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भारत के डेवलपमेंट में प्रकृति से निकलता रहा है रास्ता, क्या है विकास की परिभाषा?

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Book Review: “विकास V/S डेवलपमेंट”
लेखक: संजीव तिवारी
पृष्ठ संख्या: 64
प्रकाशक: हर्फ़ पब्लिकेशन
मूल्य: ₹ 25

आज के समय में विकास को प्रकृति की बात करना केवल राजनीतिक मापदंड बन गया है। किंतु इस पुस्तक ने इसे ही स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रयास किया है। जहां भी विकास की बात होती है तो उसे बहुत आसानी से “डेवलपमेंट” से भ्रमित कर दिया जाता है। राजाओं ने भारत में कई स्मारक और बड़े वैभवशाली रचनाएँ दी किंतु उन सभी रचनाओं के कारण उन्होंने प्रकृति को ठेस नहीं पहुंचाई, जो आज हम 21वीं शताब्दी में पहुंचा रहे हैं और बड़ी आसानी से उसे विकास की उपाधि दे रहे हैं।

 इस पुस्तक के लेखक संजीव तिवारी जी ने बड़ी सुंदरता से विकास के लगभग सभी मापदंडों को एक बार पुनः रेखांकित कर नए सिरे से प्रस्तुत किया है। जिस प्रकार आज सनातन धर्म द्वारा परिभाषित विकास के उत्कृष्ट उदाहरण को भुला दिया गया है उन्होंने इस पुस्तक में उसका सही अर्थ सरलता से उजागर कर दिया। जब बात हो विकास की तो उसे “डेवलपमेंट” जैसे खोखले शब्द से सदैव वामपंथियों सरकारों ने फेरबदल कर दूषित करा है। और इसी फेरबदल का उदाहरण देकर यह पुस्तक जनता को जागृत करने का सटीक काम करती है।

 जहां कहीं इस 21वीं शताब्दी में प्राकृतिक विषय पर राय रखने वालों की जानकारी मिली है वहां अधिकतर वामपंथी विचारधारा का हस्तक्षेप मिला है और भ्रष्टाचार आतंकवाद से तार जुड़े पाए गए। चाय वाले ग्रेटर का अंतरराष्ट्रीय भ्रष्ट संबंध हो या एक बड़े अंग्रेजी अखबार के एडिटर के नाम ही पत्नी हों जो खुद को पर्यावरणविद् कहलाती हैं किंतु हाल ही छत्तीसगढ़ में नक्सल गतिविधियों में सम्मिलित होने का आरोप लगा। किंतु कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में नक्सल आतंकवादी द्वारा नाम लिए जाने के बावजूद उन्हें सम्मान पूर्वक छोड़ दिया जाता है।

यह सब बताने का कारण यही है कि आज पर्यावरण के लिए प्रयासरत लोगों के प्रति जो धारणा बानी है उसके दोषी संजीव तिवारी बिलकुल नहीं हैं। बल्कि इन्होंने पर्यावरणविद् समाज को नए ढंग से जागृति लाने और सोचने की दिशा प्रदान करी है। क्या केवल पेड़ जंगल की बात करने वाले खुद को पर्यावरणविद् कहते थे, आज संजीव जी ने इस पुस्तक ‘विकास वस. डेवलपमेंट’ के माध्यम से “डेवलपमेंट” को विकास का पहला दुश्मन और पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में परोसा जा रहा प्राकृतिक द्वंद्व किस प्रकार भारत के मूल रस को समाप्त करता जा रहा है, इसका सुंदर विश्लेषण दिया है।  

इस पुस्तक में आपको सभी कारणों का संक्षेप में उदाहरण मिलता है जो हमारी प्रकृति के बैरी बने हुए हैं। इसी पुस्तक के एक सुंदर प्रश्न से इसकी महत्वता को चिन्हित करना चाहूंगा। आप जानते हैं कि आज शहर प्रकृति के पूरक नहीं बल्कि उसके अनन्य बने हुए हैं। “क्या कहीं शहर की परिभाषा प्रकृति से मुक्त क्षेत्र तो नहीं हो रही ?”

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