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साल भर में उच्चतम न्यायालय के निर्णय, जो सुर्खियाँ बने

यह साल न्याय के लिए भी काफी उतार चढ़ाव वाला रहा, जब कई निर्णय खट्टे और कुछ मीठे रहे। आइये एक नज़र डालते हैं ऐसे ही कुछ निर्णयों पर:

1.  कुछ विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त अग्रिम जमानत की अवधि को सीमित नहीं किया जा सकता। वर्ष के आरंभ में आए इस निर्णय में जस्टिस अरुण मिश्रा, इंदिरा बनर्जी और विनीत सरन ने सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली) के मामले में यह निर्णय दिया कि अग्रिम जमानत की अवधि तभी समाप्त नहीं हो जाएगी जब आरोपी को न्यायालय से सम्मन मिलेगा या उस पर आरोप निर्धारित किए जाएंगे बल्कि यह मुकदमे के अंत तक जारी रहेगी, हालांकि कुछ ख़ास मामलों में इसे सीमित किया जा सकता है।

2-  अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए नियुक्ति का कोई पूर्ण अधिकार नहीं है: जस्टिस अरुण मिश्रा और यूयू ललित की बेंच ने एसके मोहम्मद रफीक बनाम कोंटई रेहमनिया हाई मदरसा के मामले में यह निर्णय देते हुए कहा कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए नियुक्ति के कोई भी पूर्ण या अपात्र अधिकार नहीं हैं। हालांकि इस निर्णय को चुनौती दी गयी और कहा गया कि यह निर्णय पहले दिए गए निर्णय का एकदम विपरीत है। 30  जनवरी को मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली एक बेंच ने रिट पेटीशन पर नोटिस जारी किया, जिसमें इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया गया।

3- विधानसभा अध्यक्ष को अपात्रता पर निर्णय 3 महीने के भीतर लेना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि विधायकों की अपात्रता पर कोई भी निर्णय तीन महीने की अवधि के भीतर ही लिया जाना चाहिए, जैसा संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत प्रदत्त है। यह महत्वपूर्ण निर्णय उच्चतम न्यायालय ने कीशम मेघचन्द्र सिंह बनाम माननीय विधानसभा अध्यक्ष मणिपुर विधानसभा एवं अन्य के मामले में दिया।

4- उच्चतम न्यायालय ने लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों के आपराधिक विवरण प्रकाशित करने के निर्देश दिए। उच्चतम न्यायालय ने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण का संज्ञान लेते हुए, सभी राजनीतिक दलों को यह निर्देश दिए कि वह नामांकन से दो हफ्ते के भीतर या 48 घंटों के भीतर, जो भी जल्दी हो। न्यायालय ने कहा कि यह सूचना स्थानीय अखबारों में प्रकाशित होनी चाहिए और आधिकारिक वेबसाइट एवं दलों के सोशल मीडिया हैंडलर पर प्रकाशित होनी चाहिए। सूचना में मुकदमे//खोजबीन का चरण और अपराध की प्रवृत्ति सम्मिलित होनी चाहिए।

5- नौसेना एवं थल सेना में महिलाओं के लिए परमानेंट कमीशन: लैंगिक समानता के आधार पर एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि थल सेना में स्त्रियों को उनकी सेवा से परे स्थाई कमीशन दिया जाना चाहिए।

6- निर्भया के कातिलों की क्षमा अर्जी को खारिज करना: यह वर्ष निर्भया के कातिलों को सजा का वर्ष रहा।  बीस मार्च को जब निर्भया के लिए न्याय की प्रतीक्षा में सारा भारत था, तभी उच्चतम न्यायालय ने आधी रात को सुनवाई करके सभी कातिलों के लिए अंतिम दरवाजे भी बंद किए।

7- कोविड 19 के मद्देनजर पूरे देश में सभी न्यायालयों में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई करना: देश में बढ़ते कोविड 19 के खतरों को ध्यान में रखते हुए, उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया। मुख्य न्यायाधीश एस ए बोडबे, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड और एल नागेश्वर राव ने यह निर्णय देते हुए हुए कहा कि सभी अदालतों में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से कार्यवाही की जाए।

8-  सत्र के चलते समय भी राज्यपाल फ्लोर टेस्ट का आदेश दे सकते हैं: मध्यप्रदेश में चल रही राजनीतिक उठापटक के चलते उच्चतम न्यायालय ने शिवराज सिंह चौहान और अन्य भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद याचिका पर यह निर्णय दिया था।

9- अनुसूचित जाति के क्षेत्रों में शिक्षक के पदों के लिए 100% आरक्षण असंवैधानिक है:  जस्टिस अरुण मिश्रा, इंदिरा बनर्जी, विनीत शरण, एम आर शाह और अनिरुद्ध बोस ने यह महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि “अनुसूचित जाति के क्षेत्रों” में स्थित अनुसूचित वनवासी श्रेणी से सम्बन्धित शिक्षकों के 100% आरक्षण को उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

10- अल्पसंख्यक संस्थानों के प्रशासन को धारा 30 इस बात के लिए नहीं रोकती कि वह आवश्यक नियमों को लागू न करें। उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय पात्रता एवं प्रवेश परीक्षा अर्थात नीट की वैधता को मेडिकल एवं डेंटल पाठ्यक्रमों के लिए बनाए रखते हुए कहा कि संविधान की धारा 30 किसी भी अल्पसंख्यक संस्थान को यह स्वतंत्रता नहीं देती है कि वह राज्य के नियमों से परे होकर कोई क़ानून बना सके।

11- 11 मई 2020 को उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए जम्मू कश्मीर में 4 जी को बनाए रखने के लिए आदेश पारित करें से इंकार कर दिया।

12- हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों पर एक बेहद ही महत्वपूर्ण निर्णय पद्मनाभ स्वामी मंदिर के मामले में आया, जिसमें जस्टिस यू यू ललित और इंदु मल्होत्रा की बेंच ने यह कहा कि मंदिर पर शासन का अधिकार पूर्व राज परिवार द्वारा नियत प्रशासन समिति के पास है। और इसमें केरल की राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी गयी। न्यायालय ने कहा कि अंतिम शासन की मृत्यु से राज्य के पक्ष में अधिकार नहीं चले जाते हैं।

13- उच्चतम न्यायालय ने लॉकडाउन के कारण नौकरी खोने वाले प्रवासी श्रमिकों के कल्याण के लिए निर्देश जारी किए: कोविड 19 के समय प्रवासी मजदूरों के पैदल ही घर जाने की घटनाओं ने उच्चतम न्यायालय को भी विचलित किया एवं न्यायालय ने सरकार को यह निर्देश दिया कि वह प्रवासी मजदूरों के कल्याण के लिए कदम उठाएं।

14- पूर्ण वेतन न देने वाले नियोक्ता पर कोई भी दंडात्मक कदम न उठाया जाए: कोविड 19 के दौरान लॉक डाउन के दौरान उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर रोक लगा दी कि गृह मंत्रालय के इस निर्णय को न मानने पर उन कम्पनी पर दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी कि लॉक डाउन के दौरान कम्पनी वेतन में कटौती न करे। न्यायालय ने कहा “कोई भी उद्योग बिना कामगारों के नहीं चल सकता है। इस प्रकार कर्मचारी और नियोक्ताओं को एक साथ बैठकर बात करने की जरूरत है।”

15- उच्चतम न्यायालय ने सुशांत राजपूत मामले को सीबीआई को हस्तांतरित किया: वर्ष के सबसे चर्चित मामलों में से एक मामला सुशांत सिंह राजपूत का रहा। इस मामले में कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 406 के अंतर्गत बहस हुई कि किस राज्य का क्या अधिकार है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय की जस्टिस हृषिकेश रॉय की सिंगल बेंच ने मुम्बई पुलिस की कोई गलती न मानते हुए मामला सीबीआई को सौंप दिया, ताकि न्याय में पारदर्शिता रहे।

16- वकील प्रशांत भूषण पर न्यायालय की आलोचना करने के लिए अवमानना नोटिस: उच्चतम न्यायालय के सबसे ज्यादा आलोचना वाले निर्णयों में से एक निर्णय था वकील प्रशांत भूषण पर न्यायालय की अवमानना के लिए एक रूपए का प्रतीकात्मक दंड देने का। जस्टिस अरुण मिश्रा, बी आर गवई और कृष्ण मुरारी ने यह मत रखते हुए कहा कि न्यायालय के विषय में उनके ट्वीट्स ने न्यायालय के प्रति जनता के विश्वास को कम किया है।

17- हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 (संशोधित) के लागू होने पर यदि पिता जीवित नहीं भी थे तो भी पुत्रियों का अधिकार संपत्ति पर है। उच्चतम न्यायालय में जस्टिस अरुण मिश्रा के नेतृत्व वाली बेंच ने निर्णय देते हुए कहा कि पुत्रियों का भी पुत्रों के समान ही अधिकार है।”

18- शाहीन बाग़ पर चले आन्दोलन पर निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि आन्दोलन केवल नियत स्थानों पर ही किए जाने चाहिए।

19- उच्च न्यायालयों के पास यह अधिकार होता है कि वह उचित मामलों में धारा 226 के अंतर्गत जमानत दे सकें: रिपब्लिक टीवी के एंकर अर्नब गोस्वामी को जेल से रिहा करने का आदेश देते हुए उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि उच्च न्यायालय संविधान की धारा 226 के अंतर्गत रिट पेटीशन में निर्णय दे सकता है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और इंदिरा बनर्जी की बेंच ने यह अवलोकन किया कि उच्च न्यायालय को अपनी शक्ति का प्रयोग करने से तब रोका जाना काहहिए जब किसी नागरिक को जानबूझकर राज्य की सत्ता द्वारा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से दूर किया जा रहा हो।

20- पति द्वारा साझी रूप से खरीदी गयी सम्पत्ति पर पत्नी अधिकार का दावा कर सकती है: उच्चतम न्यायालय ने घरेलू हिन्सा के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि एक पत्नी उस संपत्ति पर अधिकार का दावा कर सकती है, जो उसके पति ने किसी और रिश्तेदार के साथ साझे रूप में खरीदी है।

21- उच्चतम न्यायालय ने मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को यह आदेश दिए कि वह हर पूछताछ संस्था जैसे पुलिस, सीबीआई, एनआईए, ईडी आदि के हर कार्यालय में सीसीटीवी लगवाए।

22- किसी भी उचित मामले में आरोपपत्र प्रस्तुत होने के बाद भी सीबीआई जाँच का आदेश दिया जा सकता है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और इंदिरा बनर्जी की बेंच ने एक दहेज़ हत्या में मृत महिला के ससुराली जनों को प्राप्त अग्रिम जमानत को रद्द करते हुए यह निर्णय दिया एवं सीबीआई से इस मामले की आगे की जांच करने के लिए कहा।

23- वकीलों के लिए कोटा में जिला जज के पद के लिए न्यायिक अधिकारी प्रत्यक्ष रोजगार नहीं मांग सकते हैं: उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह कहा कि सिविल जज बार कोटा में जिला जजों के पद के लिए सीधी नियुक्ति नहीं मांग सकते हैं, वह इसके पात्र नहीं हैं।

वैसे तो उच्चतम न्यायालय ने लिए भी यह वर्ष काफी उतारचढ़ाव वाला रहा क्योंकि प्रशांत भूषण जैसे लोगों ने शायद पहली बार खुलकर अपने पक्ष में निर्णय न आने पर न्यायालय को ही दोषी ठहराना जारी रखा, फिर भी अनेकों मामलों में अपने महत्वपूर्ण निर्णयों के माध्यम से वह न्याय पर विश्वास बनाए रखने में सफल रहे, फिर चाहे वह सुशांत सिंह राजपूत का मामला हो, या फिर अर्नब गोस्वामी का या फिर पद्मनाभ मंदिर का।

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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