भारतीय महिलाओं में जीजाबाई वाले जज्बे की जरूरत है, न कि तनुश्री जैसा ‘क्रिप्टो-प्रोपोगंडाई’ फितरत की!

आज जब भारतीय स्त्रियों और पुरुषों को लेकर के शिकारी और शिकार की ही कहानी बन गयी है, ऐसे में बहुत जरूरत है कि हम अपनी भारतीय स्त्रियों की कहानियों को सामने लेकर आएं। न केवल इसलिए कि वे भारतीय थीं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि उन्होंने अपनी भारत भूमि के लिए हर संभव त्याग किया, और लड़ी। आज लडकियां जैसी नाज़ुक छुईमुई जैसी हैं, आज से कुछ ही सौ वर्षों पूर्व भारत की महिलाएं ऐसी नहीं हुआ करती थी। रानी पद्मावती के शौर्य और त्याग के किस्से हम सभी को आज भी अन्दर से झकझोरते हैं।

ऐसी ही एक और महिला का जन्म इस भारत भूमि पर तब हुआ जब भारत मुगलों के अत्याचारों से कराह रहा था और हिन्दुओं को हर मौलिक अधिकार से वंचित किया जा रहा था. ऐसे दुर्गम हालातों में महाराष्ट्र राज्य के बुलडाना जिले में राजा के यहाँ 12 जनवरी 1598 को जीजाबाई का जन्म हुआ। परम्पराओं के अनुसार जीजाबाई का विवाह अल्पायु में ही शाहजी राजे भोंसले से हो गया, जो निजामशाही के दरबार में सैन्य दल के सेनापति थे। जीजाबाई का मन भारत की दासता और गुलामी देखकर दुखी होता था, वह बार बार इन हालातों के प्रति अपना दर्द व्यक्त करती थीं, मगर कुछ न कर पाने में खुद को असमर्थ पाती थीं।

इस विवाह से आठ बच्चे हुए, जिनमें 6 बेटियाँ और दो बेटे थे, जिनमें से एक हुए शिवाजी। शिवाजी के जन्म के उपरान्त जीजाबाई को जैसे उनके जीवन का लक्ष्य मिल गया। उन दिनों भारत में उत्तर में मुग़ल तो दक्षिण में आदिलशाही साम्राज्य का शासन था। जिनके शासनकाल में जनता बहुत ही दुखी थी। जीजाबाई सामान्य महिला नहीं थीं। उनमें एक माता और पत्नी के साथ ऐसे कई गुण थे जो उन्हें महान बनाते थे। उनमें अपनी भारत भूमि की पीड़ा देखकर दर्द था।  वह स्वयं एक सक्षम योद्धा और प्रशासक थीं, और उनमें खुद में ही शौर्यता के गुण भरे थे।

जब उनकी गोद में शिवाजी आए तो उनका स्वप्न सार्थक होने को मचल उठा। उन्होंने शिवाजी में न केवल शौर्य बल्कि वीरता और संवेदना के भी गुण डाले। उन्होंने शिवाजी को न केवल अपना राज्य स्थापित करने के लिए प्रेरित किया बल्कि उन्होंने शिवाजी को हर धर्म के प्रति समान आदर करना सिखाया. शिवाजी को उन्होंने बचपन से ही वीरता के किस्से सुनाए।

यही कारण था शिवाजी ने अपने दोस्तों की टोली बहुत ही कम उम्र में बनाकर दुर्गों पर आक्रमण कर अधिकार स्थापित करना शुरू कर दिया था. जब भी जरूरत हुई तब उन्होंने शिवाजी को डांटा भी। जब शिवाजी एक योद्धा के रूप में आकार ही ले रहे थे तो जीजाबाई ने उनसे कहा कि वह चाहती हैं कि शिवाजी सिंहगढ़ के किले पर अपना झंडा फहराएं। शिवाजी ने कहा कि माँ मुगलों की सेना बहुत बड़ी है और हम इस हालत में नहीं कि हम उनपर विजय हासिल कर सकें। इस पर जीजाबाई कुपित हो उठीं और उनसे कहा कि वह स्वयं ही चली जाएँगी, माँ को इस प्रकार गुस्सा होते देखकर उन्हें दुःख हुआ और उन्होंने योजना बनाकर सिंहगढ़ के दुर्ग पर विजय प्राप्त की।

यह तो हुई अपने बच्चे में वीरता के गुण भरने की बात, भारतीय स्त्रीवाद में देश और धर्म अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर रहा था, जब जीजाबाई अपने पुत्र को मुगलों से लड़ने के लिए तैयार कर रही थीं, उन दिनों उनके पति शाहजी आदिलशाही और मुगलों के साथ थे. उन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपने व्यक्तिगत जीवन की भी परवाह नहीं के और अपने पति को स्पष्ट अपने लक्ष्य के विषय में सूचित कर दिया। शाहजी अपनी दूसरी पत्नी के साथ रहे। मराठा साम्राज्य की नींव भले ही शिवाजी ने डाली हो, परन्तु उसमें जो सबसे बड़ा कारक था वह और कोई नहीं केवल और केवल जीजाबाई की ही प्रतिज्ञा थी।

भारतीय स्त्री ने हर युग में प्रतिकार किया है, बस उसके सामने लक्ष्य और आदर्श स्पष्ट होना चाहिए। जीजाबाई जैसी अनेकों महिलाओं के सामने आदर्श स्पष्ट था। आज की महिलाओं की तरह मात्र यौनिक आज़ादी उनका विषय नहीं था, और न ही उनका लक्ष्य।

URL: Indian Womanhood- The ideal in front of Jijabai was clear

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Sonali Misra

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सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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