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इंदिरा गांधी ने कैसे जरनैल सिंह भिंडरावाले को एक संत से आतंकवादी बना दिया!

एक समय था जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार को 1984 में सिख विरोधी दंगा के दौरान सामूहिक हत्या मामले में सजा होने की बात सोचना भी अकल्पनीय था। ध्यान देने वाली बात यह है कि इसका संज्ञान स्वयं हाईकोर्ट ने लिया था कि किस प्रकार सज्जन कुमार को कांग्रेस की ओर से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। जिस प्रकार राजीव गांधी के समय में सज्जन कुमार को संरक्षण प्राप्त था, उसी प्रकार इंदिरा गांधी के समय में खालिस्तान समर्थक आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सत्ता का संरक्षण प्राप्त था। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इंदिरा गांधी ने ही भिंडरावाले को एक संत से आतंकवादी बनाया था। यह खुलासा प्रसिद्ध लेखक स्वर्गीय कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा ‘बियॉन्ड द लाइन’ में किया था। उनकी आत्मकथा का कुछ अंश इंडिया टुडे ने प्रकाशित किया है।

इंडिया टुडे में ‘बियॉन्ड द लाइन’ के प्रकाशित अंश के मुताबिक संजय गांधी और जैल सिंह ने मिलकर जरनैल सिंह भिंडरावाले को पैदा किया था, जो शुरू में तो संत था लेकिन बाद में उसके पास इतनी ताकत आ गई कि वह भारतीय कानून को चुनौती देने लगा था। इस आशय का जिक्र नैयर ने अपनी आत्मकथा में किया था। उन्होंने लिखा है “एक बार जब मैं उनसे उनके कमरे में मिला तो पूछा कि आखिर आप इतने सशस्त्र लोगों से क्यों घिरे रहते हैं? उन्होंने उल्टे मुझसे जवाब देने को कहा कि पुलिस हथियार क्यों रखती है? मैंने कहा कि यह तो उसका दायित्व है कि किसी भी अनहोनी को रोके। हमारे इस जवाब पर भिंडरावाले का कहना था कि कभी उन्हें हमें चुनौती देने को कहिए तभी हम उसे दिखा देंगे कि किसके पास अधिकार है।’ सवाल उठता है कि इतनी ताकत भिंडरावाले को मिली कहां से?

दरअसल भिंडरावाले इंदिरा गांधी की देन थी। यह कहानी 1977 से शुरू होती है, जब इंदिरा गांधी पूरे देश में चुनाव हारने के साथ ही पंजाब में भी चुनाव हार गई थी। पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह की कुर्सी चली गई थी। वहां पर प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बन गई थी। उसी समय इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी और जैल सिंह ने मिलकर भिंडरावाले को पैदा किया। यह ज्ञानी जैल सिंह वही हैं, जिसे बाद में इसके एवज में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति बनाया था।

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मालूम हो कि इंदिरा गांधी के समय संजय गांधी के पास संविधानेत्तर अधिकार होता था। वैसे ही जैसे मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गांधी के पास अधिकार हुआ करता था। कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जब संजय गांधी से इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि किसी मुख्यमंत्री पर अंकुश रखने के लिए उसके ऊपर किसी संत को बैठना चाहिए।

उसी किताब में मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री कमल नाथ ने भी स्वीकार किया था कि अपने काम करने के लिए भिंडरावाले को कांग्रेस पैसे दिया करती थी। उन्होंने कहा था “जब हमने पहली बार भिंडरावाले का इंटरव्यू लिया था तो वह ‘साहसी टाइप’ बिल्कुल नहीं लगा था, हां वह अक्खर लगा था और लगा था कि वह हमारे उद्देश्य पूरा करने में सही साबित होगा। हम उसे अक्सर अपने काम के लिए पैसे दिया करते थे, लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा था कि वह आतंकवादी बन जाएगा।”

इस किताब में एक और वाकया का जिक्र है जिससे स्पष्ट होता है कि केंद्रीय मंत्री तक भी भिंडरावाले के सामने कुर्सी पर बैठने का साहस नहीं करते थे। कुलदीप नैयर ने लिखा है “एक दिन मैं भिंडरावाले के साथ एक रूप में बैठा था। उस रूम में एक ही कुर्सी थी जिसपर मै बैठा था, उसी समय केंद्रीय मंत्री स्वरण सिंह वहां आ गए, मुझे अकेले कुर्सी पर बैठा देख वह जमीन पर ही बैठ गए। जब मैंने उन्हें अपनी कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया तो वह बोल उठे कि किसी संत की मौजूदगी में वह जमीन पर ही बैठना उचित समझते हैं।” उसी समय से भिंडरावाले खुद को हर कानून से ऊपर मानता था। उसकी महत्वाकांक्षी इतनी ताकत अर्जित करने की थी ताकि भारत की न तो कोई पुलिस न ही सेना उसे चुनौती देने का साहस जुटा सके।

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इंदिरा गांधी किसी दूसरे की सरकार को बर्दाश्त नहीं कर पाती थी। इसलिए उसने पंजाब में प्रकाश सिह बादल की सरकार को अस्थिर करने के लिए भिंडरावाले को खड़ा किया। जबकि भिंडरावाले की महत्वाकांक्षा किसी से भी अधिक थी। दोनों एक दूसरे का उपयोग करने लगे। भिंडरावाले की राजनीतिक भूमिक 1977 से ही बढ़नी शुरू हुई। जब अकाली दल-जनता पार्टी ने पंजाब विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री जैल सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को हराकर पंजाब की सत्ता में आई। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में बनी सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री जैल सिंह की कारस्तानी के खिलाफ गुरदियाल सिंह आयोग का गठन किया था। उस आयोग ने जैल सिंह को अपनी पावर का दुरुपयोग करने का दोषी भी माना था। इसी कारण जैल सिंह ने संजय गांधी के साथ मिलकर भिंजरावाले का उपयोग करना शुरू कर दिया।

भिंडरावाले को राजनीतिक सुर्खी में आने का पहला मौका 13 अप्रैल 1978 को बैसाखी के दिन तब मिला जब सिखों का एक दस्ता निरंकारियों से भिड़ गया। मालूम हो कि निरंकारी खुद को सिख मानते हैं जबकि सिख निरंकारियों को सिख मानने को तैयार नहीं थे। इस हमले में 16 सिखों की मौत हो गई थी। बस क्या था इसी वाकये को लेकर भिंजरावाले ने अकाली दल के खिलाफ सिखों को भड़काना शुरू कर दिया। जब यह घटना घटी तब मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल मुंबई में थे। वहां से आते ही कई पुलिस वालों को निलंबित कर दिया तथा निरंकारी के मुखिया गुरबचन सिंह को गिरफ्तार किया। इतना सब करने के बावजूद सिखों के गुस्सा को शांत नहीं कर पाए। इस घटना का खामियाजा बादल को अगले चुनाव में हार कर चुकाना पड़ा।

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यहां से भिंडरावाले का जो दौर शुरू हुआ वह खालसा के नाम पर खालिस्तान की मांग पर जाकर खत्म हुआ। भिंडरावाले को जितनी ताकत मिलती गई उसका संतत्व खत्म होता चला गया। जब तक उसे ताकत मिली तब तक वह पूरे तौर पर आतंकवादी बन गया था और उसी इंदिरा सरकार को ललकारना शुरू कर दिया था। इंदिरा गांधी ने सत्ता के लालच में आतंकवाद का जो पेड़ लगाया था, बाद में उसी के अंत का कारण भी बन गया।

प्वाइंट वाइज समझिए

संत से शैतान बना भिंडरावाले

* पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने लालच में भिंडरावाले को किया था पैदा

* संजय गांधी और पूर्व राष्ट्रपति जैल सिंह ने भिंडरावाले को आगे बढ़ाया

* पंजाब की सरकार को गिराने के लिए लिया था भिंडरावाले का साथ

* अपने काम को अंजाम देने के लिए भिंडरावाले को दिया जाता था पैसा

* स्वर्गीय कुलदीप नैयर की आत्मकथा ‘बियॉन्ड द लाइन’ में हुआ है खुलासा

* कांग्रेस के कारण ही भिंडरावाले संत से बन गया ‘शैतान’ आतंकवादी

* सिखों की हत्या कराकर सिखों का तारणहार बन बैठा

* 13 अप्रैल 1978 को निरंकारियों के साथ सिखों के एक दस्ते की हुई थी भिड़ंत

* इस घटना में 16 सिखों की हो गई थी मौत

* इसी घटना से भिंडरावाले ने बादल के खिलाफ सिखों को भड़काना शुरू किया था

URL : How did Indira Gandhi make Bhindrawala a terrorist with a saint!

Keyword : From sant to terrorist, jarnail singh Bhindarawale, Indira Gandhi, Punjab Beyond the lines, autobiography, Kuldip Nayar, संत से सैतान, जरनैल सिंह भिंडरावाले

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1 Comment

  1. Avatar Bharakya says:

    Ye NETA satta ke laalach me kisi bhi had tak jaa sakte hain…

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