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माघ मेले में ठेकेदारी व्यवस्था कहीं सरकारी तंत्रों की मिली जुली साजिश तो नहीं ?

अनुज अग्रवाल। प्रयाग में संगम पर नाव से जाते समय आज केवट से हुई बातों के बीच जो भाव जागृत हुए उनसे तन मन और आत्मा प्रफुल्लित हो गयी। गंगा – यमुना – सरस्वती के संगम तक पहुंचते पहुँचते मुझे अहसास हो चूका था क़ि संगम कोई दो नदियों के मिलन का तकनीकी स्थल मात्र न् हो भारत के भव्य और दिव्य अतीत और भविष्य का केंद्र है।

संगम पर स्नान से जो स्फूर्ति, संतुष्टि और शांति मिली वो अपने आप में अद्भुत थी। में उस केवट के समक्ष अज्ञानी सा महसूस कर रहा था और उसकी मुस्कान और चेहरे पर शाश्वत संतुष्टि के भाव से ईष्या। मेरा अहम उसे नीचे दिखाने की सोचने लगा। लौटते हुए मैंने उसे कुरेदा, कितना कमा लेते हो। वो सहज भाव से बोला 5000 रुपये महीना। मैं चोंक गया! बोला झूठ क्यों बोल रहे हो 450 रूपये तो एक चक्कर के तुम् हमसे ले रहे हो। दिन में कितने चक्कर लगा लेते हो? वो बोला तीन। फिर औसतन 1300 से1500 रूपये रोज। ऐसे में महीने के 40 हज़ार तो आराम से हो जाते होंगें। बो बोला साहब जी नाव मेरी नहीँ है ,ठेकेदार की है। मैंने कहा अपनी खरीद लो, वो बोला 5000 रूपये में 5 लोगों की गृहस्थी पालू या 60000 रूपये की नाव खरीदूँ। फिर खरीद भी लूं तो भी क्या होगा। मैंने उत्सुकता से कहा क्यों? वो बोला संगम की सारी नावों का मालिक एक ही व्यक्ति है और उसको ही पूरे क्षेत्र में नाव चलवाने का ठेका मिलता है। लगभग 5000 नावें हें उसके पास। मैं भौचक्का रह गया। औसतन 5 लाख रूपये कमाकर देने वाली एक नाव के केवट को मात्र 60000 रूपये साल मिलते हें।

ठेकेदार औसतन 5 लाख रूपये प्रति नाव के हिसाब से 5000 नावों से 250 करोड़ रूपये सालाना इकट्ठे करता है और केवटों को मात्र 30 करोड़ वेतन देता है। नावों पर उसका निवेश मात्र 20 से 30 करोड़ के बीच है यानि 200 करोड़ का फायदा। लेकिन यह फायदा है या लूट? आगे उसने बताया कि हज़ारों फड़ो और दुकानों के प्रति दूकान बड़े ठेकेदार 50 हज़ार से 10 लाख मासिक तक के ठेके उठाते हैं यहां भी सरकार कई गुना कम दामो पर बड़े ढेकेदारों को ठेके देती है। इसी कारण फड़ वाले और दुकानदार महंगा सामान बेचने को मजबूर हें। संगम से लौटकर मैंने अपने एक वकील मित्र से अपने संगम की इस यात्रा के अनुभव बताये तो उसने और गहराई से संगम के मेलों के लूट के खेलों की कलई खोली।

उन्होंने बताया कि कल से माघ का मेला शुरू हो रहा है। एक महीने के इस मेले के लिए प्रदेश सरकार 1400 करोड़ रूपये खर्च कर रही है। अधिकाँश खर्च अस्थायी निर्माण और सेवाओं की मद में होंगें। इसमें 40 से 50 प्रतिशत तक पैसा खा लिया जायेगा। पंचम तल के शासन, संबंधित मंत्री, सचिव, जिला प्रशासन और मेला प्रबंधन सब इस लूट में हिस्सेदार हें। में सकते में था! पिछले 25-30 बर्षों से प्रदेश में सर्वजनों और समाजवादियों की ही सरकारें रही हें और उनके शासन काल में यह हज़ारों करोड़ की सालाना खुली सामूहिक लूट चल रही है। यह सदैव इक प्रश्न बना रहेगा कि क्यों सरकार सीधे दुकानदार को दूकान या नाविक को नाव नहीं दे सकती? ठेकेदारों के रूप में दलालों की फ़ौज की भर्ती व्यवस्था के सारे अंगों की मिलीजुली साजिश तो नहीं? और इस खेल से मीडिया का आँखे मीचे रहना उसकी भी इस खेल मौन भागीदारी की ओर इशारा कर रहा है। भारत की आध्यात्मिक विरासत और संस्कृति के साथ ही जीवनदायनी गंगा और यमुना के संगम पर आने वाले श्रद्धालुओं से यह लूट अत्यंत पीड़ादायक थी मेरे लिए। और लूटने वाले हमारे प्रदेश के सबसे प्रबुद्ध, शिक्षित और जिम्मेदार लोग हें।

प्रदेश में प्रयाग धार्मिक के साथ न्याय और शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र है। किंतू चिराग तले अँधेरा है। न्याय की अब यहाँ मंडी बन चुकी है और वकील एवं न्यायधीश करोड़ो -अरबो के मालिक। शिक्षा के स्थान पर अब यह फर्जी डिग्री बेचने और कोचिंग और सरकारी नोकरियो के सौदों का शहर बन चूका है। कहीँ भक्त लूट रहे हैं तो कहीँ मुअक्किल और कहीँ बच्चो के सुनहरे भविष्य की चाह में अभिभावक। अब मेरे लिए यह समझना आसान था कि क्यों इस शहर की जमीनें और मकान प्रदेश में सबसे महंगे हें। साथ ही हराम की काली कमाई की हज़ारो करोड़ की अर्थव्यवस्था वाले इस शहर के उस नाविक की शाश्वत मुस्कान और संतुष्टि के बीच हराम की कमाई के सौदागरों की विमुद्रिकरण और केश लेस अर्थव्यवस्था के केंद्र सरकार के क़दमो के बीच बढ़ती बेचैनी भी।

साभार: अनुज अग्रवाल संपादक, डायलॉग इंडिया

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। IndiaSpeaksDaily इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति उत्तरदायी नहीं है।

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