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सलमान की फिल्म में लाल बिहारी को किसान से ‘बैंड बाजे वाला’ बना दिया गया

आज़मगढ़ जिले के ख़लीलाबाद गांव के निवासी ‘लाल बिहारी’ एक बार फिर चर्चा में हैं। लाल बिहारी इस दफे सलमान खान फिल्म्स के कारण चर्चा में हैं। लाल बिहारी वहीं चर्चित व्यक्ति हैं, जिनको सन 1976 से लेकर 1994 तक ‘मृत’ मान लिया गया था। लाल बिहारी हाड़-मांस से तो जीवित थे, लेकिन कागज़ों में उन्हें मार दिया गया था। लाल बिहारी को जब मारा गया, तब माननीय इंदिरा गाँधी देश की प्रधानमंत्री हुआ करती थी।

उनके बाद राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री बने। उनके प्रधानमंत्री काल में भी ‘लाल बिहारी’ मरे ही रहे। सन 1986 में लाल बिहारी ने उत्तरप्रदेश विधानसभा में पर्चे फेंककर बताया कि वे जीवित हैं। हमारे भारतीय सिस्टम ने लाल बिहारी को झूठ मानते हुए उन कागज़ों को ही सत्य माना, जिनमे वे मर चुके थे। हताश लाल बिहारी को सन 1994 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के काल में न्याय मिला। ये भारत में ही संभव है कि अठारह साल तक कोई व्यक्ति ये बताने के लिए लड़ता रहे कि वह इस धरती पर जीवित है।

लाल बिहारी की पुनः चर्चा इसलिए हो रही है, क्योंकि उनकी कहानी पर निर्देशक सतीश कौशिक ने पंकज त्रिपाठी को लेकर फिल्म ‘कागज़’ का निर्माण किया है। लाल बिहारी को उनकी कहानी के लिए अच्छा-खासा भुगतान किया गया है। अब पता चला है कि लाल बिहारी सलमान खान फिल्म्स और सतीश कौशिक के खिलाफ धरने पर बैठ गए। लाल बिहारी ने आरोप लगाया है कि फिल्म में उनका नाम बदल दिया गया है।

आरोप ये भी है कि उनको किसान की जगह ‘बैंड बाजे वाला’ बना दिया गया है। उनको फिल्म में ‘अछूत’ भी पुकारा गया है। पहली नज़र में आपको लाल बिहारी की पीड़ा सच्ची पीड़ा लग सकती है। फिर मैं ऐसी घटनाओं का लंबा इतिहास देखता हूँ। जैसे ‘थ्री इडियट्स’ के समय मूल लेखक चेतन भगत ने फिल्म के निर्देशक पर कई आरोप लगा दिए थे। हर दूसरे माह कोई लेखक, कोई व्यक्ति कोर्ट में ऐसा ही दावा ठोंकता है।

नब्बे प्रतिशत ऐसे मामले फिल्म निर्माताओं द्वारा ही प्रायोजित होते हैं। जब ऐसे मामले कोर्ट से होकर मीडिया तक पहुँचते हैं तो बिना कुछ किये धरे फिल्म चर्चा में आ जाती है। भारत देश में किसी फिल्म के साथ विवाद जुड़ जाए, तो उसका निर्माता रात को पार्टी ज़रुर करता है। बॉलीवुड का रिकॉर्ड है कि वह सत्य घटनाओं पर बनी फिल्मों के किरदारों के नाम, यहाँ तक कि उनके धर्म तक बदल देता है।

‘सिनेमेटिक लिबर्टी’ के नाम पर वह ऐसा कर सकता है। लाल बिहारी तो छोटी बात है, बॉलीवुड तो हमारी सेना को नहीं छोड़ता। जब सतीश कौशिक ने फिल्म में किसान को बैंड बाजे वाला बना दिया है तो वे इसका ‘कालखंड’ भी बदल सकते हैं। वे इसके कथानक को आज के काल में प्रस्तुत कर सकते हैं। वे इंदिरा गांधी-राजीव गांधी काल को फिल्म से निकालकर अटल विहारी-नरेंद्र मोदी काल में सेट कर सकते हैं।

चूँकि फिल्म के निर्माता सलमान खान हैं, इसलिए ऐसा होना संभव है। और जब ऐसा होगा तो एक आम समझ वाला दर्शक समझेगा कि ये सच्ची कहानी अभी के काल में ही घटी है। सिनेमाई प्रभाव बहुत गहरा होता है। जैसा हम ‘पद्मावत’ में देख चुके हैं कि दर्शक ने एक असत्य कथा को सहज ही स्वीकार कर लिया।

यदि वह दर्शक इतिहास के बारे में जानता तो संजय लीला भंसाली से पूछता कि अलाउद्दीन खिलजी को उसके किले में नग्न अवस्था में दौड़ाने वाले ‘गोरा-बादल’ के पात्र फिल्म में क्यों नहीं डाले गए थे। लाल बिहारी ने अपने साथ हुए अन्याय की कहानी बाकायदा प्रेस वार्ता लेकर सुनाई है। हालाँकि उनकी इस कहानी को अधिक फुटेज नहीं मिलेगा।

‘मृतक लाल बिहारी’ की कथा के साथ उनकी आत्मा को भी सतीश कौशिक ने कैद कर लिया है। इस कैद से उनकी मुक्ति नहीं होनी है क्योंकि फिल्मों की आयु कई वर्षों की होती है। लाल बिहारी के साथ सूचना-प्रसारण न्याय कर सकता था, यदि उसके नाख़ून और दांत पैने होते। और हमारे मंत्रालय के तो ‘दांत’ ही नहीं हैं।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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