सुनो कुछ तो कहता है गोधरा?

27 फ़रवरी 2002 को गुजरात के गोधरा में मानवता शर्मशार हुई, जब एक संप्रदाय विशेष ने गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में 59 रामभक्तों को जिंदा फूंक दिया गया था, जिसमें 25 महिलाएं, 19 पुरूष और 15 बच्चे शामिल थे। सोनाली मिश्रा ने गोधरा काण्ड की जो तस्वीर पेश की है वह सार्थकता के धरातल पर सटीक प्रहार है।

उस दिन के बाद हम नहीं रहे सामान्य,
उस दिन के बाद हमारे सामने आया एक घिनौना सच,
और हमने देखा भेदभाव का अनूठा संसार,
और हमने देखा कथित निष्पक्षता की पक्षधरता,

हमने देखा उन जले हुए शवों की निर्मम उपेक्षा,
हमने देखा उन्हें छोड़ दिया गया था मीडिया में उसी तरह उपेक्षित,
जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो!
मगर वह तो केवल झलक थी,

बहुत कुछ होना था,
खेमा तो अभी बनाना था,
अभी तो कथित निष्पक्षों को बहुत कुछ कमाना था,
अभी बहुत कुछ सामने आना था,

अभी घिनौने स्वार्थों के षड्यंत्रों को अमली जामा पहनाना था,
उस दिन कारसेवा के बाद लौटते हुए उस स्टेशन पर जल रहे थे कुछ शरीर,
उनमें कुछ सपने रहे होंगे!
उनमें उस आग से डरने वाले रहे होंगे,

उनमें कुछ दूध मुन्हें बच्चे रहे होंगे,
उनमें कुछ यौवन की कलियाँ रहीं होंगी!
मगर उन्हें एक षड्यंत्र और घ्रणित घटना के फलस्वरूप भून दिया गया जिंदा,
और कुछ सपने धूं धूं कर जलने लगे, उस दिन कांप उठा था वह शहर,
ज़िंदा मांस की गंध से भर गया था वह शहर

गिद्ध भी नहीं मंडराए उधर,
इंसानों को देखकर शर्मिंदा हो गए!
हां, उसी दिन!
उसी दिन से उग रहा था एक राजनीतिक षड्यंत्र,

ये केवल शुरुआत थी,
उस दिन के बाद इन जले हुए जिस्मों को ठुकराने की परम्परा स्थापित हुई,
उस दिन के बाद से राजनीति में निम्नता की पराकाष्ठा आरम्भ हुई,
उस दिन के बाद लोगों ने देखा तुष्टिकरण का नंगा नाच,

हां,
उस दिन के बाद लोगों की आँखों पर तुष्टिकरण का चश्मा और गाढ़ा हुआ!
उस दिन, जली नहीं थी केवल वही बोगी,
उस दिन जला था भारत का एक स्वर्णिम पृष्ठ,
उस दिन जला था एक होकर रहने का स्वप्न,
उस दिन मांस की गंध कई नेताओं की नाक में नहीं गयी,
वह तुष्टिकरण की भेंट चढ़ गयी!

उस दिन के बाद राजनीति ने एक करवट ली,
उस दिन के बाद से आज तक हम खेमों में बंटे हुए हैं,
हाँ, जो जले उस दिन दिल में आज तक जलने के जख्म हरे बने हुए हैं!
उस दिन के बाद दूरियां बढ़ गयी हैं,
प्रेम और सौहार्द की जमीन दरक गयी है!
उन जिंदा जलन ने हमें हिन्दू मुसलमान कर दिया,

तब से आज तक तक दंगों में मरने वालों का धर्म देखते हैं,
धर्म के आधार पर अपने अपने खेमें लाशें गिनते हैं,
धर्म के आधार पर हम बांटते हैं आंसू………..
उस दिन के बाद हम वैसे न रहे,
हम केवल धर्म बन गए……….

लेखिका: सोनाली मिश्रा

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