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राहुल गांधी में प्रधानमंत्री का सपना देखने वाले कांग्रेस पार्टी को उसके सहयोगी बता रहे हैं हैसियत!

नरेंद्र मोदी भय से देश के तमाम विपक्षी दल एकजुट होकर चुनाव लड़ना चाहते हैं मुद्दा सिर्फ एक कि किसी भी तरह से मोदी दोबारा वापस ना आए। यह सब तब तक ठीक चल रहा था जब तक कांग्रेस बेहद कमजोर हालत में थी। जब से तीन बड़े राज्यों में कांग्रेस ने बीजेपी को हरा कर सत्ता पाई है तब से कांग्रेस में महागठबंधन की अगुवाई करने का सपना पलने लगा है।

कांग्रेस के इस बढ़ते कद से तमाम क्षेत्रीय दलों में घबराहट हो गई उन तमाम दलों को कांग्रेस का गठबंधन धर्म का इतिहास पता है कि कैसे कांग्रेस गठबंधन धर्म को निभाती है। चौधरी चरण से चरण सिंह से लेकर चंद्रशेखर तक केंद्र की सरकारों में और राज्य की सरकारों में किस तरह से कांग्रेस अपने गठबंधन की सहयोगी ऊपर राजसी व्यवहार करती है, उसका नमूना कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमार स्वामी पेश कर रहे हैं।

कुमारस्वामी ने कहा कांग्रेस के गठबंधन कांग्रेस के विधायकों से तंग आ चुके हैं। अब वह मुख्यमंत्री पद पर नहीं रह सकते। कुमारस्वामी ने पिछले 6 महीने में यह तीसरी बार कहा है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में 2 सबसे बड़े प्रतिद्वंदी सपा और बसपा एक हो गए लेकिन उन्होंने कांग्रेस को साइड कर दिया। सपा और बसपा ने सिर्फ मां बेटे के लिए रायबरेली और अमेठी की सीट छोड़ी। कांग्रेस को उससे ज्यादा उत्तर प्रदेश में देना नहीं चाहते। हताश कांग्रेस ने प्रियंका का ट्रंप कार्ड खेला।

अखिलेश यादव ने कहा प्रियंका का राजनीति में आना तो ठीक है लेकिन कांग्रेस को हमारे साथ आना चाहिए। हमने पहले ही उन्हें 2 सीट दे रखा है। साफ है राहुल गांधी में प्रधानमंत्री का सपना देखने वाले कांग्रेस पार्टी को उसके सहयोगी हैसियत बता रहे हैं। इधर अखिलेश ने 2 सीट का ऑफर किया तो उधर लालू पुत्र तेजस्वी ने साफ संकेत दिया कि कांग्रेस के लिए बिहार में वह बहुत स्पेस नहीं छोड़ सकते। 2014 के बाद लगातार मोदी के बढ़ते कद से भयभीत भ्रष्टाचार के आरोपी तमाम राजनीतिक दल के नेताओं में जो हुआ उसके कारण कर्नाटक में जब कांग्रेस जेडीएस की सरकार बनी तो वहां महागठबंधन की तमाम नेता ने तस्वीर खिंचवाई लेकिन जब 3 राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी गठबंधन का सांगठनिक एकता शपथ ग्रहण समारोह में नहीं दिखा । यह संदेश था कांग्रेस को। प्रधानमंत्री का सपना ना देखे।

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मोदी के भय से तमाम राजनीतिक दल एक तो होना चाहते हैं लेकिन उन का मुखिया कौन होगा यह तय नहीं कर पा रहे ।इन तमाम राजनीतिक दलों को सिर्फ यह भय सता रहा है कि मोदी आ गए तो उनका कुनबा नष्ट हो सकता है। भ्रष्टाचार के आरोप में चौतरफा घिरे लालू मुलायम और मायावती समेत हर राजनीतिक दलों को लगता है कि नोटबंदी से जून के ऊपर नकेल कसी गई भ्रष्टाचार के मामले की जो उनकी जांच चल रही है यदि नरेंद्र मोदी की सरकार दोबारा आ गई तू जांच और तीव्र होगी और वे सलाखों के पीछे होंगे।

जेल जाने के भय से गठबंधन के तमाम आपसी विरोधी दल एक तो हो रहे हैं लेकिन अगवाई के लिए वह नेता नहीं कर पा रहे हैं। कांग्रेस को तो संकेत दे दिया है कि आप हमारी अगुवाई कतई नहीं कर सकते। उत्तर प्रदेश में मात्र 2 सीट छोड़कर सपा-बसपा ने तो बड़ा संकेत दिया है। क्योंकि दिल्ली की राजगद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश ही जाता है। सपा बसपा ने हीं नहीं राष्ट्रीय लोक दल ने भी कांग्रेस से एक तरह से किनारा कर लिया।

राजस्थान में उसके सहयोगी होने के बावजूद अजीत सिंह शपथ ग्रहण समारोह में नहीं गए। अजीत जानते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मुस्लिम और दलितों का जो समीकरण है कांग्रेस के आने से उसमें सिम लग सकता है इसलिए उत्तर प्रदेश के तमाम राजनीतिक दलों ने कांग्रेस से किनारा कर को तय कर लिया है कांग्रेसी आएगी भी उन्हें अपना कद छोटा करके उत्तर प्रदेश में आना होगा और लाचार स्थिति में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सपा बसपा और लोकदल से गठबंधन करती है तो संदेश साफ जाएगा राहुल गांधी का को लेकर कांग्रेस का सपना देख रही है ऐसे में महागठबंधन के तमाम सपने चकनाचूर हो सकते हैं जो सपने राहुल की ताजपोशी को लेकर 3 राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस लगातार देख रही है।

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