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कपिल सिब्बल के बचाव में एक अन्य अधिवक्ता से बोले मुख्य न्यायाधीश, क्या भाजपा आपको फंडिंग करती है?

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी.एस.ठाकुर विमुद्रीकरण पर सुनवाई के दौरान आज अचानक से अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय पर भड़क उठे!विमुद्रीकरण को रद्द कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में उतरे कांग्रेसी सांसद अधिवक्ताओं की फौज पर सवाल उठाते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट से मांग कर डाली थी कि ये लोग संसद में बहस की जगह अदालत में बहस कर अपना निजी स्वार्थ साध रहे हैं, इसलिए अदालत को यह तय करना चाहिए कि इनकी याचिका जनहित याचिका की श्रेणी में आती भी है या नहीं? आज मुख्य न्यायाधीश ने अश्विनी उपाध्याय पर भड़कते हुए कहा कि आपने मिस्टर सिब्बल के लिए तो कह दिया कि वह अदालत में राजनीतिक एजेंडा चलाने के लिए चले आते हैं, फिर आप यहां क्या करने आते हैं?

दरअसल आज सुबह अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने समान नागरिक संहिता पर सुनवाई के लिए अपील की थी। उन्होंने चीफ जस्टिस से यह मांग की थी कि पिछले एक साल से याचिका लगी हुई है। यह महिलाओं के अधिकार और भारत की एकता-अखंडता से जुड़ा मामला है। इसलिए वह सेवानिवृत्ति से पहले इसे सुनन लें। इसके बाद कपिल सिब्बल ने विमुद्रीकरण पर अंतरिम राहत देने की मांग करते हुए अपनी याचिका को मेंशन किया और यह मांग की कि विमुद्रीकरण पर सुप्रीम कोर्ट को अंतरित आदेश पारित करनी चहिए!

सुनवाई के दौरान ही मुख्य न्यायाधीश ने एकाएक अश्विनी उपाध्याय से कहा कि मिस्टर उपाध्याय सुप्रीम कोर्ट को अपनी पार्टी के कैंपेन के लिए इस्तेमाल न करें। आप अदालत में अपनी पार्टी का एजेंडा चला रहे हैं। क्या भाजपा आपको इसके लिए फंडिंग करती है? क्या भाजपा ने पार्टी एजेंडा चलाने के लिए आपको सुप्रीम कोर्ट भेजा है? कल आप मिस्टर कपिल सिब्बल के लिए कह रहे थे कि वह पार्टी का एजेंडा अदालत में चला रहे हैं तो फिर आप क्या कर रहे हैं?

दरअसल अश्विनी उपाध्याय ने जनहित से जुड़े मुद्दे जैसे समान नागरिक संहिता, तीन तलाक, हलाला जैसे मुद्दे पर लगातार जनहित याचिका दायर की है। यही नहीं, 8 नवंबर के बाद विमुद्रीकरण की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में दायर 24 याचिका में 23 याचिका इसे रद्द करने या जिला सहकारिता बैंक को नोटों को इजाजत देने को लेकर लगाई गई है तो एक याचिका अश्विनी उपाध्याय की ओर से सभी बड़े नोटों को हमेशा के लिए बंद कराने को लेकर है।

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विमुद्रीकरण पर लगातार हो रही बहस में कांग्रेस के बड़े सांसद वकील जैसे- कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, पी चिदंबरम, अभिषेक मनु सिंघवी, विवेक तनखा, के.टी.एस. तुलसी सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित होकर इसे रद्द कराने का प्रयास कर रहे हैं। सरकार की ओर से महान्यावादी मुकुल रोहतगी तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं तो एक याचिकाकर्ता के नाते भाजपा प्रवक्ता व अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय भी इस बहस का हिस्सा हैं।

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नोटबंदी को रद्द कराने के लिए पहुंचे सभी कांग्रेसी सांसद वकीलों को देखकर भाजपा नेता व वकील अश्विनी उपाध्याय ने मुख्य न्यायाधीश टी.एस.ठाकुर की अध्यक्षता वाली बेंच से यह मांग कर डाली थी कि पहले तो न्यायपालिका यह सुनिश्चित करे कि इन राजनेताओं के द्वारा निजी हित में दायर की गई याचिकाएं ‘जनहित याचिका’ की श्रेणी में आती भी हैं या नहीं? उन्होंने दूसरी मांग यह की कि एक तरफ जहां संसद का सत्र चल रहा है और कांग्रेस पार्टी संसद को ठप किए है, वहीं कांग्रेसी सांसद वकील संसद की जगह सुप्रीम कोर्ट में नोटबंदी को रद्द कराने के लिए बहस कर रहे हैं। आखिर क्या कारण है कि इसी बात को संसद में रखने में इनकी रुचि नहीं है? क्यों न ‘नो वर्क, नो पे’ का कानून ऐसे सांसदों पर लागू किया जाए जो पैसे तो जनता की जेब से लेते हैं और अपना व अपनी पार्टी का निजी हित साधने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं? अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट की बेंच से पूछा कि क्या जनता के पैसे बर्बाद करने वाले इन सांसद वकीलों की जनहित याचिका सुनवाई के योग्य है?

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अश्विनी उपाध्याय ने बहस के दौरान तर्क दिया था कि सुप्रीम कोर्ट में विमुद्रीकरण को रद्द कराने के लिए एक भी जनहित याचिका गरीबों या किसानों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर नहीं किया गया है। सभी जिला सहकारिता बैंक या राजनेताओं की ओर से डाला गया है, इसलिए यह कहना अनुचित है कि विमुद्रीकरण से गरीबों को परेशानी हो रही है। सारे पीआईएल या तो कांग्रेस के इन वकीलों की ओर से दायर किए गए हैं या फिर इन वकीलों के क्लाइंट कॉपरेटिव बैंकों की लॉबी की ओर से।

उपाध्याय ने कहा था कि अभी तक इस संसद सत्र में 200 करोड रुपया बर्बाद हो चुका है। यहां उपस्थित चार वरिष्ठ वकील संसद के सदस्य हैं। ये लोग जो बहस यहां कर रहे हैं वो संसद में क्यों नहीं जााकर बहस करते हैं? यदि इसके बाद भी मी-लॉर्ड आप इनको सुनना चाहते हैं तो इस बात पर सुनवाई होनी चाहिए कि निजी स्वार्थों के लिए नेताओं के द्वारा दायर और नेताओं के ही द्वारा अदालत में बहस वाली याचिका जनहित याचिकाओं की श्रेणी में आती भी है या नहीं?

इसके अगले ही दिन अश्विनी उपाध्याय ने मीडिया में यह बयान भी दिया था कि वह सांसद वकीलों के खिलाफ जनहित याचिका दायर करेंगे। उनके अनुसार, जो सांसद वकील हैं, उन्हें विमुद्रीकरण के विरोध में संसद के अंदर बहस करना चाहिए ताकि जिस बात के लिए ये जनता की मेहनत की कमाई से सैलरी ले रहे हैं, उसे ईमानदारी से निभाएं! लेकिन ये नेता संसद को ठप कर ये रोज जनता की जेब से 9 करोड़ रुपए अतिरिक्त रूप से बर्बाद कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट में बहस कर अपनी जेब एक्स्ट्रा तौर पर भर रहे हैं! उनके अनुसार, जब कार्यपालिका व न्यायपालिका से जुड़े लोग नौकरी पर रहते हुए वकालत नहीं कर सकते तो विधायिका के लोग कैसे कर रहे हैं? इस बात से कांग्रेसी सांसद वकील बेहद आहत और गुस्से में थे! ऐसा लगता है कि अश्विनी उपाध्याय की यह बात शायद मुख्य न्यायाधीश को भी नागवार गुजरी थी, जिस कारण उन्होंने सीधे पूछ दिया कि जब कपिल सिब्बल अपना एजेंडा चलाने अदालत में आते हैं तो आपको क्या भाजपा अपना एजेंडा चलाने के लिए यहां भेजती है?

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वैसे जानकारी के लिए बता दें कि कपिल सिब्बल एक सांसद हैं जबकि अश्विनी उपाध्याय सिर्फ भाजपा प्रवक्ता। अश्विनी को जनता की मेहनत की कमाई से तनख्वाह नहीं मिलती है, जबकि एक सांसद के नाते कपिल सिब्बल जनता की कमाई से सैलरी लेते हैं! इसलिए कपिल सिब्बल और अश्विनी उपाध्याय में तुलना नहीं किया जा सकता! अब यह तो मुख्य न्यायाधीश टी.एस.ठाकुर ही बता सकते हैं कि उन्होंने दोनों के बीच तुलना आखिर किस आधार पर कर दी?

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