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सूखा हो या बाढ़, जब तक नदियों को नहीं जोड़ा जाता, इनका स्थाई समाधान संभव नहीं है!

इस समय भारत के कई राज्स सूखे से जूझ रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार जब सत्ता में आई थी तो उन्होंने नदियों को जोड़ने की योजना का खाका खींचा था, लेकिन सत्ता बदलते ही इस पर काम रुक गया, अन्यथा पिछले 10 साल में हम सूखे और बाढ़ की समस्या को बहुत हद तक कम कर सकते थे! नदियां हमारी जीवन रेखा रही हैं और इसका सही संयोजन न करना ही सूख और बाढ जैसी समस्या को जन्म दे रहा है। आंध्रप्रदेश की कृष्णा और गोदावरी को जोड़ने की योजना फलीभूत होने पर तकरीबन साढ़े तीन लाख एकड़ भू क्षेत्र को फायदा होगा। नदियों का यह मिलन कृष्णा डेल्टा के किसानों के लिये वरदान साबित होने वाला है। दूसरी तरफ मध्य प्रदेश में नर्मदा और क्षिप्रा को जोड़ने से वहां के नागरिकों को बहुत लाभ हुआ है। मध्यप्रदेश में सूखे की उस तरह की समस्या नहीं है, जैसा कि महाराष्ट्र में है।

सूखे की समस्या से जूझ रहे बूंदेलखंड को भी इससे बाहर निकालने के लिए योजना तैयार है। केन और बेतवा नदी को जोड़ने का प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। केन बेतवा लिंक परियोजना से बुन्देलखण्ड अंचल में सूखे से निजात मिल जाएगी। इससे 4.64 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होगी और करीब 13 लाख लोगों को पीने का पानी सुलभ हो जाएगा। वर्तमान में देश भर में 26 नदियों को जोडने की योजना़ प्रस्तावित है।

अगर ज्यादा पानी वाली नदियों को कम पानी वाली नदियों से जोड़ा जाता है तो न केवल बाढ़ और सूखे का स्थायी समाधान होगा बल्कि बिजली उत्पादन में भी भारी बढ़ोत्तरी हो जाएगी। एशियाई विकास बैंक के पूर्व निदेशक कल्याण रमण की मानें तो इस परियोजना से 39 लाख मेगावाट बिजली का अतिरिक्त उत्पादन होगा और 8 करोड़ एकड़ क्षेत्र में अतिरिक्त सिंचाई की सुविधा मिल जाएगी।

जानकारी के मुताबिक देश में 58 हजार मिलियन घन फुट पानी है। इसमें से महज 12 प्रतिशत पानी का ही उपयोग हो पाता है। यानी कि बाकी का 76 फीसदी पानी बहकर समुद्र में चला जाता है। यानी नदियों को नहरों के माध्यम से आपस में जोड़ दिया जाये तो इतनी बड़ी मात्रा में पानी की बर्बादी रोकी जा सकती है और उस पानी का खेती के काम में उपयोग किया जा सकता है। यही नहीं इस परियोजना को उत्पादन में बढ़ोतरी का भी एक बड़ा जरिया माना जा रहा है। नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना से बाढ़-सूखा जैसी स्थितियाँ खत्म हो जाएगी और कृषि संकट भी दूर हो जाएगा।

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