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मृत्यु से पूर्व ही अपनी मौत का एहसास हो गया था वी.एस.नायपाल को! सनातन ब्राह्मणत्व की समझ से यह संभव हुआ!

दुनिया में ऐसे बहुत कम साहित्यकार हुए हैं जो अपनी मृत्यु का आभास कर अपनी रचना को अंतिम बता गए हों। अपना अधिकांश जीवन त्रिनिदाद और ब्रिटेन में बिताने वाले वीएस नायपॉल अंग्रेजी के ऐसे ही मुर्धन्य साहित्यकार हुए जिन्हें अपने ब्राह्मणत्व के कारण मृत्य का आभास पहले ही हो गया था। तभी तो उन्होंने अपनी अंतिम पुस्तक ‘India Essays (इंडिया एस्से) के लोकार्पण पर उसे अपनी अंतिम रचना घोषित की थी। उनकी यह अंतिम पुस्तक 25 मार्च 2018 में प्रकाशित हुई थी और 11 अगस्त 2018 का उनका देहावसान हो गया। ब्राह्मणत्व के कारण मृत्यु का आभास होना उनके मूल में निहित है। अंग्रेजी साहित्य में 2001 में नोबेल पुरस्कार मिलने के कारण ये तो पूरी दुनिया जान गई कि वीएस नायपॉल भारतीय मूल के एक अंग्रेजी साहित्यकार हैं, लेकिन उनके ब्राह्मण होने की जानकारी अभी भी बिरले को ही है।

मुख्य बिंदु

* ठेका मजदूर बनाकर त्रिनिदाद ले जाए गए उनके पूर्वज गोरखपुर के भूमिहार ब्राह्मण थे

* वीएस नायपॉल ने अपनी रचनाओं में ब्रिटेन के मूल पर हमला किया जिसका असर अब दिखने लगा है

विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल, जी हां यही उनका मूल नाम हैं जिन्हें आप वीएस नायपॉल जानते हैं। नायपॉल सरनेम भी नेपाल से निर्यातित है। असल में वीएस नायपॉल के पूर्वज गोरखपुर के भूमिहार ब्राह्ण थे, जो नेपाल से आकर गोरखपुर में बसे थे। उनके दादा को ब्रिटिश हुकूमत ने ठेका मजदूर के रूप में त्रिनिदाद भेज दिया गया था। तभी से वे लोग वहीं बस गए और अपने कर्म और कार्य की वजह से वहां एक प्रभावशाली परिवार के रूप में प्रसिद्ध हो गए। गोरखपुर से एक ठेका मजदूर के रूप में त्रिनिदाद गए एक भूमिहार ब्राह्मण परिवार में विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल का जन्म 17 अगस्त 1932 को हुआ था। बाद में वीएस नायपॉल के नाम से अंग्रेजी साहित्यकार के रूप में नाम कमाया। नायपॉल को अंग्रेजी साहित्य में नवीन छंद का गुरू माना जाता है।

अपनी मृत्यु से पहले यानि कि 11 अगस्त 2018 से पहले तक नायपॉल को दुनिया का सबसे बेहतरीन जीवित लेखक माना जाता था और यह सार्वभौम रूप से स्वीकार्य भी था। लेकिन इस स्थिति तक पहुंचने के लिए त्रिनिदाद में उनके पूर्वजों और पारिवारिक सदस्यों को कम पापड़ नहीं बेलने पड़े। भूमिहार ब्राह्मण जैसे प्रतिष्ठित परिवार से होते हुए भी जिस प्रकार ब्रिटिश हुकूमत उनके दादा को ठेका मजदूर के रूप में त्रिनिदाद में पटक दिया वहां से उबरना उनके लिए आसान नहीं था। अपमान और कठिनाइयों का सामना उनके पिता को भी करना पड़ा। यही वजह था कि लाख बुद्धिमान होने के बावजूद नायपॉल के पिता को लेखक के रूप में वह प्रसिद्धि नहीं मिल पाई। वे एस असफल लेखक बन कर रह गए। क्योंकि वे त्रिनिदाद में सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन को नहीं तोड़ पाए। लेकिन पिता के परिश्रम के मजबूत आधार पर नायपॉलकी साहित्यिक आभा प्रसारित हुई। जो सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन उनके पिता के समय नहीं टूट पाए, बाद में नायपॉल अपनी कृति से उसे तोड़ने में सफल हुए और त्रिनिदाद के साथ पूरी दुनिया में सम्मान अर्जित करने में भी।

कुछ लोग नायपॉल की इसलिए आलोचना करते हैं कि उन्होंन ब्रिटिश सरकार की भारत पर अवैध रूप से कब्जा करने के लिए कभी आलोचना नहीं की। आलोचकों का तो यहां तक कहना है कि उन्होंने आलोचना इसलिए नहीं की क्योंकि उनमें निंदा करने की बौद्धिक साहस ही नहीं था। कुछ आलोचकों का तो यहां तक कहना है कि नायपॉल ने ब्रिटिश हुकूमत की आलोचना नहीं करके अपने पूर्वजों की सुरक्षा नहीं कर पाने के लिए भारत से ही बदला लिया।

लेकिन उनकी आलोचना करने वालों को यह नहीं पता कि अपनी लेखनी के माध्यम से नायपॉल ने ब्रिटिश सरकार की जितनी आलोचना की शायद ही किसी और ने की हो। नायपॉल ने उनकी संस्कृति और मूल्य पर आघात किया। जो काम ब्रिटेन ने भारत में बाद में करना शुरू किया। वह काम उन्होंने शुरूं में करना शुरू कर दिया। नायपॉल ने अपनी किताबों में उसी को आधार बनाकर उनपर प्रहार करना शुरू किया। अगर ब्रिटेन में संस्कार और मूल्य के आधार पर भारत के प्रति झुकाव बढ़ा है तो वह नायपॉल की ही देन मानी जा सकती है। कहा भी जाता है अगर किसी को जीतना है या वश में करना है तो उसकी संपत्ति मत छीनो उसे अपने वश में कर लो।

ब्रिटेन ने हम पर राज हमारी संपत्ति छीनकर की थी, बाद में हमारी संस्कृति और भाषा पर प्रहार करना शुरू किया। लेकिन नायपॉल ने भारतीय मूल्य के आधार पर ब्रिटेन के मूल पर प्रहार किया। यही कारण है कि ब्रिटेन वासियों का भारतीय के प्रति धारणा ही नहीं बदली है बल्कि उसमें भारतीय मूल्य और संस्कृति अपनाने में होड़ सी मची है। क्या किसी आलोचक ने नायपॉल के इस पक्ष पर विचार किया है। मृत्यु से पहले तक अगर विद्याधर सूरजप्रसाद नेपाल (नायपॉल) को विश्व के जीवित बेहतरीन साहित्यकार होने की ख्याति मिली थी तो वैसे नहीं मिली, क्योंकि वे वर्तमान के साथ भविष्य के भी रचयिता माने जाते थे।

URL: Interesting facts about noble prize winner writer VS Naipaul

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