हेमंत शर्मा।
दीपावली आ गई। साफ़ सफ़ाई का दौर शुरू। पुराने सामानों की सफाई में मुझे एक चिट्ठी मिली। यह प्रेम पत्र था। उसका रंग गुलाबी से पीला पड़ गया था। पर खुशबू बनी हुई थी। इसे मैंने कोई 40 बरस पहले अपनी पत्नी को लिखा था। तब वे पत्नी भी नहीं बनी थीं। वे विश्वविद्यालयी दिन थे। लप झप चल रहा था। विवाह के बाद तो पत्र लिखने का न सामर्थ्य बचता है न शक्ति। भावना और संवेदना जरूर हिलोरे मारती है लेकिन उसमें वह आवेग नहीं होता। फिर गंगा राम सैम पित्रोदा की सूचना क्रान्ति हुई। हम एक झटके में एसएमएस और ईमेल के युग में पंहुच गए। और बेचारी चिट्ठी हमारे जीवन से चली गई। मुझे अब तो यह भी याद नहीं कि आखिरी चिट्ठी मैंने कब और किसको लिखी। लोग अब चिट्ठियां लिखना भी भूल गए हैं। सूचना क्रांति ने इस तरह एक ताकतवर और रोमांटिक विधा का वेवक्त अंत कर दिया। गंगाराम सैम पित्रोदा तमाम प्रेमियों के इकलौते अवलंब चिठ्ठी के दुश्मन बन गए। इश्क़ हक़ीक़ी के विलेन। फ़िल्मों में विलेन के पित्रोदा जी जैसी ही दाढ़ी भी होती थी।
चिठ्ठी से अपना गहरा नाता रहा है। जाती हुई चिट्ठी के हम अन्तिम उपभोक्ता थे। एमए में अपना दाख़िला जेएनयू में हुआ। पर तक़दीर खींच लाई बीएचयू। यहीं वीणा से मुलाक़ात हुई। बात तो आगे बढ़ गयी पर पढ़ाई पीछे छूट गयी। उसके बाद नियमित क्लास में बैठकर कभी नहीं पढ़ा। इश्क़ ने तो ग़ालिब को भी निकम्मा बना दिया था। मैं किस खेत की मूली। भला हो बड़ौदा के महाराज सयाजीराय गायकवाड़ का जो उन्होंने सेन्ट्रल लाईब्रेरी बनवा दी और हमारे छह बरस उसी में चाय समोसे पर गुज़र गए। अब हमारी पढ़ाई की जगहें होती थी सेन्ट्रल लाइब्रेरी, बीएचयू का विश्वनाथ मंदिर, लाइब्रेरी के ऊपर रामकेर की चाय की दुकान, सिन्धी और केरला कैफ़े या फिर ललिता, विजया, पद्मश्री, गुंजन जैसे सिनेमाहॉल। ये सब विश्वविघालय के आसपास ही थे। अब ये सारे सिनेमाघर इतिहास में समा गए हैं। सो कबीर के पदचिन्हों पर मेरी पढ़ाई जारी रही। कबीर के ढाई आखर को पढ़ मैं पंडित हो रहा था। एमए का पहला साल ऐसे ही बीता। दूसरे साल यह सिलसिला और गाढ़ा हुआ। एमए पहले दर्जे में पास हुआ। अब मास्टरी के अपने रास्ते भी खुल रहे थे। रिसर्च में रजिस्ट्रेशन हुआ। यूजीसी से जूनियर फ़ेलोशिप मिली। गुरू डॉ त्रिभुवन सिंह थे। इन्हीं के निर्देशन में रिसर्च चल रहा था। जीवन एक दम सीधा सहज चल रहा था। घर से लाइब्रेरी। फिर चाय नाश्ता। कभी कभी पूरे समय चाय की दुकान पर, और वहीं से घर वापस। गुरुदेव ने एकाध बार टोका, कभी कभी विभाग आया कीजिए। पूरे महीने की हाजिरी एक बार ही लगा देता क्योंकि फ़ेलोशिप के बिल पास कराने के लिए ऐसा करना ज़रूरी होता।
वीणा से अपना यह लप झप छह बरस तक चला। तक़दीर ने फिर पलटा खाया। पढ़ते वक्त ही मैं जनसत्ता का बनारस में स्ट्रीगर बन गया था। इसी दौरान स्ट्रिंगर को सीधे ब्यूरोचीफ बना दिया गया। मैं लखनऊ में रहने लगा था। अब वीणा से सम्पर्क का ज़रिया चिट्ठी ही थी। वह ज़माना एसएमएस और फ़ोन का था नहीं। हर हफ़्ते बनारस जाता। जाते ही अपना मक्का सेन्ट्रल लाइब्रेरी। दो साल तक मियाँ की दौड़ मस्जिद तक चली। फिर कभी न जा पाता तो चिट्ठी किसी मित्र को देता जो उन तक पहुँचाते थे। डाक से भेज नहीं सकता था, नहीं तो किसी और को मिल जाती। पुराने ज़माने में ऐसे संदेश कबूतर से भेजे जाते थे। सो हमारे एक मित्र हमारे कबूतर थे। यह संयोग ही है कि आज रामापुरा (वीणा का मुहल्ला) का डाकिया अपना ज्ञानप्रकाश पोस्ट मास्टर है। उस वक्त रहता तो कितना आसान होता। पप्पू पोस्टमास्टर सीधे हमारी चिट्ठी मंजिल तक पहुंचाता। पप्पू मुझे उम्र के उत्तरार्ध में मिला। तब तक वह पं. ज्ञानप्रकाश उर्फ पप्पू पोस्टमास्टर हो चुका था। पप्पू अपना मित्र हैं। डाक-तार का विशेषज्ञ. हाथ में लेते ही बता देता हैं कितना टिकट लगेगा। गाड़ी चलाने में वह माइकल शूमाकर का चाचा है। पप्पू को देखकर ही निदा फ़ाज़ली ने लिखा होगा “सीधा सादा डाकिया जादू करे महान। एक ही थैले में रखे आंसू और मुस्कान”। पप्पू अगर उस वक्त मुझे मिलता तो मेरी चिट्ठी तार की तरह पहुंचती।
जब से लिपि की खोज हुई तभी से चिट्ठियां दो लोगों के बीच संवाद का विश्वसनीय जरिया थीं। ‘संदेशों देवकी से कहियों’ से लेकर ‘मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज न होना’ तक की यात्रा चिट्ठियों की इतिहास यात्रा है। साहित्य के रीतिकाल में तो प्रेम की तमाम अवस्थाओं का वर्णन इन्ही संदेशों के जरिए हुआ है। दुनिया का पहला पत्र 2009 ईसा पूर्व का बेबीलोन के खण्डहरों से मिला था। वह भी एक प्रेम पत्र था। मिट्टी की पट्टिका पर लिखा। प्रेमिका के न मिलने पर प्रेमी ने मिट्टी के फर्श पर ही लिख डाला था। दो लाइन के इस पत्र में विरह की तड़प थी। सूफ़ी कवि, संगीतकार, वाद्यकार अमीर खुसरो ने मृत्यु से ठीक एक साल पहले अपने बेटे के लिए एक ख़त लिखा जो खड़ी बोली में हिंदी का पहला पत्र माना जा सकता है। सात-आठ सौ साल पुरानी हिंदी की बोलियों में आपको कविताएँ तो बहुत मिलेंगी। मगर ठेठ हिंदी में इतना पुराना गद्य नहीं मिलता ।
संदेश या पत्र (प्रेम पत्र) का सबसे पुराना संदर्भ पॉंच हज़ार साल से भी पहले भारतीय पौराणिक कथाओं में मिलता है। श्रीमद्भागवतम्: 10.52.44 में इसका ज़िक्र है, इसे राजकुमारी रुक्मिणी ने कृष्ण को संबोधित किया था और उनके ब्राह्मण दूत ने इसे उनके पास पहुंचाया था।-ब्राह्मण उवाच
इत्येते गुह्यसन्देशा यदुदेव मयाहृता: ।
विमृश्य कर्तुं यच्चात्र क्रियतां तदनन्तरम् ॥
मतलब, ब्राह्मण आया, तो उसने रुक्मिणी के लिए लिखे गए गोपनीय पत्र की मुहर तोड़ दी, जो केवल भगवान कृष्ण के लिए था। पर रुक्मिणी द्वारा व्यक्तिगत रूप से चुने गए भरोसेमंद ब्राह्मण ने संदेश की गोपनीयता का उल्लंघन नहीं किया है। केवल कृष्ण ने ही इसे सुना ।
धनुषभंग के बाद राजा जनक ने राजा दशरथ के पास ऐसी ही एक चिट्ठी भेजी।दूत के ज़रिए।कि कॉंड हो गया, धनुष टूट गया.अब आप अयोध्या से बारात लेकर आंए.रामचरितमानस के बालकाण्ड में इसका उल्लेख है-
दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहिं बोलाई॥
मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला॥
ऋग्वेद में संदेश ( चिठ्ठी ) के साथ साथ ‘दूत’ का भी उल्लेख आता है। दूत जिसका काम संदेश पहुंचाना होता था। देवों का प्रमुख दूत अग्नि है। ऋग्वेद १-१२-१ में ‘अग्नि दूतं वृणीमहे कह कर अग्नि का वरण दूत के तौर पर हुआ है। इण्डो-ईरानी दोनो शाखाओं के प्रमुख देव अग्नि हैं। हेरोडोटस (Greek historian) के अनुसार भी अग्नि को देवताओं का दूत माना गया।
पाणिनि की अष्टाध्यायी में चिठ्ठी के अलावा दूतों या संदेशवाहकों का ज़िक्र है।कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी दूतों और संदेशवाहकों को विशेष जगह दी गई है। ऐतिहासिक रूप से, प्राचीन भारत, प्राचीन मिस्र और सुमेर से लेकर रोम, ग्रीस और चीन तक,सभी सभ्यता में पत्र मौजूद हैं । पत्रों का मुख्य उद्देश्य सूचना सम्प्रेषण ही था। उस दौर में पत्र कई सामग्रियों पर लिखे जाते थे, जिनमें धातु, सीसा, मोम-लेपित लकड़ी, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े और जानवरों की खाल शामिल हैं।
शुरू शुरू में मनुष्य एक दूसरे को संदेश भेजने के लिए चित्रों,ढोल नगाड़ों, धुंआ आदि संकेतों का सहारा लेता था। उसके बाद कबूतर और घुड़सवारों की मदद ली जाने लगी। फिर डाक व्यवस्था का जन्म हुआ और लोग अपने संदेशों को डाकघर के ज़रिए भेजने लगे। दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक यदि पत्र अबाध रूप से आ-जा रहे हैं तो इसके पीछे ‘यूनिवर्सल पोस्टल‘ यूनियन का बहुत बड़ा योगदान है, जिसकी स्थापना 9 अक्टूबर 1874 को स्विटजरलैंड में हुई थी। तब से 9 अक्टूबर पूरी दुनिया में ‘विश्व डाक दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है।
समय के साथ इन पत्रों को लाने ले जाने के जरिए भी बदले लेकिन चिट्ठी ताकतवर ही होती गई। 19वीं सदी की शुरुआत तक कबूतर के जरिए संदेश भेजे जाते थे। खासकर होमिंग प्रजाति के कबूतरों का इस काम में इस्तेमाल होता था। इस प्रजाति की खासियत थी कि ये जहां से उड़ते वहीं लौटकर आ जाते थे। इससे संदेश पहुंचने की पुष्टी होती थी। होमिंग 1600 किमी तक बिना रास्ता भटके वापस लौट सकता था। हमारे देश में डाकसेवा व्यवस्थित रुप से 1854 में लार्ड डलहौजी के जमाने में बनी। हालांकि सबसे पहली डाकसेवा ब्रिटेन में शुरु हुई थी। लेकिन प्रेम और पत्र डाकसेवा के भरोसे नहीं रहे। प्रेम होता रहा और प्रेम की अभिव्यक्ति में पत्र लिखे जाते रहे। पत्र या चिट्ठी या पाती व्यापार, आदेश, निर्देश, संदेश, कुशलक्षेम, सूचना, अनुरोध और फरमान जैसी शक्लों के साथ लोगों से मुखातिब रहे। कहीं मुनादी में चिट्ठी पढ़ी गई तो कहीं स्वयंवर की सूचना राजप्रासादों में सुनाई गई। गुप्तचरों को मारकर उनकी पोशाकों में सेना और सिंहासन के राज खोजने की कोशिशें की गईं। कूटसंदेशों के जरिए सत्ता और शासन को बचाने या हिलाने के लिए पत्र लिखे जाते रहे। पत्र पर भरोसा तो ऐसा रहा है कि दूर समुद्र में खोए भटके लोगों ने अपनी ज़रूरी सूचनाएं बोतलों में लिखकर तैरा दीं ताकि कभी उनको कोई पढ़नेवाला मिलेगा और बात सही पते तलक पहुंच जाएगी।
दरअसल, मनुष्य के विकास की कड़ी में सूचना सबसे ज़रूरी सामग्री रही। भाषा-लिपि के जन्म के साथ ही सूचना का संवहन पत्रों से होता रहा। आने की, जाने की, पाने की, खाने की, खो जाने की, मिल जाने की, मिट जाने की, मर जाने की, आ जाने की, मिलवाने की, कमाने की, आजमाने की, जमाने की और न जाने किन-किन बातों की सूचना ये चिट्ठियां ही लोगों को लोगों के साथ जोड़ती रहीं।
कुछ पत्र सार्वजनिक भी लिखे गए। सम्राट अशोक के शिलालेख दरअसल सार्वजनिक अभिव्यक्ति के पत्र ही तो हैं। कुछ पत्र छिपाकर लिखे गए। कुछ पत्र मदद के लिए थे तो कुछ पत्र अधिसूचनाओं के लिए। मगर सबसे प्रतीक्षित पत्र शायद वो थे जिनमें परदेस गए लोगों ने अपने पहुंचने या आने की सूचनाएं अपने घरों को भेजीं। इन पत्रों को पढ़नेवाले खोजे जाते थे और एक-एक पंक्ति की जानकारी ही स्वप्नों, सुखों, प्रतीक्षाओं, अवसादों, विरह और वेदनाओं का अंतरपाठ बन जाते। कहीं पथराई आंखें इन चिट्ठियों को लेकर रातों में सोई हैं तो कहीं उम्मीद के आंसुओं ने इंतजार को मीठा दर्द दिया है।
पत्रों से संवेदनाओं का गहरा रिश्ता रहा है। जब सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में जा रही थीं तो उनके साथ गीता, गणेश की प्रतिमा के अलावा उनके पिता के हिन्दी में लिखे पत्र भी थे। दुनिया का राजनीतिक और सामाजिक इतिहास भी पत्रों के बिना अधूरा है। मार्क्स और एंजल्स के बीच ऐतिहासिक दोस्ती की शुरुआत भी पत्रों के जरिए हुई थी। महात्मा गांधी चिट्ठी लिखने में इतने माहिर थे कि वे एक साथ दोनों हाथों से चिट्ठियां लिखते थे। जवाहरलाल नेहरु ने जेल से ही चिट्ठियों के जरिए इन्दिरा गांधी को राजनीति की ट्रेनिंग दी। ये परम्परा जारी रही। इन्दिरा जी ने राजीव गांधी को दून स्कूल में चिट्ठियां भेजकर देश के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवेश की जानकारी दी।
अब चिट्ठी लिखी ही नहीं जाती। तो लिफाफा देख मजमून भांपने वाली पूरी जमात का अस्तित्व खतरे में है। सेल फोन और कम्प्यूटर से कुछ भांपा नहीं जा सकता। संचार क्रान्ति से दुनिया तो करीब आ गयी है। पर इसने दिलों की दूरियां बढ़ा दी हैं। पुराने पत्रों के जरिए अतीत में लौटने और भावनाओं में विचरने का आनंद ही कुछ और है।
चिट्ठियों के साथ एक और व्यक्ति हमारे समाज, जीवन से गायब हुआ। वह है डाकिया। आज की कुरियर वाली पीढ़ी तो खाकी वर्दी वाले डाकिए को शायद पहचान भी न पाए। एक जमाना था जब घरों में डाकिए का बेसब्री से इंतजार होता था। उसके लम्बे झोले में हंसने और रोने दोनों के सामान रहते थे। मेरे मोहल्ले के डाक चचा अब्दुल मुझे चिट्ठियों के साथ ही रोज कुछ न कुछ नयी जानकारी देते थे। उन्होंने ही मुझे बताया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन जीवन की शुरुआती दौर में पोस्टमैन थे।
कालांतर में चिट्ठियों से रस तत्व तो गायब हुआ। वो भूमिका बदल वापस लौट आई। और चिट्ठियां पोल खोलने का जरिया बन गयी हैं। पोल खोलने की पहली चिट्ठी कमलापति त्रिपाठी ने राजीव गांधी को लिखी थी। त्रिपाठी जी चिट्ठी लिखने के पंडित थे। नाराज राजीव गांधी ने उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया। ऑस्ट्रेलिया के जूलियन असांजे ने विकीलीक्स के जरिये दुनियाभर के पत्राचार में सेंध लगा दी। हर किसी की चिट्ठी लीक कर उन्होंने दुनिया में सनसनी फैलाई। वित्तमंत्री रहते प्रणव मुखर्जी की एक चिट्ठी ने चिदंबरम को कटघरे में ला दिया जिसमें उन्होंने लिखा था की आप चाहते तो स्पेक्ट्रम की नीलामी हो सकती थी। जनरल वीके सिंह ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर बम फोड़ा कि सेना के गोला बारूद खत्म हो रहे हैं। अन्ना हजारे की चिट्ठियों ने मनमोहन सिंह की नींद उड़ा दी थी। कपिल सिब्बल को लिखी आचार्य बालकृष्ण कि एक चिट्ठी से बाबा रामदेव के आन्दोलन कि हवा निकल गयी। चिट्ठियों की अब भूमिका बदल गयी है। इनका इस्तेमाल मूर्तिभंजन के लिए हो रहा है।
राजस्थान के ग़ज़लकार हस्ती मल हस्ती लिखते हैं “प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है। लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है। नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है। जिस्म की बात नहीं थी उन के दिल तक जाना था” पर उन्हें नहीं पता था कि पत्र लिखने के बाद मेरा बाकी का वक़्त उसे पहुंचाने में लगता था। लोगों में अब इतना धैर्य रहा नहीं। जमाना तुरंता है। एसएमएस और बीबीएम पत्रों के लिए चुनौती बनकर आए। फिर इंटरनेट पर चैटरूम तक बने और लोग वहां घंटों अपरिचितों में भी दोस्त खोजते रहे। आजकल चैट का जमाना है। लोग अंतहीन बातें एक दूसरे से कह सकते हैं। दुनिया के किसी भी कोने से एक सेकंड में लिखकर या कोई ऑडियो-वीडियो संदेश भेजा जा सकता है। यहां शब्दों की सीमा नहीं है। अवसर की सीमा नहीं है। प्रेम करने वाले आजकल अनंतकाल तक चैट पर चिपके दिखते हैं। इससे शब्द सस्ते हो गए हैं और प्रेम का सार समेटे वाक्य संवाद से गायब। अब पत्र की जगह एक आभासी संवाद है जो ऑनलाइन है। यहां कम लिखकर बहुत सारा पढ़ने और उससे भी ज्यादा समझने का श्रम और कौशल खोता जा रहा है। अब शोर है जिसमें अर्थवत्ता खोजनी पड़ती है। लोगों की जिंदगी में दर्जनों मैसेज ग्रुप हैं, बेहिसाब लोग उंगलियों भर दूरी पर हैं। फिर भी लोग नितांत अकेले हैं। अनकहे और अनसुने हैं। किसी ने आपसे चैट में चार दिन पहले क्या क्या कहा था, शायद ही आपको याद रहे। आज भेजने की जल्दी है, बता देने की बेचैनी है। लेकिन भेजा गया क्षणभंगुर है। भेजते ही ये फौरन ‘इनबाक्स’ में टन्न से गिरते हैं पर यादों की पिटारे में इनके निहित कुछ नहीं उठता। ऐसे में पत्रों की अकाल मौत हुई। जब दिल कि बात मुंह तक नहीं आ पायी तो पत्र ही जरिया बनते थे। शायद दिल की जगह आजकल दिमाग से काम चलता है। पर इन संदेशों में वो ख़ुशबू कहां जो आज मिली मेरी चिट्ठी में हैं।
साभार: हेमंत शर्मा जी के फेसबुक वॉल से।
