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योगी की कैबिनेट में अपने दम पर आए स्वतंत्र:पैसे की कमी से पहलवानी छोड़ी, पत्रकारिता छोड़ राजनीति में आए तो RSS ने पहले नाम बदलवाया

स्वतंत्र देव सिंह, वो नेता जिन्होंने 25 मार्च को योगी कैबिनेट में मंत्री पद की शपथ ली। 28 मार्च को उन्हें जल शक्ति मंत्री का पद सौपा गया। ये वह नेता हैं जिन्होंने बिना किसी गॉडफादर के राजनीति में एक ऊंचा मकाम हासिल किया। योगी के मंत्रियों की सीरीज में आज कहानी उस नेता की जिनको भाजपा में शामिल होने के बाद अपना नाम ही बदलना पड़ गया। चलिए शुरू से बताते हैं।

घर में पैसे की कमी थी तो छोड़नी पड़ी कुश्ती
साल: 1964, जगह: मिर्जापुर का ओरी गांव, 14 साल के स्वतंत्र देव सिंह को पढ़ाई-लिखाई में बिलकुल दिलचस्पी नहीं थी। यहां पर एक बात बतानी जरूरी है कि स्वतंत्र देव सिंह का नाम पहले कुछ और था। उसकी कहानी हम आगे बताएंगे। पहले उनकी कुश्ती वाली बात। उनका दिन-भर बस खेल-कूद में निकलता था। खासतौर पर कुश्ती में। अपने स्कूल की कुश्ती टीम के कप्तान भी थे। कुश्ती में भविष्य बनाना चाहते थे।

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घर के खराब हालात कुश्ती जैसे खर्चीले खेल की इजाजत नहीं दे रहे थे। पैसा कम होने की वजह से उन्हें अपना कुश्ती का सपना यहीं छोड़ना पड़ा।

डीएवी कॉलेज से उन्हें मिला संघ से जुड़ने का मौका
जैसे-तैसे 10वीं पास की। बड़े भाई ने साल 1985 में उरई के दयानन्द वैदिक कॉलेज में एडमिशन करा दिया। यही वह जगह थी जहां से उन्हें लगा संघ का चस्का।

एक दिन कांग्रेस के दोस्त ने उन्हें संघ के कार्यक्रम में चलने को कहा। खेलने के शौकीन थे इसलिए उन्हें बताया गया कि कार्यक्रम में भी खेल ही होंगे।

वो तुरंत पहुंच गए। वहां पता चला कि खेल नहीं संघ के पदाधिकारियों का भाषण होने वाला है। उस भाषण की बातें ही उनको इतनी पसंद आ गईं कि वो सब छोड़कर लगातार संघ के कार्यक्रमों में जाने लगे।

धीरे-धीरे वो संघ के विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में सक्रिय हो गए।

स्वतंत्र देव की 36 साल की राजनीति की कहानी

स्वतंत्र के शुरुआती दौर की तस्वीर

स्वतंत्र के शुरुआती दौर की तस्वीर

साल 1986, छात्रसंघ चुनाव का टिकट नहीं मिलाः स्वतंत्र ने एबीवीपी से छात्र संगठन के चुनाव के लिए टिकट मांगा पर उन्हें टिकट नहीं मिला।

साल 1989, पत्रकारिता के दौरान जिंदगी में हुए दो बड़े बदलावः छात्र राजनीति के बीच ही वो ‘स्वतंत्र भारत’ अखबार से जुड़े। उरई में बतौर रिपोर्टर काम करते थे। यहां से उनकी जिंदगी में दो बड़े बदलाव हुए। पहला, यहीं से राजनीति में उनकी एंट्री हुई। दूसरा, बचपन से चला आ रहा उनका नाम बदलकर अखबार के नाम पर रख दिया गया था।

साल 1990, स्वतंत्र देव सिंह की राजनीति में एंट्री की कहानी: देशभर में एक ही नारा गूंज रहा था, “राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।”

उसी सिलसिले में एक दिन बजरंग दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय कटियार उरई जा रहे थे। उनके पहुंचने से पहले ही उरई में दंगे होने लगे। स्थिति तनावपूर्ण थी।

विनय के पहुंचने पर दंगे और भड़कने की आशंकाएं तेज हो गईं। जिला प्रशासन ने उन्हें पत्रकारों से बात करने को मना कर दिया।

जब ये बात स्वतंत्र देव सिंह को पता चली तो उन्होंने एक तोड़ निकाला। तोड़ ये कि रोक तो शहर के अंदर बोलने पर है। क्यों ना शहर की सीमा से बाहर कांफ्रेंस की जाए।

उन्होंने फटाफट पत्रकारों को फोन लगाया। सभी पत्रकार उरई की सीमा के बाहर ही रुक गए और विनय का बयान लिया। विनय के विस्फोटक बयान अगले कई दिन तक अखबारों की सुर्खियों में छाए रहे। विनय को स्वतंत्र की ये बात बहुत पसंद आई। उन्होंने स्वतंत्र देव सिंह को राजनीति में आने की सलाह दी।

ये है कांग्रेस सिंह की स्वतंत्र देव सिंह बनने की कहानी, RSS ने बदलवाया था नाम
साल 1992, पत्रकारिता छोड़ शुरू कर दी राजनीति: 
कांग्रेस सिंह ने पत्रकारिता छोड़ दी। विनय ने उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा का प्रभारी बना दिया। स्वतंत्र देव का पहले नाम कांग्रेस सिंह था।

कांग्रेस सिंह नाम आरएसएस को खटकने लगा थाः नाम कांग्रेस सिंह और राजनीति भाजपा की। आरएसएस को ये नाम अटपटा लगने लगा। उनके लिए नया नाम सोचा जाने लगा। वह चूंकि स्वतंत्र भारत अखबार में काम कर रहे थे, इसलिए अब वह कांग्रेस सिंह नहीं बल्कि स्वतंत्र देव सिंह नाम से पहचाने जाने लगे।

स्वतंत्र देव सिंह को जालौन कोआपरेटिव बैंक का चेयरमैन बनाया गया

स्वतंत्र देव सिंह को जालौन कोआपरेटिव बैंक का चेयरमैन बनाया गया

साल 1999, बैंक के चेरमैन बने: संघ के कहने पर कांग्रेस सिंह को जालौन कोआपरेटिव बैंक का चेयरमैन बना दिया जाता है।

साल 2001, युवा मोर्चा संभाला: भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए।

भाजपा ने स्वतंत्र देव के कंधों पर दी बड़ी जिम्मेदारी
साल 2002, जगह: आगरा, भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अधिवेशन था। इस पूरे आयोजन की जिम्मेदारी स्वतंत्र देव पर थी। लाल कृष्ण अडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे संगठन के बड़े नेता आए।

कार्यक्रम में लाखों की भीड़ देखकर सभी नेता गदगद हो गए। इसके बाद आगे के सभी आयोजनों की जिम्मेदारी स्वतंत्र देव सिंह के कंधों पर आ गई। इन्हीं आयोजनों के बल पर शुरू हुई स्वतंत्र की सफलता की कहानी। संगठन मंत्री नागेंद्र ने विधान परिषद की खाली सीट के लिए स्वतंत्र का नाम दिया।

साल 2004, संसदीय राजनीति की शुरुआत हुई: भाजपा ने उन्हें विधान परिषद भेजा। दो बार चुने गए।

साल 2012, जब स्वतंत्र की हुई थी जमानत जब्त: यूपी विधानसभा चुनाव आने वाले थे। संगठन की तरफ से सारे बड़े नेताओं को अपनी-अपनी विधानसभाओं से लड़ने के आदेश दिए गए। स्वतंत्र देव का नाम भी इसमें शामिल था।

उरई की कालपी विधानसभा से चुनाव लड़े। हार गए। मात्र 15 हजार वोटों के साथ उनकी जमानत जब्त हो गई थी।

लोगों को लगने लगा इतनी बुरी हार के बाद स्वतंत्र देव सिंह का पॉलिटिकल करियर खत्म हो जाएगा।

पर ऐसा हुआ नहीं। ना उनके करियर पर कोई फर्क पड़ा ना ही पार्टी में उनकी अहमियत कम हुई।

साल 2013, लोकसभा चुनाव में जीत के मिशन की शुरुआत: साल 2014 में लोकसभा चुनाव थे। उसी को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र को एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। चुनौती थी भाजपा की सभी रैलियों में ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाने की।

उन्होंने तेजी से भाजपा को हर जगह प्रमोट करना शुरू कर दिया। हर रैली में लाखों की भीड़ जमा होने लगी।

स्वतंत्र ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। 2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा जीत गई।

साल 2017, मुख्यमंत्री के लिए स्वतंत्र के नाम की भी थी चर्चा: यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा को 312 सीटें मिलीं। जीत के बाद मनोज सिन्हा, केशव प्रसाद मौर्य और योगी आदित्यनाथ के साथ स्वतंत्र देव सिंह के नाम की भी चर्चा होने लगी।

आखिर योगी आदित्यनाथ के नाम पर मोहर लगी।

स्वतंत्र को परिवहन, प्रोटोकॉल और ऊर्जा विभाग में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी सौंपी गई।

साल 2019, पार्टी में बढ़ा स्वतंत्र का कद: स्वतंत्र देव को यूपी भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।

साल 2022, कैबिनेट में मंत्री पद की शपथ ली:

25 मार्च को स्वतंत्र ने योगी कैबिनेट में मंत्री पद की शपथ ली

25 मार्च को स्वतंत्र ने योगी कैबिनेट में मंत्री पद की शपथ ली

स्वतंत्र देव के नेतृत्व में यूपी विधानसभा चुनाव लड़ा गया। भाजपा ने 255 सीटें जीतीं।

स्वतंत्र ने योगी कैबिनेट में मंत्री पद की शपथ ली। 28 मार्च को उन्हें जल शक्ति मंत्री का पद सौंपा गया।

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