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जिहाद, मतांतरण और झारखंड: भाग-3

जिहाद, मतांतरण और झारखंड श्रृंखला का यह तीसरा भाग है। पिछले दोनों भाग इस लिंक से पढ़े जा सकते हैं। भाग-2 से क्रमशः

सारिणी 5 : सभी संप्रदायों और ईसाइयों की वृद्धि दर

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 1991-20011991-20012001-20112001-2011
 सभी संप्रदायईसाईसभी संप्रदायईसाई
झारखंड23.2434.5322.4229.74
पलामू27.8539.1927.3118.48
हजारीबाग-धनबाद24.5937.3420.6017.99
संथाल परगना22.03136.124.4061.70
राँची22.9520.6823.0523.52
सिंहभूम19.5532.0719.5728.70

स्रोत : बजाज ( 2015 )

हाँ, इतना अवश्य है कि पलामू क्षेत्र में जहाँ पहले दशक में सभी संप्रदायों की तुलना में ईसाइयों की वृद्धि दर अधिक रही, वहीं दूसरे दशक में कम हो गई । यही स्थिति रही  हजारीबाग-धनबाद क्षेत्र की । राँची क्षेत्र इस अर्थ में अपवाद है कि वहाँ पहले दशक में अपेक्षाकृत कम वृद्धि दर रही, किंतु दूसरे दशक में थोड़ा बढ़ गई ।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि जहाँ मुसलमानों की संख्या में तीव्र वृद्धि का मुख्य कारण बांग्लादेशी घुसपैठ है, वहीं ईसाइयों की उच्च वृद्धि दर का कारण मतांतरण है । पश्चिम बंगाल से सटे जिलों में मुसलमानों की अप्रत्याशित रूप से बढ़ी संख्या का कारण पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश से आए मुसलमान हैं, वहीं संथाल परगना में मतांतरण के कारण ईसाइयों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई । ध्यातव्य है कि इसी क्षेत्र में पाकुड़ जिला है, जिसमें वनवासियों का प्रतिशत लगभग 43 प्रतिशत है, जबकि पूरे झारखंड में वनवासियों का अनुपात है मात्र 26.3 प्रतिशत । इसी प्रकार दुमका में वनवासी समाज 43 प्रतिशत है ।  परंतु यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जहाँ पूरे झारखंड में ईसाइयों का अनुपात है 4.3 प्रतिशत, वहीं दुमका में है 6.54 प्रतिशत । अर्थात राज्य के औसत से लगभग डेढ़ गुना अधिक । इस प्रकार सर्वाधिक वनवासी वाले क्षेत्र मुसलमानों और ईसाइयों के लिए सर्वाधिक उर्वर सिद्ध हुए हैं ।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि बांग्लादेशी घुसपैठ, मुसलमानों की उच्च जन्म दर और ईसाइयों द्वारा किए जा रहे मतांतरण के परिणामस्वरूप मुसलमान और ईसाई झारखंड में किसी महामारी की तरह फैल रहे हैं । इन दोनों समुदायों के कारण राज्य का धर्म, सभ्यता और संस्कृति नष्ट हो रही है । मुसलमान-बहुल क्षेत्रों में सर्वत्र मस्जिद, कब्रगाह, दरगाह, मजार आदि देखे जा सकते हैं । उर्दू के प्रति पागलपन जैसा लगाव देखा जा सकता है । मुसलमानों  छोड़ कर जिस भाषा को कोई नहीं जानता उसका प्रयोग करना समाज और राष्ट्र-विरुद्ध बात है ।  दुर्भाग्य से झारखंड में उर्दू का जोर बढ़ता जा रहा है । इसी प्रकार मदरसों का भी जोर बढ़ता जा रहा  है ।

अभी हाल ही में सैकड़ों की संख्या में ऐसे सरकारी विद्यालयों का पता चला है जिनमें न जाने कब से रविवार के स्थान पर शुक्रवार को छुट्टी दी जा रही थी ।  मुसलमान शिक्षकों का कहना है कि इन विद्यालयों में लगभग सभी-के-सभी छात्र मुसलमान हैं, जो शुक्रवार को नमाज पढ़ने के लिए एक से दो घंटे तक की छुट्टी लेते थे, इसलिए शुक्रवार को छुट्टी करने का निर्णय लिया गया । शुक्रवार के स्थान पर रविवार को विद्यालय खोले जाते हैं । यह कितना चिंताजनक, विभेदकारी और पृथकतावादी कदम है ! विद्यालयों की छुट्टी क्या छात्रों के धर्म, मजहब या रिलिजन से तय होगी ? फिर इस देश का क्या होगा ? झारखंड की संस्कृति पर मुसलमानों की निरंतर बढ़ती संख्या का ऐसा असर पड़ा है कि यह राज्य गायों की तस्करी में अग्रणी है । थोड़े से श्रम से झारखंड के मुसलमान गायों को बांग्लादेश की सीमा के अंदर पहुँचवा देते हैं । यह काम रात-दिन अर्थात निरंतर चलता रहता है । वैसे भी यह तस्करी लंबे समय से चल रही  है । कोई भी गायों के झुंडों को ले जाते हुए देख सकता है । जिस झारखंड में बाबा बैद्यनाथधाम, बासुकिनाथधाम और छिन्नमस्तिका जैसे प्रसिद्ध तीर्थस्थल हैं, वहाँ ऐसा नहीं लगता कि यह राज्य हिन्दू-बहुल और हिन्दू संस्कृति का पोषक है । सर्वत्र मांसाहार के चिह्न देखे जा सकते हैं । बांग्लादेशी घुसपैठ का सर्वाधिक दंश असम झेल रहा है ।1 इसलिए समय रहते मुसलमानों के प्रसार को रोकना होगा ।

पिछले जून महीने में मुझे दुमका के गावों में जाने का अवसर मिला । गावों में बहुत अंदर मुझे एक कब्रगाह दिखी । इसे चारों ओर से दीवार से घेरा गया था और एक स्थान पर उर्दू में कुछ लिखा हुआ था । मेरे साथ वहीं का एक वनवासी था । मैंने उससे पूछा तो उसने बताया कि किसी दूसरे गाँव के मुसलमानों की यह कब्रगाह है । थोड़ी देर के बाद मैं उस गाँव में गया, जो मुसलमान-बहुल था । हर घर की दीवार पर मक्का और मदीना की तस्वीर या अरबी में अल्ला लिखा दिखा । यह मेरे लिए विचित्र बात थी । पहले कभी ऐसा नहीं देखा था । परंतु बाद में इसका औचित्य समझ में आने लगा । वास्तव में ईसाइयों ने अपने घरों पर ईसाई चिह्नों और प्रतीकों के प्रयोग को आरंभ किया । झारखंड में ईसाइयों के घर दूर से ही दिख जाते हैं, क्योंकि क्रॉस का निशान बना होता है । दीवारों, खिड़कियों और दरवाजों पर यह निशान लगा होता है । ईसाइयों से भिन्न दिखने के लिए मुसलमानों के लिए संभवतः यह आवश्यक हो गया कि वे भी कोई प्रतीक लगाएँ । इस प्रकार झारखंड के मुसलमानों और ईसाइयों के बीच अच्छी-खासी प्रतिस्पर्धा चलती रहती है । पर इस पर यदि हम ध्यान दें तो इन चिह्नों और प्रतीकों में भारतीयता या भारतीय संस्कृति कहाँ है ? धीरे-धीरे विधर्मियों की बढ़ती शक्ति के कारण भारतीयता विलुप्त होती जा रही है ।

सर्वाधिक दयनीय स्थिति है वनवासी समाज की । झारखंड में मुसलमान और ईसाई वनवासी समाज को निगल कर ही बलिष्ठ हो रहे हैं । 2001 में वनवासी धर्मावलंबियों का प्रतिशत था 13.04, जो 2011 में घटकर रह गया 12.84 प्रतिशत । 2001 में पहली बार मुसलमानों का अनुपात ( 13.8% ), वनवासियों के अनुपात ( 13.04%) से आगे निकल गया । कैसी विडंबना है कि आज झारखंड में वनवासी धर्मावलंबियों से अधिक संख्या मुसलमानों की है । जिस वनवासी समाज के नाम पर पृथक राज्य बना ताकि इस समाज का विकास होगा उसके धर्म का ही लोप हो गया है । मुझे स्थानीय लोगों से यह भी पता चला कि मुसलमान लव-जिहाद करके वनवासी समाज की लड़कियों से निकाह कर लेते हैं । चूँकि मुसलमान चार-चार निकाह कर सकते हैं, इसलिए वनवासी लड़कियाँ मुसलमानों की कई बीवियों में से एक बीवी बनती हैं । वनवासी बीवी के नाम पर मुसलमान वनवासियों की जमीन खरीद लेते हैं, जो अन्यथा असंभव है । इस प्रकार मुसलमान वनवासी समाज में घुस जाते हैं और घुन की तरह उसे नष्ट करने लगते हैं ।

फिर भी झारखंड पर जितना प्रभाव ईसाइयों का है उतना मुसलमानों का नहीं है । एक प्रकार से झारखंड की शिक्षा और स्वास्थ्य पर ईसाइयों का वर्चस्व है । शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र मतांतरण के अड्डे होते हैं । सभी अच्छे विद्यालय और महाविद्यालय ईसाइयों के हैं, जिनमें नामांकन कराना प्रतिष्ठा की बात मानी जाती है । एक वरिष्ठ अधिकारी से पता चला कि एक वनवासी, जो अपने धर्म को मानता था, जब वह ईसाइयों के एक प्रतिष्ठित माने जाने वाले विद्यालय में नामांकन के लिए गया, तो उसे यह कहकर लौटा दिया गया कि यह विद्यालय केवल ईसाइयों के लिए है । बाद में वह छात्र ईसाई बनकर ही उस विद्यालय में अपना नामांकन करा सका । ऐसे विद्यालयों में वर्षों ईसावाद की प्रशंसा और और भारत के धर्म की निंदा की जाती है । भारत के धर्म की निंदा का प्रकारांतर से अर्थ होता है भारत की निंदा ।  इस प्रकार पृथकतावाद और भारत-विरोध ईसाइयों की शिक्षा का आधार होता है ।2

जब भी कोई वनवासी ईसाई बनता है, तो वह अपना धर्म, संस्कृति, भाषा या बोली, आस्था-विश्वास सब कुछ गवाँ देता है । जिन चीजों पर उसे गर्व होना चाहिए अब उन्हीं चीजों से उसे वितृष्णा होने लगती है । परंतु विडंबना देखिए कि वही मतांतरित वनवासी नौकरी, शिक्षा आदि में आरक्षण प्राप्त करने के लिए संविधान प्रदत्त अनुसूचित जनजाति का अंग बना रहता है । जबकि हिन्दू हो जाने पर वह अनुसूचित जनजाति का हिस्सा नहीं माना जाता । इस प्रकार स्पष्ट है कि ईसाई होना लाभ का विषय है । मात्र 4.3 प्रतिशत ईसाइयों का राज्य के 20 से 30 प्रतिशत विद्यालयों पर कब्जा है । इन विद्यालयों में जितने शिक्षक व अन्य कर्मी चाहिएँ, उतनी तो ईसाइयों की संख्या भी नहीं है । इस प्रकार झारखंड में चर्च संभवतः नौकरी देने वाली सबसे बड़ी गैर-सरकारी संस्था है । विद्यालयों के माध्यम से चर्च प्रचुर मात्रा में धन  कमाता है । एक वरिष्ठ आयकर अधिकारी ने मुझे बताया कि जब वह झारखंड में काम कर रहे थे, तो उनके समक्ष सर्वाधिक आयकर संबंधी मामले चर्च संचालित विद्यालयों व अन्य संस्थाओं से ही आते थे । इन विद्यालयों और संस्थाओं पर आरोप होते थे कि इन्होंने आयकर की चोरी की है ।

शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर अधिकार करके झारखंड के ईसाई राजनीति को भी प्रभावित करते हैं । वनवासियों की सुरक्षित सीटों पर चुनाव जीतकर ईसाई विधायक, सांसद और यहाँ तक कि मंत्री तक बन जाते हैं । इतना ही नहीं, ये ईसाई पूरे वनवासी समाज का स्वयंभू प्रतिनिधि बन जाते हैं ।

किसी भी समाज के विभिन्न संप्रदायों के अनुपातों में बदलाव अनेक तरह की चुनौतियों को आमंत्रित करता है । विशेषकर तब यह बदलाव अत्यंत चिंताजनक हो जाता है जब बाहरी या विदेशी मजहबों के माननेवालों का अनुपात अप्रत्याशित रूप से बहुत अधिक बढ़ जाता है । यह स्थिति भारतीय धर्म एवं संस्कृति के लिए अति हानिकारक होती है । विश्वभर में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ देशी धर्म व संस्कृति को इन बाहरी मजहबों ने पूरी तरह नष्ट कर दिया । झारखंड में हुए मतांतरण पर डॉ अमित झा ने अध्ययन किया है । अपने अध्ययन के लिए उन्होंने झारखंड के मुंडा और उराँव दो वनवासी समाजों के एक-एक गाँव तथा सरना समाज के एक गाँव को चुना । वह लिखते हैं कि भारत में वनवासी समाज का ईसाई मिशनरियों द्वारा किया गया मतांतरण विवाद का विषय बन गया है । मतांतरण के प्रश्न पर झा बताते हैं कि आरंभ में अधिकतर लोगों ने केवल आर्थिक लाभों के लिए ही ईसावाद को अपनाया । यह काम इतनी जल्दबाजी में किया गया कि वनवासियों को ईसावाद का प्रशिक्षण तक नहीं दिया गया । इस प्रकार भले ही उनका बप्तिस्मा हुआ, वे चर्च जाने लगे, क्रॉस लगाने लगे और ईसाइयों की तरह हाथ तक मिलाने लगे, वे वस्तुतः नाम के लिए ही ईसाई थे ।  उन्हें इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि ईसावाद अपनाने का क्या परिणाम होने वाला है । इस प्रकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वनवासियों की पूजा-पद्धति पूर्ववत जारी रही और उसी प्रकार खलिहानी पूजा जैसे सरना त्यौहार भी । स्पष्ट है कि वनवासी पूजा-पद्धति और त्यौहार पूरी तरह ईसावाद के विरुद्ध थे । इस तरह वनवासी समाज की विचित्र स्थिति बन गई । यह समाज सरना परंपराओं और ईसावादी मान्यताओं के बीच झूलता रहा । मन से तो यह समाज सरना ही रहा, किंतु इसका बाह्य स्वरूप पूर्णत: ईसावादी हो   गया । परंतु कालांतर में ईसाई विद्यालयों में पढ़ाई करने, नियमित रूप से चर्च जाने और पादरी, पास्टर आदि के संपर्क में रहने के फलस्वरूप वनवासी धर्म व संस्कृति कब विलुप्त हो गई इसका पता ही नहीं चला ।

झा आगे लिखते हैं कि वनवासी समाज को अनुसूचित जनजाति, हिन्दू, मुसलमान और ईसाई में विभक्त किया गया है । आश्चर्य की बात यह है कि जिन वनवासियों को ईसाई बनाया गया है, उन्हें अभी भी छोटानागपुर काशतकारी कानून का लाभ व बचाव प्राप्त है । परंतु यदि ये वनवासी हिन्दू बनते हैं, तो वे इस लाभ से वंचित हो जाते हैं । इसी प्रकार सरकारी नौकरी में मिलने वाले आरक्षण, पिछड़े समाज के लिए उपलब्ध कराई गई शैक्षणिक सुविधाएँ जैसे छात्रवृत्ति आदि लाभों से भी ये वंचित हो जाते हैं । वास्तव में हिन्दू बनते ही उन्हें अनुसूचित जनजाति का अंग नहीं माना जाता । उदाहरण के लिए, कुर्मी समाज, जो हिन्दू धर्म से कहीं अधिक प्रभावित रहा है, उसे पिछड़ों के लिए संविधान प्रदत्त सभी लाभों से वंचित रखा गया    है । सबसे बड़ी विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि कुर्मी समाज को अन्य वनवासी समाजों के द्वारा झारखंड में बाहरियों और दिकुओं के साथ रखा गया है । जबकि सच यह है कि कुर्मी समाज उन वनवासी समाजों से पहले से ही झारखंड में है, जिन्होंने कुर्मियों को बाहरी बना दिया है ।

झा आगे बताते हैं कि झारखंड के प्रमुख वनवासी समाजों में आने वाले मुंडा समाज के विषय में कहा जाता है कि यह झारखंड में प्राचीनकाल से ही है । इस समाज का अधिकांश मध्यकाल में ही हिन्दू बन गया ।  मुंडाओं के विपरीत उराँव समाज के विषय में माना जाता है कि यह दक्षिण भारत से आया । इस समाज का अधिकांश औपनिवेशिक काल या ईसाइयों के राज में ईसाई बनाया गया । इसका विसंस्कृतिकरण अब भी जारी है । झा यह भी बताते हैं कि यदि चर्च की सर्वत्र उपस्थिति को एक संकेतक माना जाए, तो निस्संदेह झारखंड में ईसावाद सर्वाधिक प्रभावकारी दिखता है ।……………… क्रमशः अगले भाग में

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Dr. Mahender Thakur

The author is a Himachal Based Educator, columnist, and social activist. Twitter @Mahender_Chem Email mahenderchem44@gmail.com

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