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कमाल राशिद खान को बचकाने रिव्यू करना अब छोड़ देना चाहिए

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विपुल रेगे। किसी फिल्म के प्रोमो को लेकर फिल्म समीक्षक अपनी संभावनाएं प्रकट कर सकता है। वह तर्कों के आधार पर बता सकता है कि अमुक फिल्म सफल होगी या नहीं। एक अच्छे फिल्म समीक्षक के पास एक अंतर्दृष्टि होती है, जिससे वह फिल्म के भविष्य की संभावनाओं के बारे में बोल सकता है। इन दिनों फिल्मों के प्रोमो की समीक्षाएं भी होने लगी हैं। कमाल राशिद खान सबसे अधिक प्रोमो की समीक्षाएं करते हैं। राधे विवाद के बाद केआरके ने ‘भुज : द प्राइड ऑफ़ इंडिया’ के प्रोमो की समीक्षा कर उसे हल्की फिल्म बता दिया है।

प्रोमो किसी भी फिल्म का लिफाफा होता है। उस लिफाफे को आप हर बार सही पहचान जाए, आवश्यक नहीं है। कई बार समीक्षकों की समीक्षाएं सटीक नहीं बैठती। केआरके ने प्रोमो रिव्यू करते हुए बताया है कि ये एक मसाला फिल्म है। सिर्फ देशभक्ति पर आधारित नहीं है। उनका ये भी कहना है कि फिल्म में दिखाए दृश्य तर्कों के आधार पर सटीक नहीं दिखाई देते।

प्रोमो दर्शकों को आकर्षित करने के लिए बनाए जाते हैं। प्रोमो कई दृश्यों को जोड़कर बनाया जाता है इसलिए उसमे सीक्वेंस खोजना तो निरि अज्ञानता है। कमाल खान भूल गए कि वे पूरी फिल्म नहीं, बल्कि एक प्रोमो देख रहे हैं। वे अपने रिव्यू में देशभक्ति के फार्मूले की बात करते हुए इशारा करते हैं कि अब तो भारत में यही चलने वाला है। ऐसा कहके वह वर्तमान केंद्र सरकार की ओर संकेत देते हैं।

केआरके कहते हैं कि बॉलीवुड में हिट होना है तो पाकिस्तान को गाली देना आवश्यक है। भारतीय फिल्मों की कहानियों में अनेक विषय सम्मिलित किये जाते हैं। उनमे पाकिस्तान भी एक विषय है। नेपाल भी हमारा पड़ोसी राष्ट्र है लेकिन वह हमारी फिल्मों का विषय क्यों नहीं बनता, इस पर कमाल खान को सोचना चाहिए। केआरके कहते हैं कि सलमान-आमिर-शाहरुख़ इसलिए खत्म हो जाएंगे क्योंकि वे पाकिस्तान को गाली नहीं देना चाहते।

भुज फिल्म के प्रोमो पर की गई समीक्षा में वे बातचीत का रुख किस ओर मोड़ते हैं, इससे उनकी मंशा समझी जा सकती है। उनकी समीक्षा के बहुत कम बिंदु थे, जो स्वीकार किये जा सकते हैं। अधिकांश तो उन्होंने अपनी भड़ास ही निकाली। केआरके के पूर्वानुमान कभी-कभी सत्य निकल जाते हैं लेकिन हमेशा सत्य हो जरुरी तो नहीं है।

सलमान, आमिर और शाहरुख़ इस कारण से समाप्त नहीं हो रहे कि वे पकिस्तान को गाली नहीं देते, अपितु इस कारण से समाप्त हो रहे हैं कि वे देश को लेकर दोयम विचार रखते हैं। वे हिन्दू धर्म को लेकर उदार नहीं दिखाई देते। बाकी उनकी आयु भी ढल चुकी है। एक हीरो के रुप में वे स्वीकारे ही नहीं जा रहे हैं।

भुज : द प्राइड ऑफ़ इंडिया को लेकर दर्शक वर्ग की प्रतिक्रिया ये है कि वे फिल्म में हिट होने की पूर्ण संभावना देख रहे हैं। अंततोगत्वा दर्शक के अंदर भी एक फिल्म समीक्षक छुपा बैठा होता है। संभव है फिल्म आशाओं पर खरी न उतरे, संभव है फिल्म आय के नए कीर्तिमान बना दे। हम दशकों से ऐसी ही देशभक्ति की फ़िल्में देखते आए हैं, जो मसालेदार होती हैं। मनोज कुमार की ‘क्रांति’ से लेकर देवगन की ‘भुज:द प्राइड ऑफ़ इंडिया’ तक मसाला फार्मूला ही अपनाया जाता रहा है कमाल राशिद ख़ान जी।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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