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फिल्म समीक्षा: संजीदा वायलन पर दर्द भरी धुन का ऐहसास कराता Super 30

‘आनंद के शहर की लाइब्रेरी में विदेशी जर्नल्स नहीं आते इसलिए वह दूसरे शहर के कॉलेज की लाइब्रेरी में जाकर जर्नल पढ़ता है। लाइब्रेरियन उसे पकड़ लेता है और धक्के देकर बाहर निकाल देता है। वह कहता है कि तुम लोगों की औकात नहीं है ये जर्नल पढ़ने की। बाहर चपरासी आनंद को कहता है कि ये जर्नल उसके घर आ सकता है, यदि वह अपना आर्टिकल इसमें छपवा सके। आनंद आर्टिकल लिखता है और पोस्ट करने के लिए डाकघर जाता है। डाकघर में उसके पोस्टमैन पिता को अपने सहकर्मियों से चंदा करना पड़ता है क्योंकि इंग्लैंड भेजने के लिए लिफ़ाफ़े पर जो टिकट लगेंगे, वे 200 रूपये के आएँगे और आनंद के पास चिल्लर मिलाकर कुल 55 रूपये ही हैं। कुछ दिन बाद आनंद उसी लाइब्रेरी में पहुँचता है और लाइब्रेरियन को जर्नल में ऊँगली से इशारा करके कहता है ‘उस दिन आप मेरा नाम पूछ रहे थे ना, पढ़ लीजिये ‘आनंद कुमार’।

विकास बहल निर्देशित ‘सुपर 30’ भारत के ख्यात शिक्षाविद और गणितज्ञ आनंद कुमार का बॉयोपिक है। आनंद कुमार के अर्श से फर्श पर पहुँचने की दंतकथाएं भारत के कॉलेजों के कैंटीन में सुनाई जाती रही है। नई सदी के दूसरे साल में आनंद कुमार नाम का करिश्मा बिहार से उठा और सारे देश में उसकी चर्चा होने लगी थी। आईआईटी एजुकेशन में सिरमौर आनंद कुमार पर बनी ये फिल्म देखने के बाद स्कूल-कॉलेज के स्टूडेंट्स और उनके अभिभावक जान सकेंगे कि शिक्षा पाने की ललक के साथ जूनून शामिल हो जाए तो कितने ही शिखर पाए जा सकते हैं। सुपर 30 दरअसल एक ‘क्लोजअप’ है जिसके जरिये हम आनंद कुमार की जिजीविषा और भारतीय शिक्षा व्यवस्था के खोखलेपन को महसूस कर सकते हैं। इस फिल्म में इतनी ग्रिप है कि शुरूआती सीन के साथ ही आप विकास और ऋत्विक के सम्मोहन में इस कदर जकड़ जाते हैं कि घर तक अपने साथ ‘सुपर 30’ को ले आते हैं।

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भारत का सिस्टम अच्छे-अच्छे सूरमाओं को बिखेर कर रख देता है। इस सिस्टम के सामने जो ताल ठोंककर खड़े हो जाते हैं, वे एम एस धोनी और आनंद कुमार बनते हैं। वे एकाएक दुनिया के सामने सितारे की तरह प्रकट होते हैं, बस छुप जाता है तो उनका संघर्ष। सुपर 30 आनंद कुमार की मुफ़लिसी को ऐसे पेश करती है, जैसे कोई साजिंदा वायलिन पर दर्द भरी धुन छेड़ रहा हो। कुछ दृश्य ऐसे हैं कि दर्शक की रुलाई फूट पड़ती है। दरअसल ये फिल्म सीधी दिल में जाकर लगती है। एक दृश्य में आनंद बरसती रात में अपने पिता ईश्वर को साइकिल पर लेकर दौड़ा जा रहा है। अचानक साइकिल की चेन टूट जाती है और साथ ही ईश्वर की सांसों की लड़ी भी टूट जाती है। एक दृश्य में किसी विदेशी मंच पर खड़ा ‘फुग्गा’ बता रहा है कि उसके पिता मेले में गुब्बारे बेचते थे। आनंद कुमार की बदौलत वह इस मंच पर आ सका है। ऐसे ही प्रभावी दृश्यों से सराबोर है ये फिल्म। एक पल में गुदगुदाती है, अगले पल रुलाती है।

ऋत्विक रोशन आज भी असीम संभावनाओं से भरे हुए हैं। वे बॉर्न एक्टर हैं। सुपर 30 में वे अपनी ‘मेथॅड एक्टिंग’ को नई ऊंचाइयों पर ले गए हैं। आनंद कुमार को उन्होंने भीतर ही भीतर जिया है। एक ‘ग्रीक गॉड’ के लिए खांटी बिहारी का किरदार निभाना निश्चित ही चुनौतीपूर्ण रहा होगा। इसके लिए परदे पर उनकी त्वचा को भूरा किया गया। हालांकि उनके प्रशंसकों ने एक अच्छी फिल्म की खातिर इस बदलाव को ख़ुशी से स्वीकारा है। फिल्म के अंत में आनंद को पता चलता है कि उसके तीस विद्यार्थी आईआईटी के लिए चुन लिए गए हैं। इस दृश्य में ऋत्विक कुछ नहीं कहते और सब बयां हो जाता है। इस दृश्य में वे अदाकारी के उच्च स्तर पर होते हैं।

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 विजेंद्र सक्सेना ने फिल्म में आनंद के पिता का किरदार निभाया है। अपने छोटे से रोल में वे दर्शकों की सराहना पाने में कामयाब रहे हैं। आनंद की प्रेमिका बनी मृणाल ठाकुर खूबसूरत हैं और प्रतिभाशाली भी। हमेशा की तरह पंकज त्रिपाठी ने अपना बेस्ट दिया है। पत्रकार की भूमिका में अमित साध ने भी बेहतर अभिनय दिखाया है। निःसंदेह विकास बहल ने अपने कॅरियर की सबसे खूबसूरत फिल्म बनाई है। इससे पहले उनके खाते में ‘क़्वीन’ जैसी बेहतरीन फिल्म दर्ज है। संजीव दत्ता ने बहुत ही स्मूथ स्क्रीनप्ले लिखा है। फिल्म में एक कमी ये खटकती है कि महाभारत का उदाहरण देकर ऊंच-नीच की बात की गई है।अजय-अतुल का संगीत और बैकग्राउंड प्रभावशाली है। उन्होंने कहानी की थीम को समझकर बैकग्राउंड क्रिएट किया है।

वे बच्चें जिनको पढ़ने से प्यार है, ये फिल्म उनके लिए ही बनाई गई है। पढ़ने की ललक क्या होती है, कठिनाइयों से जूझते हुए शिखर कैसे पाया जाता है। ये विकास बहल बखूबी बताते हैं। बॉक्स ऑफिस पर इसका भविष्य अच्छा है। फिल्म अपने कंटेंट के दम पर परचम लहराएगी। ऋत्विक का डेडली परफॉर्मेंस इसे अतिरिक्त बूस्ट देगा। यदि इस वीकेंड आप एक मुकम्मल फिल्म देखना चाहते हैं तो सुपर 30 से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। फिल्म में एक संवाद बार-बार दोहराया गया है ‘अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, राजा वही बनेगा जो हकदार होगा।’ यही डायलॉग फिल्म की सेंट्रल थीम है। इसी संवाद में फिल्म की कहानी छुपी है।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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1 Comment

  1. Avatar Rohit says:

    बहुत अच्छा रिव्यू दिया है आपने, मैं बच्चों के साथ फिल्म जरूर देखूंगा

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