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हमारी सब्सिडी पर पलने वाले जेएनयू के देशद्रोही पिस्सुओं का दिमाग ऐसे लग रहा है ठिकाने!

अब तक लचर रहे जेएनयू प्रशासन ने जबसे सख्त रुख अख्तियार किया है तो भारत की जनता की सब्सिडी पर पलने वाले जेएनयू के देशद्रोहियों के होश ठिकाने लगने लगे हैं। देश और विधि के खिलाफ यहां के कुछ घटनाक्रमों के तहत दोषी छात्रों के विरुद्ध जब प्रशासन ने दंडात्मक कदम उठाया है तो इनकी चीत्कार सामने आने लगी है। जिन दोषी छात्रों के ऊपर जुर्माना ठोका गया है उनमें से अधिकांश का कहना है कि यहां तो जितनी फीस नहीं है उससे कहीं अधिक जुर्माना लगा है। जबकि यही वो लोग हैं जो फीस और जुर्माना दोनों के खिलाफ खड़े होते रहे हैं। इनकी प्रवृत्ति न तो फीस देने की होती है न ही जुर्माना चुकाने का। इससे साफ है कि ये लोग सरकारी खैरात पर पलते हुए अराजक और निरंकुश समाज बनाना चाहते हैं। जहां न कोई नियम हो न कोई बंधन हो। इसलिए तो अब जब प्रशासनिक कोड़ा लगना शुरू हुआ है तो चीत्कार तो ऐसे ही निकलेगी।

दिल्ली के दक्षिण इलाके में पसरी जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी का परिसर बाहर से जितना शांत दिखता है उसके भीतर उतना ही कोलाहल है।आधुनिकता के नाम पर रात को भले ही जागृति का पर्याय बना दिया गया हो लेकिन वह निशाचर की ही प्रतीक है। शायद यही कारण रहा है कि जेएनयू शुरू से ही अराजकता और स्वच्छंदता का पर्याय बना हुआ है। वहां रहने वाले राक्षसी प्रवृत्ति के तहत न तो नैतिक न ही विधिक बंधन को मानने हैं। अभी तक की सरकारें भी यहां के अराजकतावादियों के आगे नतमस्तक होती रही है। लेकिन अब जब प्रशासन ने सख्त रूख अख्तियार किया है तो उनकी आसूरी प्रवृत्ति जगने लगी है। इसलिए यहां न तो जुर्माने को सुधार के रूप में लिया जाता है न ही दंडित होने पर दोषियों को शर्म ही आती है। बेशर्मी से खैरात पर पलन की आदत जो बन गई है।

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जेएनयू परिसर के जिन चिन्हित जगहों को खुली बहस का अड्डा बताया जाता रहा है वह जगह शुरू से ही बेशर्मी और बेहयायी के लिए जाना जाता है। तभी जेएनयू के आसपास रहने वाले हमकक्ष छात्रों के मुंह से आप अक्सर सुनेंगे कि चलों वहां थोड़ा मजा मार आते हैं। किसी के मुंह से शायद ही सुनेंगे कि चलो वहां उम्दा किस्म की चर्चा होती है उससे सुनने चलते हैं। ये लोग वही होते हैं जिन्हें या तो जेएनयू में दाखिला नहीं मिल पाया होता है या वे जेएनयू से बाहर आ गए होते हैं या फिर जेएनयू में दाखिला लेने के प्रयास में होते हैं। यानी सभी पढ़े लिखे लोग होते हैं। अंदर का माहौल भी निर्मल हो ऐसा नहीं है, हां स्वच्छंदता जरूर दिख जाएगी। कहने का मतलब जो यूनिवर्सिटी परिसर मजा मारने का अड्डा समझा जाता हो उससे आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं?

जहां तक परिसर के अंदर विरोध प्रदर्शन की बात है तो यह जरूर कहा जा सकता है कि एक समय था जब वहां वाकई में विरोध प्रदर्शन का एक स्तर हुआ करता था, लेकिन समय के साथ वहां का विरोध प्रदर्शन अब परपीड़क होने लगा है। प्रदर्शन और विरोध इतना उग्र होने लगा है कि वहां के छात्रों को देश तोड़ने के नारे लगाने तक में शर्म नहीं आती। आतंकवादियों की फांसी पर विरोध प्रदर्शन होता है। सामाजिक मुद्दे पर अब प्रदर्शन नहीं होते। अब तो यहां पर देश की छवि बदनाम करने वाले अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर देश के खिलाफ प्रदर्शन होता है। यहां का प्रदर्शन अब सुधारात्मक नहीं बल्कि बदनाम करने वाला हो गया है।

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वैचारिक घटियापन भी सामने आने लगा है। देश को एक रखने और करने की बजाए विध्वंसात्मक प्रवृत्ति तो वैसे भी शुरू से रही है। लेकिन अब तो समाज को खंडित करने और देश को गृहयुद्ध की ओर धकेलने की प्रवृत्ति बढ़ी है। शहरी माओवादियों को गौर से देखें तो संख्यात्मक अनुपात में इसी विश्वविद्यालय के छात्र अधिक मिलते हैं। यो लोग इस विश्वविद्यालय और उसके परिसर को सभी कानूनों से मुक्त चाहते हैं। वे चाहते हैं कि यहां कोई कानून न हो और हर चीज मुफ्त में मिलता रहे। लेकिन यहां रहले वाले देशद्रोही पिस्सू नहीं जानते कि देश का निजाम बदल चुका है। अब केंद्र में इनके वैचारिक भयाक्रांत वाली कोई कांग्रेस सरकार नहीं बल्कि मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवादी सरकार बैठी है जिसका संबल ही नैतिकता और नीति रही है, जो
अनीति को प्रश्रय नहीं दे सकती है वह चाहे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी ही क्यों न हो?

इसलिए अपराध को अंजाम देने के लिए दोषी ठहराए गए छात्रों को जुर्माना तो चुकाना ही पड़ेगा अब चाहे वे जितने भी आंसू बहा लें। कई छात्रों ने स्वयं स्वीकार की है कि उन्होंने 60-60 हजार रुपये तक जुर्माना चुकाए हैं। ऐसे छात्रों को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए जो बार-बार जुर्माना भरने के बाद भी अपराध को अंजाम देने से परहेज नहीं आते उसे तत्काल यूनिवर्सिटी से बाहर का रास्ता दिखाकर जेल भेजना चाहिए। क्योंकि इस प्रवृत्ति के लोग न तो यूनिवर्सिटी के लिए उपयुक्त हो सकता है न ही समाज के लिए। उसके लिए एक ही ठिकाना उचित रहेगा वह है जेल।

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आप खुद सोचिए। बार-बार जुर्माना भरने के बाद भी इसी प्रकार के अपराध दोहराने की प्रवृत्ति क्या दर्शाती है? इन लोगों की मानसिकता यही बन गई है कि देश के कानून को नहीं मानना है, देश के संविधान को नहीं मानना है, किसी प्रकार की नैतिकता को नहीं मानना है। इनलोगों की प्रवृत्ति देश की हर व्यवस्था को अराजकता के हवाले कर दिया जाए, जहां न कोई बंदिश हो न ही कोई बाध्यता और न ही कोई जिम्मेदारी। तभी तो यहां से निकलने वाले न जिम्मेदार होते हैं न जवाबदेह होते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि ये विश्वसनीय भी नहीं होते हैं।

URL: JNU administration takes action against students who violate rules

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