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हाल में सुप्रीम कोर्ट के तीन प्रधान न्यायधीश ‘कांग्रेसी खानदान’ से! क्या यह महज इत्तेफाक है?

भारत के राष्ट्रपति ने असम के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमन्त्री स्व. केशव चन्द्र गोगोई के सुपुत्र जस्टिस रंजन गोगोई को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया है। जस्टिस रंजन गोगोई 2 अक्टूबर को अवकाश ग्रहण कर रहे, ओडिशा कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे स्व. रघुनाथ मिश्रा के सुपुत्र और देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र के भतीजे, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की जगह लेंगे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया तो ऐसी नहीं है कि राष्ट्रपति किसी भी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का मुख्यन्यायाधीश नियुक्त कर दे। न ही भारत के मुख्य न्यायाधीश की यह मनमर्जी है कि वो अगले मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए किसी भी नाम की सिपारिश कर दे लेकिन क्या यह महज इत्तेफाक है कि कांग्रेसी कद्दावर नेता स्व रधुनाथ मिश्र के पुत्र जस्टिस दीपक मिश्रा से कुछ समय पहले कांग्रेस नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व उपमुख्यमंत्री स्व. देवी सिंह ठाकुर के सुपुत्र श्री टीएस ठाकुर भारत के मुख्य न्यायाधीश थे। देवी सिंह ठाकुर भी जम्मू कश्मीर हाइकोर्ट में जज थे। जज की नौकरी से इस्तीफ़ा देकर सीधे शेख मोहम्मद सरकार में वित्त मंत्री बने। फिर शेख मोहम्मद के दामाद गुलाम मोहम्मद सरकार में उपमुख्यमंत्री।

भारत में इंसाफ की देवी के आंखों पर काली पट्टी है इसलिए ताकि लोगों का भरोसा इस बात को लेकर बना रहे कि इसांफ की कुर्सी पर बैठने वाला हर व्यक्ति पूर्वाग्रह से मुक्त होकर आरोपी और आरोपित में भेद किए बिना कानून की नजर में न्याय की परिभाषा गढते हुए इंसाफ करता है। इसीलिए विश्व के सभी आधुनिक और प्रगतिशील देशों में भारत के सुप्रीम कोर्ट की ‘कोलेजियम’ व्यवस्था’ सबसे अधिक लोकतान्त्रिक, ईमानदार, पारदर्शी और गैर-परिवारवादी सोच से बाहर रखने के लिए बनाई गई। लेकिन इंसाफ के देवताओं ने सुप्रीम कोर्ट को परिवारवाद का अड्डा बना लिया। कहने को तो कोलेजियम सिस्टम रहा लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए सरकार की सीधे घुसपैठ रही।

जज बनने के लिए न्यूनतम योग्यता का कोई साफ पैमाना नहीं है।

देश में अभी हायर ज्यूडिशियरी में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम लागू है। जिसके तहत पांच सिनियर जजों की ही एक टीम नए जजों को नियुक्त करती है। खुद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इस कोलेजियम के मुखिया होते हैं। जज बनने के लिए न्यूनतम योग्यता का कोई साफ पैमाना नहीं है। इस सिस्टम में आम लोगों के पास बहुत कम मौके होते हैं कि वो इस पद तक पहुंच सकें। नेशनल लॉयर्स कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी एंड रिफॉर्म्स नाम की वकीलों की संस्था ने एक प्रेस रिलीज जारी करके आरोप लगाया था कि 90 के दशक में कॉलेजियम सिस्टम लागू होने के बाद से नियुक्त 50 फीसदी जज या तो रिश्तेदार या फिर जान-पहचान वाले जूनियर या सीनियर वकील थे। हाल ही में एक नेशनल टीवी चैनल पर दलित नेता उदित राज ने इसी लिहाज से ज्यूडिशियरी में आरक्षण की मांग करते हुए करते हुए कहा कि न्यायपालिका को दो सौ परिवारों ने जकड़ रखा है।

नेशनल लॉयर्स कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी एंड रिफॉर्म्स ने सुप्रीम कोर्ट के अंदर परिवारवाद के काबिज होने के कारण ही देश के प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और कानून मंत्री को एक सिफारिश भेजी है। उनकी दलील है कि जजों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन किया जाना चाहिए ताकि अदालतों को परिवारवाद और भाई भतीजाबाद से बचाया जा सके। लेकिन आजादी के बाद से ही लगातार सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में सरकारी सिफारिश ने इंसाफ की देवी की गरिमा को प्रभावित किया है।

भारत के संविधान में हायर ज्यूडिसियरी में न्यायधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया तो है लेकिन मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की कोई प्रक्रिया नहीं है।

परंपरा के मुताबिक वर्तमान मुख्यन्याधीश अपने बाद के दूसरे नंबर के न्यायधीश के नाम की सिफारिश भारत के राष्ट्रपति के पास भेजते हैं। जस्टिस दीपक मिश्रा ने वही किया जिस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मुहर लगा दी। लिहाजा 3 अक्टूबर को जस्टिस रंजन गोगई भारत के मुख्यन्यायधीश हो जाएंगे। सवाल यह उठता है कि क्या यह सब इतना सहज है जितना दिखता है? क्या यह महज इत्तेफाक है कि हाल में जितने भी मुख्य न्यायाधीश बने उनके पिता केंद्र में कांग्रेस की सरकार में कद्दाबर नेता थे! दरअसल भारत का मुख्यन्यायधीश बनने के किस्मत का फैसला उसी दिन हो जाता जिस दिन किसी न्यायाधीश की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट में होती है। भारत के अगले तीन मुख्य न्यायाधीश कौन होने वाले हैं यह अभी से तय है? जैसे साल भर पहले भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में देश के मुख्यन्यायधीश के खिलाफ उनके ही साथी जजों द्वारा बगावत करते हुए प्रेस कांफ्रेस किए जाने के समय यह सवाल उठा था कि प्रेस कांफ्रेस में शामिल होने वाले एक जज रंजन गोगोई हैं जिन्हें भारत का मुख्य न्यायधीश बनना है। फिर उन्होने क्यों बगाबत की! क्या उन्होंने अपने करियर से खेला है?

जस्टिस गोगोई उस समय तीसरे नंबर के जज थे। दूसरे नंबर के जज जस्टिस चेलमेश्वर को मुख्यन्यायधीश से पहले रिटायर्ड होना था। दरअसल जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस दीपक मिश्रा को एक ही दिन शपथ दिलाया गया था। जस्टिस मिश्रा को शपथ पहले दिला दिया गया इसीलिए वो सीनियर हो गए। और जस्टिस चेलमेश्वर के मुख्यन्यायधीश बनने का सपना चूर चूर हो गया। उनके अंदर यही खुंदक था। दरअसल यही खेल मुख्यन्यायधीश तय करने के लिए होता है। सुप्रीम कोर्ट का जज कब अपने आदमी को बनाया जाए कि वो मुख्यन्यायधीश बन सके!

भारत के इतिहास में दो बार ऐसा हुआ कि सरकार ने इस प्रक्रिया को नहीं अपनाया। एक बार पंडित जवाहर लाल नेहरु के समय, दूसरी बार इंदिरा गांधी के समय! आपात काल के दौरान इंदिरा सरकार ने चार जजों कि सीनियरिटी को लांघते हुए जस्टिस एस एन खन्ना के जगह जस्टिस एनएन राय को भारत का मुख्यन्यायधीश बना दिया। वो इसलिए क्योंकि इंदिरा गांधी को उन जजों पर भरोसा नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट में किसी जज की नियुक्ति के समय ही यह तय हो जाता है वे मुख्य न्यायाधीश बन सकेंगे या नहीं।

लेकिन जस्टिस रंजन गोगोई के पिता और असम के पूर्व मुख्यमंत्री केशव चंद्र गोगोई को भरोसा था कि उनका बेटा एक दिन देश का मुख्य न्यायाधीश बनेगा। जैसा कि आपने जाना कि सुप्रीम कोर्ट में किसी जज की नियुक्ति के समय ही यह तय हो जाता है वे मुख्य न्यायाधीश बन सकेंगे या नहीं। भारत के मुख्यन्यायाधीश रहे केजी बालाकृष्णन दलित परिवार से आते थे। वाजपेयी सरकार के समय कांग्रेस कोटे से राष्ट्रपति बने केआर नारायणन ने अपने बचपन के साथी के बेटे केजी बालाकृष्णन को कई जजों की सिनियरिटी को लांघते हुए सुप्रीम कोर्ट का जज ऐसे समय नियुक्त करवाया ताकि वो भारत के मुख्यन्यायाधीश बन सके। भारत की दूसरी महिला जज जस्टिस रुमा पाल की शिकायत थी यदि जस्टिस बालाकृष्णन को मुख्यन्याधीश बनाने की जल्दबाजी नहीं होती तो वो भारत की पहली महिला मुख्यन्यायधीश होती।

साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायधीश की नियुक्ति की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी और ईमानदार दिखती है दरअसल यह उतनी ही राजनीतिक और भाई भतीजेवाद वाली रही है। सालों तक इसी लिहाज से सुप्रीम जुडिसियरी में कांग्रेस की सरकार ने कब्जा बनाए रखा, जो आज तक दिख रहा है। न्यायपालिका में भाई भतीजावाद खत्म करने और सरकार का इसमें घुसपैठ खत्म करने के लिए ही मोदी सरकार राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन चाहती है। सुप्रीम अदालत इसमें अपनी मनमर्जी बनाए रखने के लिए कॉलेजियम सिस्टम खत्म नहीं करना चाहती। न्यायिक आयोग में एक पारदर्शी सिस्टम है जबकि कॉलेजियम सिस्टम देखने में तो सीधे सुप्रीम कोर्ट के कब्जे में लगता है लेकिन जजों की नियुक्ति में सीधे सरकार और कानून मंत्रालय का हस्तक्षेप होता है। भारत के मुख्यन्यायधीशों का राजनीतिक परिवारों से वास्ता इसीलिए महज इत्तेफाक नहीं है।

कॉलेजियम प्रणाली क्या है, जानने के लिए नीचे पढ़ें

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URL: In a row three chief judges of Supreme Court ‘Congressional dynasty’, Is it just a coincidence?

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