भगवान कृष्ण ने शरद पूर्णिमा की आधी रात को वृंदावन में 16000 गोपिकाओं के साथ किया था रास!

हेमंत शर्मा। इस महारास की खासियत थी कि हर गोपिका को कृष्ण के साथ नाचने का आभास था, उनका आनंद अटूट था। ‘निसदिन बरसत नैन हमारे. सदा रहत पावस ऋतु हम पर जब ते स्याम सिधारे।’

कृष्ण के साथ अपना रिश्ता जितना आत्मीय है, किसी और देवता के साथ नहीं. बचपन से एक तादात्म्य है. सखा भाव है. राज-रंग, छल-कपट, भक्ति, योग, भोग, राजनीति, चोरी, मक्कारी, झूठ, फरेब जिस ओर नजर डालें, गोपाल खड़े मिलते हैं. वे हमारे नजदीक दिखते हैं. कृष्ण का यही अनूठापन उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाता है. सच पूछिए तो कृष्ण ही हैं जो हर उम्र में हमउम्र लगते हैं. शायद इसीलिए आज भी जन्माष्टमी पर दिल बच्चा हो जाता है. इस उत्सव को मनाने में वैसा ही जोश हममें रहता है जैसा 40 बरस पहले था. आखिर क्यों? दस बरस की उम्र में तो धर्म के प्रति वैसी आस्था भी नहीं बनती. तो आखिर क्या है इस कृष्ण में जो हमेशा संगी-साथी सा दिखता है।

कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के. उनका देवत्व धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं है. वह जिंदगी से उदास, निराश और भागा हुआ नहीं है. कृष्ण हर परिस्थिति में अकेले नाचते दिखते हैं. हंसते-गाते मिलते हैं. अतीत के सभी दुखवादी धर्म की नींव पर. डॉ. लोहिया की मानें तो कृष्ण उन्मुक्त समाज के प्रथम पुरुष थे. यही उन्मुक्तता उन्हें देवत्व से कभी-कभी दूर ले जाती है. वे कायदे तोड़ते थे. ठीक उसी तरह जैसे आज का सत्ता प्रतिष्ठान बुद्धि के जरिए नियम तोड़ता है. इसलिए आज भी कृष्ण की निरंतरता है।

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साइकिल और कार का यह अंतर कृष्ण का जन्मदिन मनाने के उत्साह को कहीं कम नहीं करता

सूर के कृष्ण गोवर्धन गिरिधारी, कुशल रणनीतिकार थे. द्वारिका नरेश कम, नटखट माखनचोर ज्यादा हैं. इसीलिए हम बचपन में कभी रामनवमी या शिवरात्रि में उतने उत्साह से नहीं भरे, जितने जन्माष्टमी में. सात रोज पहले से तैयारियां शुरू हो जाती थीं. लकड़ी के बुरादे का रंग-रोगन होता था. घर से दस किलोमीटर दूर साइकिल से बिजलीघर जाकर खंगर (जला कोयला) लाते थे. गोवर्धन पर्वत की झांकी के लिए. पूरे साल अपने जेबखर्च से पैसा बचा-बचाकर खिलौने खरीदना. हर बार एक नएपन के साथ. मेरी पत्नी बताती हैं कि ऐसी ही तैयारियां उनके यहां भी होती थीं. फर्क इतना था कि वे कार से जाती थीं, मैं साइकिल से. वे सजावट के सामान खरीदकर लाती थीं और मैं जुगाड़ से. पर साइकिल और कार का यह अंतर कृष्ण का जन्मदिन मनाने के उत्साह को कहीं कम नहीं करता था।

यह आकर्षण मात्र इसलिए नहीं है कि देवताओं की शृंखला में इकलौते कृष्ण हैं, जो सामान्य आदमी के करीब हैं, बल्कि इसलिए है कि कृष्ण के जन्म के साथ ही उनके मारे जाने की धमकी है. यह धमकी उनके देवत्व को चुनौती देती है. जन्म के बाद प्रतिपल उनकी मृत्यु संभावी है. किसी भी क्षण मृत्यु आ सकती है, इसी आशंका में उनका बचपन बीतता है. कृष्ण ऐसी जिंदगी है, जिसके दरवाजे पर मौत कई बार आती है और हारकर लौटती है. जैसे आज के असुरक्षित समाज में पैदा होते ही मृत्यु से लड़ना आम आदमी की नियति है. इसलिए कृष्ण हमें अपने पास के लगते हैं।

वे कृष्ण ही थे, जिन्होंने मां का मक्खन चुराने से लेकर दूसरे की बीवी हरने तक का काम किया. महाभारत में एक ऐसे आदमी से झूठ बुलवाया, जिसने कभी झूठ नहीं बोला. उनके अपने झूठ अनेक हैं. सूर्य को छिपाकर नकली सूर्यास्त करा दिया, ताकि शत्रु मारा जा सके. भीष्म के सामने नपुंसक शिखंडी खड़ा कर दिया, ताकि बाण न चले. खुद सुरक्षित आड़ में रहे. उन्होंने मित्र की मदद स्वयं अपनी बहन को भगाने में की. यानी कृष्ण एक पाप के बाद दूसरा पाप बेहिचक करते हैं. उनके कायदे-कानून जड़ नहीं हैं. वह धर्म की रक्षा के लिए परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं।

सदियों के अंतराल के बाद भी उनका बांकपन, उनका अनूठा व्यक्तित्व हमें आकर्षित करता है. आज के संदर्भ में कृष्ण को समझना जरूरी है. मनुष्य की बनाई यह सभ्यता कृष्ण की समझ से सहज हो सकेगी, दुखदायी नहीं रहेगी, निषेधवादी नहीं रहेगी. हमें समझ पड़ेगा कि जीवन आनंद है, उत्सव है, उसके विरोध में कोई परमात्मा नहीं बैठा है. धर्म की कट्टरता उस फोल्डिंग कुरसी की तरह समझ में आने लगेगी, जिसकी जरूरत पड़ी तो फैलाकर बैठ गए, नहीं तो मोड़कर कोने में टिका दिया।

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जीवन जीने में आनेवाली तमाम चुनौतियों के जवाब उनके पास वर्तमान सामाजिक संदर्भों में हैं

कृष्ण ही नहीं, उनकी बोली-वाणी गीता, युद्धक्षेत्र में लिखी गई पहली पुस्तक है, जिसका मुकाबला दुनिया की कोई किताब नहीं करती. धर्म के दायरे से बाहर भी. कृष्ण सिर्फ रणकौशल के ही जानकार नहीं थे. वे रणनीतिकार और सत्ता प्रतिष्ठान की बारीकियां भी बखूबी समझते थे. वे रसिक भी थे. आनंदमार्गी भी. प्रेम के संयोग और वियोग दोनों ही अवस्थाओं से सीधे जुड़े थे. कृष्ण रम जाने का सारा कौशल जानते थे. एकाकार होना उन्हीं ने सिखाया. ‘नंदग्राम की भीड़ में गुमे नंद के लाल. सारी माया एक है, क्या मोहन क्या ग्वाल।’

शरद पूर्णिमा की आधी रात को कृष्ण ने वृंदावन में सोलह हजार गोपिकाओं के साथ रास किया था. इस महारास की खासियत थी कि हर गोपिका को कृष्ण के साथ नाचने का आभास था. उनका आनंद अटूट था. ‘निसदिन बरसत नैन हमारे. सदा रहत पावस ऋतु हम पर जब ते स्याम सिधारे.’ वाली हालत से कौन नहीं गुजरा होगा अपनी किशोरावस्था में।

कृष्ण के मायने ही हैं, जिसे संसारी चीजें खींचती हों. यानी चुंबकीय व्यक्तित्व, आकर्षण का केंद्र. कृष्ण भक्त तो हैं ही और भगवान् भी, इसलिए उनसे रिश्ता सीधा और सहज जुड़ता है. जीवन जीने में आनेवाली तमाम चुनौतियों के जवाब उनके पास वर्तमान सामाजिक संदर्भों में हैं. शासन तंत्र की समस्याएं, सत्ता के षड्यंत्र, रिश्तों की नाजुकता आज भी वैसी ही है, जो कृष्ण-काल में थी।

साभार: खबर का मूल लिंक।

URL: Krishna had made ras (dancing drama) on sharad purnima!

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