मोदी के नेतृत्व में भाजपा के बढ़ते प्रभाव से अपने वजूद को बचाने के लिए लालू यादव ने उसके सामने समर्पण कर दिया जो राष्ट्रवाद के खिलाफ सबसे वीभत्स चेहरा है।

बेगूसराय की राष्ट्रीय पहचान राष्ट्रकवि दिनकर से रही है। विद्यापति के सिमरिया घाट से रही है। देश की सबसे प्रतिष्ठित औद्धोगिक नगरी के रुप में रही है। बिहार के लेलीनग्राद की रही है। मिनी मास्को कि रही है।लेकिन अब बेगूसराय की पहचान राष्ट्रद्रोह के आरोप में जमानत पर चल रहे जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार से कराई जा रही है! 2019 लोकसभा चुनाव अभी दूर है लेकिन महागठबंधन जल्दवाजी में क्योंकि वो नेतृत्व संकट से जूझ रहा है। नेतृत्व संकट ऐसा कि जिस लालू यादव ने 90 के दशक में बिहार से वामपंथ का बोरिया बिस्तर समेट दिया उसी लालू के पुत्र तेजस्वी ने बेगूसराय से महागठबंधन की सीट पर अपना दावा छोड़कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को जीवनदान दिया है। इसके लिए महागठबंधन के कन्हैया कुमार को अपना नेता चुन लिया है।

2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार के लिलिनग्राद में पहली बार भगवा पताखा फहराया तो लाल सलाम के लिए वजूद संकट हो गया। वो चुनावी टक्कर से ही गायब था। दूसरे नंबर पर लालू की आरजेडी थी। वही आरजेडी जिसने प्रांत से वामपंथ का सफाया कर दिया, अब बिहार के लेलिनग्राद में फिर से उसे जिंदा करना चाहती है। तेजस्वी का यह फैसला यकायक नहीं हुआ है। देशद्रोह में जमानत पर जेल से बाहर निकलते ही चारा घोटाले में जेल जा रहे लालू के चरण छुकर आशीर्वाद लेकर कन्हैया ने अपना मनसूबा साफ कर दिया था। आशीर्वाद देकर लालू यादव ने संकेत दे दिया था कि मोदी के नेतृत्व में भगवा के बढ़ते प्रभाव में अपने वजूद को बचाने के लिए उस चेहरे के सामने समर्पण करना होगा जो राष्ट्रवाद के खिलाफ सबसे विभत्स चेहरा है। नीतीश कुमार की पार्टी से गठबंधन टुटने के बाद बिहार में अपना वजूद बचाना लालू की आरजेडी की ही नहीं कांग्रेस के लिए भी सबसे बड़ी चुनौती है। आजादी दिलाने का मुल्लमा पालने वाली उस कांग्रेस को जिसे पचास के दशक में भाकपा ने बेगूसराय से बाहर करना शुरु कर दिया था।

आजादी के कुछ ही साल बाद राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पूण्यभूमि की पहचान सूर्ख लाल रंग के रुप में हुई ! कारण यह था कि 1950 लेकर 1960 के बीच बेगूसराय बिहार की सबसे बड़ी औद्योगिक नगरी के रुप में उभरकर सामने आई। इसी दौर में बरौनी तेलशोधक कारखाना,बरौनी फर्टिलाइजर और बरौनी थर्मल पावर जैसे कारखानों की स्थापना से बेगूसराय की पहचान देश सर्वश्रेष्ठ औध्य़ोगिक नगरी के रुप में हो गई। इतने बड़े पैमाने पर कल कारखानों की स्थापना ने बेगूसराय में मजदूर संगठनों की नींव खड़ी कर दी। बिहार में कम्यूनियस्ट पार्टी स्थापित करने में इन मजदूर संगठनों ने बड़ी भूमिका निभाई।

प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की सरकार में मंत्री बेगूसराय की शान माने जाने वाले रामचरित्र सिंह के पुत्र चंद्रशेखर सिंह को यहीं से राजनीति में बगावत के फायदे का एहसास हुआ। चंद्रशेखर सिंह ने बेगूसराय की भूमि पर बने तीन बड़े कारखानों में सबसे पहले लोकल लोगों की बहाली के लिए आंदोलन चलाया। बड़े पैमाने पर क्षेत्रिए लोगों को इन कल कारखानों में नौकरी मिली। इसका श्रेय बहुत हद तक चंद्रशेखर सिंह को गया। 1957 के उपचुनाव में चद्रशेखर सिंह को इसका ईनाम मिला वे बिहार में वामपंथ का चेहरा बनकर उभरे। बिहार में लाल पताखा पहरा कर चंद्रशेखर सिंह ने ही बेगूसराय को लेनिनग्राद का तमगा दिया। फिर बंदुक के बल पर वामपंथ ने बेगूसराय में अपना पांव पसारा। कहते हैं 1969 से लेकर 1982 तक जितनी राजनीतिक हत्याएं बेगूसराय में हुई, देश में कहीं नहीं हुई। लेनिनग्राद बनने की कीमत बेगूसराय ने खौफ के शहर के रुप पहचान में चुकाई है।

एक जमाना था जब बिहार में भूमिहार को सरकारी जाति कहा जाता था। सत्ता में उसकी सीधी पहुंच थी। ब्राह्मणों के साथ भुमिहार कांग्रेस के वोट बैंक माने जाते थे। लेकिन बिहार में भूमिहारों के वर्चस्व वाले शहर बेगूसराय से कांग्रेस का सुफरा साफ करने वाले वो चंद्रशेखर सिंह ही थे। वो बेगूसराय ही था जिसने बिहार से कांग्रेस की चूले हिलाना शुरु कर दिया। ये उस दौर की शुरुआत थी जहां बेगूसराय की सड़कों पर सिर्फ लाल झंडा दिखता था।

विधानसभा के सात के सातों सीट पर कई बार वामपंथ का कब्जा होता था। लेकिन, हिंदुत्व को जाति में तोड़ने की नीति पर चलने वाले वाम दलों का आधार लगातार खिसकता चला गया। 1972 के जिस बिहार विधानसभा में 38 विधायकों के साथ भाकपा मुख्य विपक्षी दल थी। वर्तमान विधानसभा में उसके सिर्फ एक विधायक रह गये। यह सब यकायक नहीं हुआ 1975 के आपातकाल में भाकपा कांग्रेस के साथ खड़ी हो गई। इसका परिणाम उसे भुगतना पड़ा। 1977 के जनता लहर में उसकी जमीन खिसक गई। उसके सभी 22 प्रत्यासी हार गए। इसी दौर में मध्य और दक्षिण बिहार में वामपंथी राजनीति नक्सलवाद के रूप में एक नयी करवट ले रही थी। शुरूआत दौर में पार्टी यूनिटी, एमसीसी, भाकपा माले (लिबरेशन) जैसे कई संगठन चुनाव बहिष्कार और गैर संसदीय संघर्ष के नारे के साथ अलग-अलग इलाकों में सक्रिय थे। उनके साथ गरीबों, पिछड़ों व दलितों का बड़ा तबका साथ था।

मंडल आंदोलन ने हिंदु समाज का तानाबाना पूरी तरह तोड़कर रख दिया। यह वामनीति के पक्ष में था। मंडलवादी राजनीति ने जिस सामाजिक और जातिगत आधार पर लोगों को लालू प्रसाद के पक्ष में गोलबंद किया, लगभग वही भाकपा का जनाधार था। यहीं से लालू ने अब तक सहयोगी रहे भाकपा के मूल वोट बैंक में सेंध लगाना शुरु कर दिया। वाम दलों ने भूमि सुधार, मजदूरों, बटाइदारों को हक, ग्रामीण गरीबों को हक और शोषण-अत्याचार के खिलाफ संघर्ष के नाम पर जो जमीन तैयार की थी, उस पर मंडलवाद की राजनीति करते हुए लालू यादव ने फसल बोयी।

भाकपा की जड़ों पर जोरदार प्रहार 1990 के बाद मंडलवाद के उभार से ही हुआ। जिसके अगुआ बिहार में लालू थे। वर्ष 2000 के चुनाव के बाद से विधानसभा में वामपंथ की संख्या में गिरावट आनी शुरू हुई। 1995 तक जहां वामपंथी विधायकों की संख्या 35 होती थी, वह सिमट कर 2000 में नौ हो गयी । जबकि 2010 के चुनाव में वाम दलों ने अपनी बची-खुची सीटें भी गंवा दीं। इस समय भाकपा के सिर्फ एक विधायक विधानसभा में हैं ।

सवाल यह है कि जिस लालू यादव ने बिहार से वामपंथ का सुफरा किया उसी लालू यादव कि पार्टी बिहार के लेलिनग्राद से भस्मासुर क्यों पैदा करना चाहती है! खुद को महागठबंधन का सबसे बड़ा चेहरा मानने वाले लालू और महागठबंधन की अगुआई करने वाली कांग्रेस पार्टी , कन्हैया कुमार में ही अपना वजूद क्यों देख रही है! यह प्रयोग वर्तमान में भाजपा के वोट बैंक माने जाने वाले भूमिहार बहुल बेगुसराय से ही क्यों शुरु हुआ! क्या इसलिए क्योंकि कन्हैया भुमिहार जाति से है ! जातिगत समीकरण का दांवपेंच चुनावी वोट बैंक लिए राजनीतिक दल हमेशा से इस्तेमाल करते रहे हैं। यह प्रयोग अक्सर सफल रहा है।

जिस वामपंथ और उसके नेता कन्हैया ने जाति तोड़ो का नारा दिया टिकट की संभावना बनते ही अपनी जाति कि घोषणा कर दी। बेगूसराय को भी क्या इसका एहसास हो रहा है कि चंद्रशेखर सिंह की तरह कन्हैया देश भर में शहर और वहां के बहुलतावादी जाति की पहचान के रुप में उभर गए हैं ! यदि ऐसा हुआ तो राष्ट्रकवि के शहर की पहचान राष्ट्रद्रोह में जमानत पर चल रहे एक शक्स से होगी। महागठबंधन ने दांव तो बढ़िया चला है। नेतृत्व संकट से गुजर रहे महागठबंधन को बस उस कन्हैया कुमार से उम्मीद है जो देशद्रोह के आरोप में तिहाड़ का चक्कर काट कर आया है। बेगूसराय को तय करना है कि उसकी पहचान किस से होगी!

URL: Mahagathbandhan wants to identify Begusarai Kanhaiya Kumar, accused of treason

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