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India Speak Daily > Blog > धर्म > सनातन हिंदू धर्म > महाभारत के वनपर्व में ऋषि मार्कण्डेयजी और राजा युधिष्ठिर का कर्मविषयक संवाद
सनातन हिंदू धर्म

महाभारत के वनपर्व में ऋषि मार्कण्डेयजी और राजा युधिष्ठिर का कर्मविषयक संवाद

ISD News Network
Last updated: 2025/02/19 at 11:50 AM
By ISD News Network 162 Views 8 Min Read
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श्वेता पुरोहित। युधिष्ठिर ने कहा – ब्रह्मन् ! जब मैं अपने को सुख से वञ्चित पाता हूँ और दुराचारी धृतराष्ट्र पुत्रों को सब प्रकार से समृद्धिशाली होते देखता हूँ, तब स्वभावतः ही मेरे मन में एक विचार उठता है ।

‘मैं सोचता हूँ, शुभ और अशुभ कर्म करने वाला जो पुरुष है, वह अपने उन कर्मों का फल कैसे भोगता है तथा ईश्वर उन कर्मफलों का रचयिता कैसे होता है? ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ मुनीश्वर ! सुख और दुःख की प्राप्ति कराने वाले कर्मों में मनुष्यों की प्रवृत्ति कैसे होती है? मनुष्य का किया कर्म इस लोक में ही उसका अनुसरण करता है अथवा पारलौकिक शरीर में भी । ‘द्विजश्रेष्ठ ! देहधारी जीव अपने शरीर का त्याग करके जब परलोक में चला जाता है, तब उसके शुभ और अशुभ कर्म उसको कैसे प्राप्त करते हैं और इहलोक और परलोक में जीव का उन कर्मों के फल से किस प्रकार संयोग होता है ? कर्मों का फल इसी लोकमें प्राप्त होता है या परलोक में? प्राणी की मृत्यु हो जाने पर उसके कर्म कहाँ रहते हैं?’

मार्कण्डेय जी बोले – वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर ! तुम्हारा यह प्रश्न यथार्थ और युक्तिसंगत है। तुम्हें जानने योग्य सभी बातों का ज्ञान है, तो भी तुम केवल लोक-मर्यादा की रक्षा के लिये यह प्रश्न उपस्थित करते हो।

कुन्तीनन्दन ! इस संसार में मृत्यु के पश्चात् जीव की गति उनके अपने-अपने कर्मों के अनुसार ही होती है। परंतु मरने के बाद ज्ञानी और अज्ञानी की कर्मराशि कहाँ रहती है? कहाँ रहकर वह पुण्य अथवा पापका फल भोगता है ? इस दृष्टिसे जो तुमने प्रश्न किया है, उसके उत्तर में मैं सिद्धान्त बता रहा हूँ, सुनो ।

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यह मनुष्य ईश्वर के रचे हुए पूर्व शरीर के द्वारा (अन्तःकरण में) शुभ और अशुभ कर्मों की बहुत बड़ी राशि संचित कर लेता है। फिर आयु पूरी होनेपर वह इस जरा-जर्जर स्थूल शरीर का त्याग करके उसी क्षण किसी दूसरी योनि (शरीर) में प्रकट होता है। एक शरीर को छोड़ने और दूसरे को ग्रहण करने के बीच में क्षणभर के लिये भी वह असंसारी नहीं होता । वहाँ दूसरे स्थूल शरीर में उसके पूर्वजन्म का किया हुआ कर्म छाया की भाँति सदा उसके पीछे लगा रहता और यथासमय अपना फल देता है। इसलिये जीव सुख अथवा दुःख भोगने के योग्य होकर जन्म लेता है। यमराज के विधान (पुण्य और पापके फल-भोग) में नियुक्त हुआ जीव अपने शुभ अथवा अशुभ लक्षणों द्वारा अपने को मिले हुए सुख अथवा दुःख का निवारण करने में असमर्थ है। यह बात ज्ञान-दृष्टिवाले महात्मा पुरुषों द्वारा देखी जाती है ।

युधिष्ठिर ! यह तत्त्वज्ञानशून्य मूढ़ मनुष्यों की स्वर्ग-नरकरूप गति बतायी गयी है। अब इसके बाद विवेकी पुरुषों को प्राप्त होने वाली उत्तम गति का वर्णन सुनो । ज्ञानी मनुष्य तपस्वी, सम्पूर्ण शास्त्रों के स्वाध्याय में तत्पर, स्थिरता पूर्वक व्रत का पालन करनेवाले, सत्यपरायण, गुरुसेवा में संलग्न, सुशील, शुक्लजातीय (सात्त्विक), क्षमाशील, जितेन्द्रिय और अत्यन्त तेजस्वी होते हैं। वे शुद्ध योनि में जन्म लेते और प्रायः शुभ लक्षणों से सुशोभित होते हैं। जितेन्द्रिय होने के कारण वे मन को वश में रखते हैं और सात्त्विक अन्तःकरण के होने के कारण नीरोग होते हैं। दुःख और त्रास के क्षीण होने के कारण वे उपद्रवरहित होते हैं। विवेकी पुरुष गर्भ से गिरते, जन्म लेते अथवा गर्भ में ही रहते समय भी ज्ञानदृष्टि से अपने-आपका और परमात्मा का सर्वथा यथार्थ अनुभव करते हैं । लौकिक तथा शास्त्रीय ज्ञान को प्रत्यक्ष करनेवाले वे महामना ऋषि इस कर्मभूमि में आकर फिर देवलोक में चले जाते हैं । राजन् ! विवेकी मनुष्य कर्मों का कुछ फल प्रारब्धवश प्राप्त करते हैं, कुछ कर्मों का फल हठात् प्राप्त होता है और कुछ कर्मों का फल अपने उद्योग से ही प्राप्त होता है। इस विषय में तुम्हें कोई अन्यथा विचार नही करना चाहिये ।

मनुष्यलोक में मैं जिसे परम कल्याण की बात समझता हूँ, उसके विषय में यह उदाहरण सुनो। कोई मनुष्य इस लोकमें ही परम सुख पाता है, परलोक में नहीं। किसी को परलोक में ही परम कल्याण की प्राप्ति होती है. इस लोक में नहीं। किसी को इहलोक और परलोक दोनोंमें परम श्रेय की प्राप्ति होती है: तथा किसीको न तो परलोक में उत्तम सुख मिलता है और न इस लोक में ही ।

जिनके पास बहुत धन होता है, वे अपने शरीर को हर तरह से सजाकर नित्य विषयों में रमण करते अर्थात् विषय-सुख भोगते हैं। सदा अपने शरीर के ही सुख में आसक्त हुए उन मनुष्यों को केवल इसी लोक में सुख मिलता है, परलोक में उनके लिये सुख का सर्वथा अभाव है । जो लोग इस लोक में योगसाधन करते हैं, तपस्या में संलग्न होते हैं और स्वाध्याय में तत्पर रहते हैं तथा इस प्रकार प्राणियों की हिंसा से दूर रहकर इन्द्रियों को संयम में रखते हुए (तपस्याद्वारा) अपने शरीर को दुर्बल कर देते हैं, उनके लिये इस लोक में सुख नहीं है। वे परलोक में ही परम कल्याण के भागी होते हैं । जो लोग कर्तव्य-बुद्धि से पहले धर्म का ही आचरण करते हैं और उस धर्म से ही (न्याययुक्त) धनका उपार्जन कर यथासमय स्त्री से विवाह करके उसके साथ यज्ञ-याग और ईश्वर भक्ति आदि का अनुष्ठान करते हैं, उनके लिये इहलोक और परलोक दोनों ही सुखद हैं।

जो मूढ़ न विद्याके लिये, न तपके लिये और न दानके लिये ही प्रयत्न करते हैं एवं न धर्मपूर्वक संतानोत्पादन के लिये ही यत्नशील होते हैं, वे न तो सुख पाते हैं और न भोग ही भोगते हैं। उनके लिये न तो इस लोक में सुख है और न परलोक में ।

राजा युधिष्ठिर ! तुम सब लोग बड़े पराक्रमी और धैर्यवान् हो। तुममें अलौकिक ओज भरा है। तुम सुदृढ़ शरीर से सम्पन्न हो और देवताओं का कार्य सिद्ध करनेके लिये परलोक से इस पृथिवी पर अवतीर्ण हुए हो। यही कारण है कि तुमने सभी उत्तम विद्याएँ सीख ली हैं । तुम सभी शूर-वीर तथा तपस्या, इन्द्रियसंयम और उत्तम आचार-व्यवहार में सदा ही तत्पर रहने वाले हो। अतः (इस संसार में बड़े-बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य करके) देवताओं, ऋषियों और समस्त पितरोंको उत्तम विधि से तृप्त करोगे। तत्पश्चात् अपने सत्कर्मों के फलस्वरूप तुम सब लोग क्रमसे पुण्यात्माओं के निवास स्थान परम स्वर्गलोक को चले जाओगे। इसीलिये कौरवराज ! तुम (अपने वर्तमान कष्टको देखकर) मन में किसी प्रकार की शंका को स्थान न दो। यह क्लेश तो तुम्हारे भावी सुखका ही सूचक है

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