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ब्रिक्स से पहले मोदी को गिरफ्तार कराने में जुटे भ्रष्ट व्यापारियों और कट्टरपंथी मुसलिमों को मुंह की खानी पड़ी!

भ्रष्टाचार पर हुए प्रहार से कराहने वाले देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी मोदी से नाराज हैं। तभी तो भ्रष्टाचारी व्यापारियों तथा कश्मीरी कट्टरपंथी मुसलिमों के एक वर्ग ने जोहंसबर्ग में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गिरफ्तार कराने का प्रयास किया था, लेकिन यहां भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी, क्योंकि मोदी को गिरफ्तार कराने का उनका प्रयास बुरी तरह विफल हो गया।

मुख्य बिंदु

* जम्मू-कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करने से नाराज होकर की थी गिरफ्तारी की मांग

* 2016 में भ्रष्टचार के मामले पर मोदी की डांट से आहत व्यापारियों के मुसलिमों ने की थी गिरफ्तार की मांग

दसवां ब्रिक्स सम्मेलन -2018 दक्षिण अफ्रिका के जोहेंसबर्ग में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में पांच सदस्य देशों ब्राजील, रूस, भारत, चीन तथा दक्षिण अफ्रिका के शासनाध्यक्ष भाग लिया था। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तीन अफ्रिकी देशों की यात्रा करने के बाद इस सम्मेलन में हिस्सा लिया। लेकिन इस सम्मेलन से पहले ही कुछ कट्टरपंथी मुसलिमों तथा भ्रष्ट व्यापारियों ने उन्हें गिरफ्तार कराने का प्रयास किया। ये वही लोग थे जिन्हें मोदी ने 2016 में भ्रष्टाचार को लेकर डांट पिलाई थी। ये लोग अपने उस अपमान का बदला मोदी से लेना चाहते थे। लेकिन मोदी को गिरफ्तार करने का प्रयास बुरी तरह विफल हो गया।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार साऊथ अफ्रीका कश्मीरी एक्शन ग्रुप तथा मुसलिम वकील एसोसिएशन ने जम्मू-कश्मीर में मोदी के शासन को लेकर नाराजगी जताई। इसी मामले को लेकर ये लोग मोदी की गिरफ्तारी से लेकर उनके खिलाफ मुकदमा चलाने तक की मांग की। कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करने को लेकर भी ये लोग नाराज थे। मोदी की गिरफ्तार की मांग इसी मामले से प्रेरित थी। इस मामले में विदेश मंत्रालय का कहना है कि यह मामला गलत जानकारी के आधार पर झूठा विमर्श स्थापित करने का प्रयास है।

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वैसे भी संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता तो उसी दिन संदेह के घेरे में आ गई जब कनाडा में रहने वाले पाकिस्तानी इसलाम के जानकार जफर बंगश ने उसे मदद करने का दावा किया था। बंगश ने कहा था कश्मीर के मसले पर रिपोर्ट बनाने में उन्होंने ही संयुक्त राष्ट्र की मदद की थी। उन्होंने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र के हाई कमिश्नर अल हुसैन को इस मामले में व्यक्तिगत रूप से मदद करने में काफी आदर और गर्व महसूस हुआ। सवाल उठता है कि क्या इसके बाद भी संयुक्त राष्ट्र की इस एकतरफा रिपोर्ट पर संज्ञान लेने की जरूरत थी?

इस मामले में जोहेंसबर्ग में जैसे ही मोदी की गिरफ्तारी के लिए आवेदन दिया गया, सरकार के प्रतिनिधि वकीलों ने आवेदनकर्ताओं को कानून का आईना दिखा दिया। उन्होंने कहा कि क्या आपलोगों को ये भी पता नहीं है कि मोदी यहां के आमंत्रित मेहमान हैं और उन्हें संवैधानिक तौर पर क़ानूनी रूप से छूट मिली है। सरकारी प्रतिनिधियों ने उनकी मांग को ही नाजायज ठहरा दिया।

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