औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रसित भारतीय न्यायपालिका

Sonali Misra. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि भारतीय भूमि पर महिलाओं के योगदान पर आयोजन हो और उस पूरे आयोजन में उल्लेखनीय स्त्रियों में प्राचीन काल की भारतीय स्त्रियों के योगदान को मात्र पूर्णतया उपेक्षित ही न कर दिया जाए, बल्कि उसके स्थान पर वेदों को नीचा दिखाने का प्रयास हो और वह भी उनके द्वारा जिन्हें हम न्याय के देवता कहते हैं।  और कहीं न कहीं वह हमारे ग्रंथों को ही गलत उद्घृत करते हैं। 

पिछले सप्ताह जस्टिस सुनंदा भंडारी मेमोरियल लेक्चर: ग्रेट वीमेन ऑफ हिस्ट्री में जस्टिस आर एफ नरीमन ने ऐतिहासिक स्त्रियों के योगदान के बारे में बातें की। यह बातें बहुत ख़ास थीं क्योंकि उन्होंने कई धार्मिक प्रसंग लेते हुए बातें कही थीं। ऐसे में कई बातें उन्होंने ऐसी बोलीं जो बेहद आपत्तिजनक थीं एवं सत्यता से कोसों दूर थी। उन्होंने स्त्री सशक्तिकरण पर वेदों का उदाहरण देते हुए कहा कि ऋग्वेद में दशम मंडल के 95वें सूक्त में स्त्रियों को लकड़बग्घा/भेड़िया (हाईना) कहा गया है। 

पर मीलोर्ड आप गलत हैं। आप पूरी तरह से गलत हैं।  काश कि आप ने पढ़ा होता कि ऋग्वेद में यह क्यों और किसने लिखा है? आप गलत हैं क्योंकि आपने केवल और केवल शायद अंग्रेजी अनुवाद का एक शब्द पकड़ लिया है। आप गलत हैं, आप इसलिए गलत हैं क्योंकि आपने वेदों का अध्ययन संस्कृत और हिंदी में नहीं किया है।

मीलोर्ड कहीं न कहीं आपने समझा ही नहीं है कि अंतत: उस सूक्त में लिखा क्या गया है? वह सूक्त किस विषय में है। वह सूक्त दरअसल एक स्त्री द्वारा पुरुष को जो कि एक राजा है उसके कर्तव्यों के विषय में समझाने का प्रयास कर रही है।

पुरुरवा अपना सब कुछ छोड़कर उर्वशी के पास पहुँच गए हैं और अप्सरा उर्वशी उन्हें समझा कर वापस भेजने का प्रयास कर रही है, क्योंकि वह धरती पर वापस आ नहीं सकती है। पर पुरुरवा अड़े हुए हैं। कि तुम्हारे साथ क्रीडा करने वाला प्रेमी आज ही गिर जाऊंगा, और मेरे शरीर को भेड़िये/वृक खाएंगे। उस पर उर्वशी कहती हैं कि हे पुरुरवा, तुम मरो मत! तुम धरती पर मत गिरो। अशुभ भेड़िये तुम्हें न खाएं।

यह जो पंक्ति है जिसे लेकर मीलोर्ड ने यह कहा है कि ऋग्वेद में स्त्री को हायना अर्थात भेड़िया कहा गया गया है, वह पूरी तरह गलत है क्योंकि उसके स्त्री की तुलना है ही नहीं! उर्वशी की झुंझलाहट दिख रही है क्योंकि वह मित्र बनकर रह नहीं सकती और पत्नी वह हो नहीं सकती है। इसलिए वह कहती हैं कि  हे पुरुरवा, स्त्रियों के साथ मैत्री स्थाई नहीं होती है, उनका हृदय वृक जैसा होता है!  

पुरू॑रवो॒ मा मृ॑था॒ मा प्र प॑प्तो॒ मा त्वा॒ वृका॑सो॒ अशि॑वास उ क्षन् । न वै स्त्रैणा॑नि स॒ख्यानि॑ सन्ति सालावृ॒काणां॒ हृद॑यान्ये॒ता ॥ यह वह श्लोक है, जिसका उल्लेख किया गया है। जिसका अंग्रेजी अनुवाद इस प्रकार है:

15 Nay, do not die, Purūravas, nor vanish: let not the evil-omened wolves devour thee। With women there can be no lasting friendship: hearts of hyenas are the hearts of women।( Ralph T.H. Griffith)

यद्यपि ऋग्वेद की संस्कृत को समझने के लिए आत्मसात करने के लिए, वैदिक संस्कृत का ज्ञान होना अनिवार्य है, जो संस्कृत आज की संस्कृत से पूर्णतया भिन्न है। हो सकता है कि इसका अर्थ सर्वथा भिन्न हो और दुसरे स्थान पर जो वृक वर्णित है, उसका अर्थ कुछ और हो, इसे समझने के लिए पाणिनि की संस्कृत व्याकरण का ज्ञान होना अनिवार्य है।

मीलोर्ड यदि आपने संस्कृत नहीं भी पढ़ी है,  तो अंग्रेजी अनुवाद में भी यह कहीं नहीं लिखा है कि स्त्री हाईना अर्थात भेड़िया या लकडबग्घा है। उर्वशी किसी तरह समझाबुझा कर पुरुरवा को वापस भेजना चाहती हैं, इसमें कहाँ यह लिखा गया है कि स्त्री के साथ रिश्ते नहीं रखने चाहिए क्योंकि वह भेड़िया होती हैं।  इसमें एक प्रकार से विवाह के महत्व को परिलक्षित किया गया है जो लिखा ही नहीं है, वह एक औपनिवेशिक मानसिकता के साथ अनुवाद भी कर दिया? यह बेहद हैरानी वाली बात है। 

क्या इसी दृष्टिकोण के साथ आप भारतीय या कहें हिन्दू ग्रामीण जनता को देखते हैं? इतना ही नहीं, आपने उसके बाद कई स्त्रियों के नाम लिए, जिन्होनें उनके अनुसार इतिहास में उल्लेखनीय कार्य किये। जैसे रोम की रानी क्लियोपैट्रा, जो यह सही है इतिहास में ख्यात है, रहस्यमयी है, पांच भाषाएँ भी जानी थी। पर उसके जीवन में रहस्य उसके जीवन के पुरुषों के कारण उत्पन्न हुआ।

आज भी इतिहास में क्लियोपैट्रा को उसकी ख़ूबसूरती और उसके जीवन में आए पुरुषों के कारण जाना जाता है।  उसका विवाह उसीके भाई तोलेमी के साथ होना था, क्योंकि पिता ने वसीयत में दोनों के नाम साम्राज्य कर दिया था। इसलिए वह भागी और जूलियस सीजर ने उसकी मदद मिस्र को जीतने में की।  तोलेमी को मार दिया गया और फिर बाद में जिस छोटे भाई के साथ मिलकर शासन किया, उसे भी मार दिया एवं कहा जाता है कि क्लियोपैट्रा के आदेश पर उसकी बहन अर्सीनोई को भी मार डाला गया।

मीलोर्ड! आपने क्लियोपैट्रा के बहाने से रोम का इतिहास बताया, पर आपने भारत में किसी भी रानी का उल्लेख नहीं किया। आपने यह नहीं बताया कि महाभारत में भी ऐसी कई स्त्रियाँ हुईं थीं जिन्होनें अपने पिता का साथ दिया शासन करने में, और गद्दी के लिए किसी को मारा भी नहीं! भारत की रानियाँ इतनी क्रूर कभी नहीं हुईं और न ही सगे भाई के साथ विवाह करने के कारण भागना पड़ा।

क्लियोपैट्रा का पूरा जीवन छल से भरा हुआ था, पर आपने उसका उल्लेख किया, परन्तु आपने यह नहीं बताया कि भारत में हाल ही में सनौली में स्त्री योद्धा का शव प्राप्त हुआ था।   हिडिम्बा एक स्वतंत्र स्त्री थी। यहाँ तक कि रामायण काल में भी कैकयी युद्ध कौशल में पारंगत थीं। शूपर्णखा जैसी राक्षसियां भी स्वतंत्र विचरण करती थीं एवं गुप्तचर जैसा कार्य करती थी।

जिनमें नीतिगत ज्ञान था और जो समय आने पर रावण जैसे विश्व विजेता को भी नीति समझा सकती थी। और उसी के साथ मंदोदरी भी थी, जो रावण को सही और गलत बताती है। पर मीलोर्ड आपने कुछ नहीं देखा!  क्या आपके लिए सफलता का अर्थ अनैतिक सम्बन्ध हैं? स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ अवैध सम्बन्ध नहीं होता मीलोर्ड? वह हमारी आदर्श नहीं होतीं!

आप गलत हैं मीलोर्ड! क्योंकि आप रजिया सुल्ताना का तो उल्लेख करते हैं, जिसे उसके पिता ने उत्तराधिकारी माना था, पर उसके ही भाइयों के साथ मिलकर बलबन ने उसका खून कर दिया था। पर आपको उससे पूर्व कोई भी भारतीय स्त्री दिखाई नहीं दी? आपको ऋग्वेद में गलत अनुवाद तो मिल गया, परन्तु आपको यह नहीं पता चला कि उसी ऋग्वेद के दसवें अध्याय में सूर्या सावित्री नामक ऋषिका ने विवाह के सूक्त लिखे थे? क्या आपको यह ज्ञात है कि उसी ऋग्वेद में रोमशा ने स्त्री विमर्श को एक नया रूप दिया था? लोपामुद्रा नामक राजकुमारी थी जिसने एक ऋषि से विवाह किया था, परन्तु जीवन जीने का उसका अपना ही दृष्टिकोण था।

मीलोर्ड आप उस दिन पूरी तरह से गलत थे क्योंकि आपने न ही जीजाबाई, न ही रानी अवंतिबाई लोधी, न ही रानी पद्मिनी, न ही मीराबाई, न ही अक्क महादेवी, न ही कोटा रानी, और  न ही रानी लक्ष्मीबाई का उल्लेख किया, जो भारत की स्त्रियाँ रही हैं, जिन्होनें स्वयं इतिहास बनाया है। पर आपने अपनी औपनिवेशिक मानसिकता के चलते यह सब कुछ नहीं देखा मीलोर्ड! और इन सभी को डिलीट कर दिया। 

दरअसल भारत की ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका आज तक इस मानसिकता से उबर ही नहीं पाई है कि वही इस देश के माईबाप हैं। और रह रहकर यह उनके निर्णयों और क़दमों में दिखता रहता है। कल ही त्रिपुरा में एक डीएम ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अपने ही दिए गए आदेश को फाड़कर दूल्हे और दुल्हन के परिवार वालों के साथ साथ पंडितों के साथ भी अभद्रता की थी।

यही कारण है कि वह सबरीमाला के मंदिर में प्रवेश को लेकर ऐसे निर्णय दे सकते हैं, जो परम्परा विरोधी हैं। यही कारण है कि वह दही हांडी के साथ प्रयोग कर सकते हैं, यही कारण है कि वह दीपावली को पटाखेविहीन बना सकते हैं और यही कारण है कि वह हिन्दू धर्म के साथ किसी भी सीमा तक क्रूर एवं निष्ठुर हो सकते हैं।

मीलोर्ड, अब समय आ गया है कि आप अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर आएं, भारतीय मानकों और चरित्रों को पहचानें! कब वह दिन आएगा जब हमारी न्यायपालिका से जुड़े लोग ग्रेट वीमेन ऑफ हिस्ट्री अर्थता इतिहास की महान महिलाओं में हमारी भारतीय स्त्रियों को सम्मिलित करेंगे, भारतीय मामलों को भारतीय अर्थात हिन्दू दृष्टि से देखेंगे!

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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