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India Speak Daily > Blog > समाचार > राजनीतिक खबर > राम-लक्ष्मण ने कैसे की एक अंग्रेज भक्त की सहायता! एक रोमांचकारी कथा।
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राम-लक्ष्मण ने कैसे की एक अंग्रेज भक्त की सहायता! एक रोमांचकारी कथा।

ISD News Network
Last updated: 2024/06/25 at 1:02 PM
By ISD News Network 181 Views 9 Min Read
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श्वेता पुरोहित।

आज जहाँ अयोध्या में राम पथ एक ही बारिश में टूट गया उससे ये साबित होता है कि राम जी का आशिर्वाद इस सरकार को नहीं मिला है.

इस के सम्बन्ध में परलोक और पुनर्जन्म की सत्य घटनाएँ पुस्तक में एक भक्ति से भरी सत्य कथा आती है जिससे ये साबित होता है कि यदि मनुष्य की भावना और भक्ति सच्ची हो तो श्री राम स्वयं अपने भक्त की रक्षा करने और पुल को बचाने आते हैं फिर चाहे वो कोई अंग्रेज ही क्यों ना हो.

वो कथा इस प्रकार है –

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🌿🌼 जब श्रीसीताराम ने अंग्रेज इंजीनियर के प्राणों की रक्षा की 🌼🌿

उदासीन सम्प्रदाय के महान् संत स्वामी रमेशचन्द्रजी महाराज ने एक बार अपने गीता-प्रवचनों के दौरान एक अंग्रेज इंजीनियर के जीवन की श्रीरामभक्ति के प्रत्यक्ष चमत्कार की घटना सुनायी थी। वह अंग्रेज इंजीनियर उन्हें बिहार में साधुवेष में विचरता हुआ मिला था।

स्वामीजी ने बताया कि एक अंग्रेज इंजीनियर ऑफिसर को काषायवस्त्रधारी परम वैष्णव साधु के वेष में देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ और मैंने उसे अपने पास बैठाकर पूछा- महाराज ! आपके जीवन में यह अद्भुत परिवर्तन कैसे हुआ?

उत्तर में वह फूट-फूटकर रोने लगा और लंबी साँस लेकर बोला- हाय, मैंने धर्मभूमि भारतमें जन्म नहीं लिया। मेरा इतना समय व्यर्थ ही बीत गया, जो मैंने श्रीसीतारामजी का भजन नहीं किया। फिर उसने मुझे अपने जीवनकी आश्चर्यजनक घटना सुनाते हुए कहा – ‘मैं एक इंजीनियर था और इंग्लैंड से बिहार में एक बड़ा डैम (बाँध) बनाने के लिये इंचार्ज के रूप में भारत आया था। बाँध बन रहा था कि अचानक बड़ी भयंकर वर्षा होनेसे बाँध टूटने का खतरा पैदा हो गया। बाँध में दरारें पड़ जाने से इस बात की पूरी-पूरी सम्भावना हो गयी कि बाँध अब नहीं बचेगा, अवश्य ही टूट जायगा। मैं बाँध के टूटने पर अपनी और अपने देश की बदनामी के डर से उदास और हताश हो गया था।

एक दिन मैं इसी चिन्ता में निमग्न बाँध पर टहल रहा था कि देखा, बाँधपर काम करने वाले पुरबिया मजदूर बाँध से कुछ दूरी पर गाना-बजाना कर रहे हैं मैं यह जाननेके लिये कि यह सब मिलकर क्या कर रहे हैं, उनके पास गया। उन पुरबियोंने उस स्थानपर एक छोटा-सा मन्दिर बना रखा था। उसीके सामने खड़े होकर वे सब लोग मिलकर तन्मय होकर गाना-बजाना कर रहे थे। मैं इस रहस्य को नहीं समझ सका, क्योंकि ऐसा दृश्य मैं अपने जीवनमें पहली बार देख रहा था। मैंने उनसे कीर्तन करनेका कारण पूछा तो उत्तरमें उन मजदूरों ने मुझे बताया कि ‘साहब! यह हमारी इष्टदेवी श्रीसीतादेवीका मन्दिर है, हम उन्हींका कीर्तन कर रहे हैं। जो इस मन्दिर में श्रीसीताजीके सामने सच्चे मनसे प्रार्थना करता है, उसकी इच्छा पूरी हो जाती है और उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।’ मैंने उनसे कहा कि ‘तुम लोग मेरी ओरसे अपनी देवी सीताजी से प्रार्थना करो कि मेरा बाँध बच जाय, टूटे नहीं। यदि बाँध बच गया तो मैं श्रीसीतादेवीजी का बहुत बढ़िया मन्दिर बनवा दूँगा और उसका सारा खर्च मैं दूँगा।’

मजदूर बोले- ‘साहब ! पहले आप दोनों हाथ जोड़कर हृदय से सीता माँ से प्रार्थना करें कि वे आपके संकट को दूर करें। इसके बाद हम प्रार्थना करेंगे, आपकी ओर से।’

मैं मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और रोते हुए करुणा के साथ मैंने प्रार्थना की- ‘हे माँ सीते ! मेरी इज्जत तथा मेरे प्राण दोनों की रक्षा आप करें। यदि डैम टूट गया तो मैं अपने प्राण दे दूँगा और डैम के बचते ही मैं अपना तमाम जीवन आपकी भक्ति में लगा दूँगा।’

बाद में उन मजदूरों ने भी मेरी ओर से देवी के सामने सच्चे हृदय से प्रार्थना की और बहुत आत्मविश्वास के साथ कहा- ‘जाओ तुम्हारा काम हो जायगा।’ मैं वापस अपनी कोठी पर आ गया। उसी शाम को जोर की बरसात शुरू हो गयी, मैंने सोचा कि आज बाँध नहीं बचेगा, यह अवश्य ही टूट जायगा। मेरे मन में आत्महत्या करने का विचार पैदा हो गया, इसीलिये मैंने अपने हाथों से वसीयत लिख दी। मैंने लिखा कि ‘मैं अपनी और अपने देशकी इज्जत न बचा पानेके कारण अपनी इच्छा से आत्महत्या कर रहा हूँ, इसमें किसी औरका कोई दोष नहीं है।’ यह लिखकर मैं डैम की ओर चल पड़ा। मैंने निश्चय किया कि मैं डैम पर जाकर खड़ा हो जाऊँगा और जब डैम टूटेगा तो उसके साथ ही मेरी भी मृत्यु हो जायगी। मैं डैम पर गया तो उस समय बरसात हो रही थी। मैं डैम पर चढ़ गया, तभी मैंने देखा किं डैम के नीचे दो नवयुवक खड़े हैं। उनमें से एक का रंग गोरा और दूसरेका रंग साँवला था। गोरा नवयुवक अपने हाथों से जमीन से मिट्टी उठाकर साँवले नवयुवक को दे रहा था और साँवला नवयुवक मिट्टी को दरारों में भर रहा था। मैंने देखा कि दोनों ने अपने माथेपर मुकुट बाँध रखे हैं और उनके कंधे में धनुष-बाण हैं। दोनों नवयुवक बहुत ही सुन्दर थे।

यह सब देखकर मैंने पुरबिया मजदूरोंको जोर-जोर से आवाज देकर अपने पास बुलाया और कहा कि जल्दी से यहाँ आओ और इन दोनों नवयुवकों को बाँधपर से हटाओ, नहीं तो ये दोनों नवयुवक मर जायँगे। मजदूर दौड़े हुए बाँधपर आये और बाँध पर आकर उन्होंने देखा तो वे दोनों ही नवयुवक उनको दिखलायी नहीं दिये। पुरबियों ने कहा – ‘साहब ! हमें वे नवयुवक नहीं दिखायी देते।’ मैंने उन पुरबियोंको बताया कि ‘एक नवयुवक साँवला है, दूसरा गोरा है। दोनों ही माथे पर मुकुट बाँधे हैं तथा कंधेपर धनुष-बाण लिये हैं।’ यह सुनकर पुरबियों ने कहा कि ‘साहब ! वे नवयुवक नहीं, वे तो साक्षात् श्रीराम और श्रीलक्ष्मणजी हैं, आप बड़े भाग्यशाली हैं कि आपको उनके दर्शन हो गये, अब आपका डैम कदापि नहीं टूटेगा। आप निश्चिन्त हो जाइये, क्योंकि जिन भगवती श्रीसीताजी महारानीके सामने आपने प्रार्थना की थी, उन्हींके स्वामी स्वयं अपने हाथोंसे आपके डैमको बचानेकी तैयारी कर रहे हैं।’

इतना सुनने पर मैं बेहोश हो गया और मुझे वहाँ से हटाकर मेरी कोठी पर पहुँचाया गया। होश आनेपर ‘राम-लक्ष्मणजी ने मेरे लिये अपने हाथों से बाँध बचाने का काम किया’ यह सोच मैंने अपना सारा जीवन उनको समर्पित कर देनेका निश्चय किया। बाँध बच गया और मैं उसी समय कोट, बूट, टोप, टाई, धन – सबको अत्यन्त तुच्छ समझकर, संन्यास लेकर जंगलकी ओर चल दिया। अब मैं हर समय श्रीसीतारामजीका भजन करता हूँ और जो कोई मुझे मिलता है, उससे हाथ जोड़कर यही प्रार्थना करता हूँ कि – “My Child! Please say Sita-Ram” (मेरे बच्चे ! कृपाकर सीताराम कहो) । श्रीसीतारामजी शब्द के कहने से, उनका नाम लेनेसे मुझे अपार शान्ति मिलती है – प्रसन्नता होती है। दुःख है तो मुझे इसी बात का कि मैंने इस परम पुण्यभूमि भारतमें पहलेसे जन्म क्यों नहीं लिया? मेरा इतना जीवन श्रीसीतारामजी के भजन किये बिना व्यर्थ ही क्यों चला गया?

लोकाभिरामं श्री रामं भूयो भूयो नामाम्यहम, श्री रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे रघुनाथाय नाथाय सीताया पतये नमः॥
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥

परलोक और पुनर्जन्म की सत्य घटनाएँ पुस्तक से एक कथा

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