहद आश्चर्य होगा कि अटर्नी जनरल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इतनी सी बात नहीं रख पाए कि जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो तो उसकी सारी विधायी शक्ति राष्ट्रपति के मार्फत राज्यपाल में निहित हो जाता है, ऐसे में सस्पेंडेड विधानसभा का अध्यक्ष विधायकों को अयोग्य ठहराने का निर्णय कैसे से ले सकता है? यह तथ्य अदालत में कभी भी बहस में अटर्नी जनरल ने रखा ही नहीं! आश्चर्य है! क्या प्रधानमंत्री मोदी अपनी ही सरकार में उनके पीठ पीछे चल रही साजिशों से वाकिफ हैं?

आइए तिथिवार एक बार पूरी घटनाक्रम पर नजर डालते हैं! उत्तराखंड के हालात को देखते हुए 25 मार्च की शाम मोदी मंत्रिमंडल ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने का निर्णय लिया। 26 मार्च की सुबह राष्ट्रपति ने इस पर हस्ताक्षर कर दिया, जिसके बाद से राष्ट्रपति शासन उत्तराखंड में लागू हो गया। राष्ट्रपति शासन लागू होते ही विधानसभा सस्पेंड हो गया। उस वक्त राज्य विधायिका की सारी शक्ति राष्ट्रपति में निहित हो गई, जिसे वह राज्यपाल के द्वारा क्रियान्वित करते हैं। यही संविधान कहता है!

उधर राष्ट्रपति शासन लागू होने के बावजूद 26 मार्च की शाम में उत्तराखंड विधानसभा के अध्यक्ष ने कांग्रेस के उन नौ विधायकों को अयोग्य घोषित करार दिया, जिन्होंने 18 मार्च को विधानसभा में पेश बजट में हरीश रावत सरकार की मुखालफत की थी! सवाल उठता है कि जब 26 मार्च की सुबह ही राष्ट्रपति शासन लागू हो गया और विधानसभा सस्पेंड हो गया तो विधानसभा का अध्यक्ष किस हैसियत से निर्णय ले सकता है? उस वक्त विधायिका की सारी शक्ति राज्यपाल के पास थी न कि विधानसभा के पास? लेकिन इसके बावजूद विधानसभा के अध्यक्ष ने विधायकों को अयोग्य घोषित करने का निर्णय लिया, जो कि पूरी तरह से असंवैधानिक है! जब उस समय विधानसभा अध्यक्ष के पास किसी तरह की शक्ति ही नहीं है तो वह किसी विधायक की सदस्यता को समाप्त कैसे कर सकता है?

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आपको आश्चर्य होगा कि हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई के दौरान अटर्नी जनरल ने इस मामूली संवैधानिक जानकारी को अदालत में रखा ही नहीं! हाईकोर्ट में करीब एक सप्ताह तक सुनवाई चली और अटर्नी जनरल लाव-लश्कर के साथ वहां जाते रहे, लेकिन इस संवैधानिक प्रावधान की व्याख्या नहीं की!

सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल.शर्मा ने एक विधायक की तरफ से 10 अप्रैल की सुबह 10.30 बजे सुप्रीम कोर्ट में इसे ही आधार बनाकर पेटीशन फाइल किया! सुप्रीम कोर्ट ने इस ग्राउंड को सही माना और कहा कि आप पहले क्यों नहीं आए? अदालत ने उनके पेटीशन को स्वीकार कर लिया है, जिस पर आगे सुनवाई होगी! वकील एम.एल.शर्मा कहते हैं, राष्ट्रपति शासन लगते ही जब विधानसभा अध्यक्ष की सारी शक्ति राज्यपाल के पास आ गई, तो अध्यक्ष कैसे निर्णय ले सकता है? यह बात अदालत में सरकार की तरफ से रखी ही नहीं गई और मेरे इसी ग्राउंड को सुप्रीम कोर्ट ने माना है।

तो क्या यह माना जाए कि अटर्नी जनरल ने अपनी ही सरकार के खिलाफ साजिश की और जानबूझ कर अदालत में संवैधानिक व्याख्या प्रस्तुत नहीं की? क्या एजी मुकुल रोहतगी जानबूझ कर उत्तराखंउ सरकार के वकील कपिल सिब्बल को ‘कानूनी पास’ दे रहे थे? आपको यह भी बता दूं कि मोदी सरकार के एक बहुत बड़े और ताकतवर मंत्री की संस्तुति पर मुकुल रोहतगी को महान्यायवादी बनाया गया था। तो क्या माना जाए कि ऐसे ताकतवर मंत्री कांग्रेस के हित में अपनी ही सरकार के खिलाफ साजिश में जुटे हैं?

अगस्तावेस्टलैंड मामले में भी डॉ सुब्रहमनियन स्वामी ने कहा है कि मोदी सरकार में बैठे कुछ मंत्री नहीं चाहते कि सोनिया गांधी पर कार्रवाई हो! तो क्या प्रधानमंत्री ऐसे मंत्रियों की भूमिका से वाकिफ नहीं हैं? आखिर क्या वजह है कि एक मामूली संवैधानिक व्याख्या को अदालत में अपने पक्ष के लिए रखा ही नहीं गया? यह इशारा कर रहा है कि मोदी सरकार के अंदर बहुत कुछ ऐसा है जो अभी भी कांग्रेस के इशारे पर चल रहा है!

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आखिर क्यों पड़ी थी उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने की जरूरत
उत्तराखंड में 18 मार्च को वित्त विधेयक पेश किया गया था। वित्त विधेयक पेश करने के सुबह ही भाजपा के एक विधायक को शक्तिमान घोड़े की टांग टूटने के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया था! विधानसभा में अब भाजपा के 28 की जगह 27 विधायक थे। इन 27 विधायक ने कहा कि वित्त विधेयक को पास कराने के लिए वोटिंग कराया जाए! हरीश रावत की सरकार बहुमत में थी, वोटिंग करा सकती थी, लेकिन उसने नहीं कराया? उन्हें शक था कि कांग्रेस के कुछ विधायक इस विधेयक का विरोध करेंगे! इतने में भाजपा के 27 के साथ कांग्रेस के 9 विधायक बेल में आकर नारेबाजी करने लगे और वोटिंग की मांग करने लगे। कांग्रेस के अपने ही घर में आग लगी थी! इस शोर-शराबे के बीच विधानसभा अध्यक्ष ने 22 वोट से वित्त विधेयक पास कर दिया!

संवैधानिक नियम है कि विधेयक के पास होने के बाद उसे राज्यपाल के पास हस्ताक्षर कराने के लिए भेजा जाता है ताकि वह लागू हो। हरीश रावत की सरकार ने विधेयक को राज्यपाल के पास भेजा ही नहीं! उन्हें जानकारी मिल गई कि भाजपा के 27 सहित कांग्रेस के नौ बागी विधायक राज्यपाल के पास परेड करने की तैयारी कर रहे हैं। ये लोग रात में राज्यपाल के पास गए थे और मांग की थी कि विधेयक को दोबारा पेश किया जाए! सरकार बहुमत में नहीं है! इसी बीच 24 तारीख को हरीश रावत का स्टिंग आ गया, जिसे जांच के बाद सही पाया गया है और स्वयं हरीश रावत ने भी स्वीकार किया है कि स्टिंग में मौजूद जो शख्स है वो वही हैं!

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वित्त विधेयक पास न होने की स्थिति में पहली अप्रैल से सरकार बजट खर्च नहीं कर सकती थी। इस स्थिति को देखते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 25 की शाम बैठक की और उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने का निर्णय लिया। 26 की सुबह राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया, विधानसभा सस्पेंड हो गया। इसके बावजूद विधानसभा अध्यक्ष ने 26 की शाम बैठक कर नौ विधायको को अयोग्य घोषित कर दिया, जो पूरी तरह से असंवैधानिक था!

इतनी-सी बात अटर्नी जनरल अदालत में नहीं रख पाए! यदि वह इसे रख देते और अदालत नहीं मानती तो बहस का मुद्दा था, लेकिन जब उन्होंने इस संवैधानिक व्याख्या के तर्क को अदालत में रखा ही नहीं तो यह साफ तौर पर अपनी ही सरकार के खिलाफ साजिश की ओर इशारा करता है!

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