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छत्तीसगढ़ में भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या क्या माओवादियों को सुपारी देकर कराई गई है? कांग्रेस सरकार संदेह के घेरे में!

क्या माओवादियों और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार के बीच सांठगांठ है? और क्या इस सांठगांठ के तहत ही दांतावाड़ा के भाजपा विधायक भीमा मांडवी की हत्या कराई गई है? छत्तीसगढ़ के स्थानीय पत्रकारों और नागरिकों से बातचीत करने पर यही तथ्य उभर कर सामने आ रहा है कि माओवादियों ने एक षड्यंत्र के तहत सुपारी लेकर भाजपा विधायक की हत्या की है। कल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में एक रैली को संबोधित करते हुए इस साजिश की ओर इशारा किया था और मंडावी की मौत की सीबीआई जांच की मांग की थी, लेकिन मीडिया में बैठे शहरी माआवादियों ने इस खबर को दबाने का काम किया है।

अमित शाह ने कहा था कि दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या सामान्य घटना नहीं है। इसमें राजनीतिक षड्यंत्र की बू आ रही है। भाजपा अध्यक्ष ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा कि यदि वो इस मामले में कुछ छुपा नहीं रहे हैं तो मंडावी पर हमले की जांच सीबीआई से करवानी चाहिए। मंडावी की पत्नी ने भी इसकी सीबीआई जांच की मांग की है। शाह ने कहा कि जिनको कुछ छुपाना नहीं होता है वह सीबीआई से नहीं डरता है। भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद सबसे पहले सीबीआई को राज्य में जांच करने से रोका है। जबकि यहां 15 वर्ष तक रमन सिंह की सरकार ने कभी ऐसा नहीं किया था।


गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने नौ अप्रैल को आईईडी ब्लास्ट को अंजाम दिया था। पहले फेज के चुनाव से ठीक पहले भाजपा विधायक भीमा मंडावी के काफिले पर किए गए इस ब्लास्ट में विधायक की मौत हो गई थी, वहीं 3 सुरक्षा कर्मी भी शहीद हो गए थे साथ ही मांडवी के ड्राईवर की भी मौत हो गई थी।

कांग्रेस की सरकार और माओवादियों के बीच सांठगांठ के कुछ पुख्ता सबूत-

  1. दिसंबर 2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनी। इसके दो महीने बाद ही फरवरी में शहरी माओवादी दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद, सीपीएम नेता संजय पराटे सहित दो अन्य के खिलाफ सबूत ना मिलने की दलील देकर सुकमा (छत्तीसगढ़) में दर्ज स्थानीय आदिवासी की हत्या का केस छत्तीसगढ़ पुलिस ने वापस ले लिया। इन सभी का नाम चार्जशीट से हटा दिया गया। नवंबर 2016 में इन लोगों पर हत्या, दंगे व आपराधिक साजिश की धाराओं में केस दर्ज हुआ था। नंदिनी सुंदर द वायर के फाउंडर सिद्धार्थ वरदराजन की पत्नी है और दोनों पति-पत्नी माओवादियों के घोर पैराकार हैं।
  2. दरअसल 4 नवंबर 2016 को तोंगपाल थाने में हत्या का एक मामला दर्ज हुआ था। नामापारा गांव के सोमनाथ की हत्या अज्ञात माओवादियों ने की थी। इस मामले में नवंबर 2016 में ग्रामीणों की शिकायत पर नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद के खिलाफ भादवि की धारा 302, 120 बी, 147, 148, 149, 352 तथा 25, 27 आर्म्स एक्ट के तहत तोंगपाल थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी।
  3. माओवादी निर्मला अक्का पर 157 आपराधिक मामला दर्ज था। निर्मला बड़ी माओवादी नेता थी। छत्तीसगढ़ में माओवादियों की ओर से 2012 में अगवा किए गए सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के एवज में माओवादियों ने अन्य शर्तों के साथ निर्मला अक्का की रिहाई की भी मांग की थी। तब की रमण सिंह सरकार ने निर्मला को रिहा नहीं किया था। छत्तीसगढ़ मंे कांग्रेस की सरकार बनते ही निर्मला अक्का के बारे में भी दलील दी गई कि सबूतों का अभाव है, इसलिए उन्हें बरी कर दिया गया। निर्मला माओवादियों के लिए बड़ी दीदी है।
  4. एक अन्य माओवादी नक्का राव को पुलिस ने हथियारों के साथ पकड़ा था। कांग्रेस की सरकार बनते ही उन पर कार्रवाई करने वाले आईजी का ट्रांसफर कर दिया गया। उसके खिलाफ चार्जशीट तक फाइल नहीं की गई।
  5. शहरी माओवादी बेला भाटिया को एक्स श्रेणी की सुरक्षा छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने उपलब्ध कराई।
  6. आरोप है कि बेला भाटिया के पति ज्यां द्रेज और दो लुटियन्स पत्रकारों के दबाव में माओवादियों के खिलाफ कठोर रहे बस्तर के पूर्व आईजी एसआरपी कल्लूरी का कांग्रेस आलाकमान के कहने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आर्थिक अपराध शाखा से ट्रांसफर कर दिया। ज्ञात हो कि बस्तर मंे माओवाद की पूरी जड़ करीब 1300 करोड़ रुपये के तेंदू पत्ते की स्मग्लिंग, कंपनियों से फिरौती वसूली से जुड़ा है, जिसका बड़ा हिस्सा दिल्ली मंे एकेडमी, एनजीओ और मीडिया में बैठे शहरी माआवादियों तक भी पहुंचता है। कल्लूरी को हटवाने का असली मकसद इस लूट तंत्र को तथावत बनाए रखना है।

भीमा मंडावी कांग्रेस और माओवादी, दोनों के लिए थे मुसीबत
बस्तर की दंतेवाड़ा सीट से चुने गये भाजपा विधायक भीमा मंडावी कांग्रेस पार्टी और माओवादी, दोनों पर भारी पड़ते थे। भीमा मंडावी दिग्गज कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा को 2018 के चुनाव में पराजित कर विधायक बने थे। बस्तर संभाग में कुल 12 विधानसभा सीट है जिसमें से सिर्फ दंतेवाड़ा पर ही बीजेपी का 2018 के चुनाव में कब्जा हुआ था। 2008 में तो वह बस्तर के टाइगर महेंद्र कर्मा को भी हरा चुके थे। भीमा मंडावी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत बजरंग दल से की थी। वह बेहद जुझारू प्रवृत्ति के नेता थे। उनकी हत्या के बाद 11 अप्रैल को बस्तार के मतदान में उनकी पत्नी और पूरे परिवार ने हिस्सा लेकर उनके उसी जुझारूपन को जिंदा रखने का प्रयास किया है।


ज्ञात हो कि महेंद्र कर्मा की हत्या भी माओवादियों ने की थी और उस वक्त भी यह बात चर्चा में भी कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अपने मजबूत प्रतिद्वंद्वी की हत्या की सुपारी माओवादियों को दी थी। यहां यह भी गौर करने की बात है कि महेंद्र कर्मा ने माओवादियों के खिलाफ जबरदस्त लड़ाई लड़ी थी और सलवा-जुडूम की अवधारणा उनके द्वारा ही विकसित की गई थी। जबककि दूसरे कांग्रेसी नेता माओवादियों के समर्थक माने जाते थे। माओवादियों ने उस वक्त कांग्रेस के पूरी लीडरशिप को ही नष्ट कर दिया था। महेंद्र कर्मा होते तो आज छत्तीसगढ़ कांग्रेस का लीडरशिप की कमान उनके हाथ में होती। पहले महेंद्र कर्मा और अब भीमा मंडावी जैसे इलाके के दो मजबूत नेताओं की हत्या से किन लोगों को फायदा हुआ है, यह छत्तीसगढ़ का बच्चा-बच्चा जानता है।

इसलिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की इस बात में वजन दिखता है कि हो न हो भीमा मंडावी की हत्या की सुपारी राजनीतिक साजिश के तहत दी गई हो। यदि इस आरोप से छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार बचना चाहती है तो उसे उनकी हत्या की जांच सीबीआई को तुरंत सौंप देना चाहिए।

और जाते-जाते। जिस छत्तीसगढ़ को वित्तीय प्रबंधन के लिए पुरस्कार मिलता था, उस छत्तीसगढ़ का सरकारी खजाना कांग्रेस के आने के केवल तीन महीने में ही पूरी तरह से खाली हो चुका है। सूत्र बताते हैं कि सरकारी कर्मचारियों को देने तक के लिए पैसे खजाने में नहीं है। तो क्या मप्र के कमलनाथ सरकार की तरह कांग्रेस आलाकमान के लिए छत्तीसगढ़ की सरकार भी एटीएम की तरह काम कर रही है? या फिर छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने सहायता के एवज में माओवादियों पर खजाना लुटा दिया है? यह भी एक गंभीर जांच का विषय है।

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