राथ्सचाइल्ड, मनमोहन सिंह, अमर्त्यसेन, पी चिदंबरम का नेक्सस RBI के अंदर से चलाता था नकली नोटो का धंधा?


जितेन्द्र चतुर्वेदी। 3 जनवरी 2014, यह तारीख मीडिया जगत को याद होगी। इसी दिन बतौर प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने अंतिम प्रेस वार्ता की थी। उसमें जो प्रधानमंत्री ने कहा था, उसे याद करने की जरूरत है।  वह इसलिए क्योंकि जो लिखा जाएगा उसका 3 जनवरी को दिए गए, बयान से गहरा नाता है। उस दिन मनमोहन सिंह ने कहा था  ‘न तो विपक्ष ने और न मीडिया ने मेरे साथ न्याय किया ,मुझे उम्मीद है इतिहासकार मेरी उपलब्धि के बारे में सही आकलन करेंगें और मैं ने जो सेवायें की हैं, उन्हें देश के सामने लायेंगे।’  इस बयान का वह हिस्सा जिसमें वे कहते हैं ‘ मुझे उम्मीद है इतिहासकार मेरी उपलब्धि के बारे में सही आकलन करेंगें ‘  अधिक महत्वपूर्ण है।

 

उसकी वजह मनमोहन सिंह का इतिहास है जो इस रिपोर्ट में है।  वह यह कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम पर क्रैम्बिज विश्वविद्यालय में एक छात्रवृति दी जाती है। निश्चित ही यह ऐतिहासिक बात है। मगर सिर्फ  डॉ मनमोहन सिंह के लिए। देश के लिए तो नहीं है। एकबारगी आपको पढ़ने में यह अटपटा लगेगा।  जो स्वभाविक है क्योंकि बात पूर्व प्रधानमंत्री की हो रही है।  लेकिन जो सही है उससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। सच यह है कि जो छात्रवृति योजना शुरू की गई उसके एवज में देश-दुनिया के चंद रखूदार लोगों  ने भारत की जमीन का इस्तेमाल किया।

बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उन्हें इसकी इजाजत दी। सोनिया गांधी ने उन लोगों को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) में रखा। उनमें से कुछ एक नक्सलवाद का समर्थन करते हैं। इसके बाद भी उन्हें परिषद में रखने से गुरेज नहीं किया।  कहा गया कि वे ‘सिविल सोसाइटी’  के लोग है।  यह वही ‘सिविल सोसाइटी’ है जिसे राथ्सचाइल्ड  फंड करता है। 

राथ्सचाइल्ड की गिनती दुनिया के सबसे संपन्न परिवार में होती है जिनकी कुल संपत्ति 400 बिलियन डॉलर है।  अगर इनके पारिवारिक इतिहास की बात करें तो वह बहुत दिलचस्प है। शेयर बाजार में हेराफेरा करना ,हिंसा को बढ़ावा देना, बैंकिंग क्षेत्र पर नियंत्रण  रखना और जनसंचार के जरिय अपने पक्ष में जनमत तैयार करना और करवाना इनकी खूबियों में शुमार है। गरीब देशों में निवेश करना और उनके संसाधनों कब्जा कर लेना राथ्सचाइल्ड का काम है। 

जाहिर है 21 सदीं के इस दौर में  सीधे तौर पर तो कही कब्जा कर नहीं सकते।  तो उसके दिए राथ्सचाइल्ड ने नया रास्ता निकाला। वह है नीति निर्माताओं को प्रभावित करना। उसके दो तरीके हैं। पहला, जनसंचार माध्यम का उपयोग करना और दूसरा है, नीति निर्माताओं को कृतज्ञ करना। राथ्सचाइल्ड ने दोनों का इस्तेमाल किया।

अगर नीति निर्माताओं की बात करें तो डॉ मनमोहन सिंह के नाम से जो छात्रवृति क्रैम्बिज विश्वविद्यलाय में चल रही है, उसके प्रणेता राथ्सचाइल्ड है। इस छात्रवृति को फंड इरांडा राथ्सचाइल्ड फाउंडेशन करता है। इस परिवार से अमत्य सेन भी जुड़े है। उनकी पत्नी इम्मा राथ्सचाइल्ड  परिवार की ही वंशबेल है। 90  के दशक में दोनों ने विवाह किया था। विवाह कुछ साल बाद अमत्य सेन को नोबल पुरस्कार मिला था।  वे भी भारत के हैं। नीति निर्माता को प्रभावित करते हैं। डॉ मनमोहन सिंह  के वरिष्ठ है।

एक दौर में दोनों दिल्ली स्कूल आॅफ इकोनामिक्स में फैकल्टी हुआ करते थे। इसलिए जाहिर तौर पर संबंध पुराना है। सप्रंग सरकार बनने के बाद वह काम आया। नीतियों को प्रभावित किया जाने लगा। डॉ साहब को कोई एतराज भी नहीं था।  मामला जो संबंध का ठहरा।  बाद वही कृतज्ञता में बदल गया।  अगर इसे  बैकिंग टाइकून ईएल राथ्सचाइल्ड की पत्नी के साक्षात्कार से जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर और साफ होती है।  उनका साक्षात्कार 2007  में आया था।  उनसे जब भावी निवेश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि राथ्सचाइल्ड की नजर भारत पर है। वहां उभरता हुआ बाजार है। इसलिए संभावना ज्यादा है।  वे आगे कहती है कि डॉ मनमोहन सिंह का रवैया भी सकारात्मक है। क्या मनमोहन सिंह के सकारात्मक रवैए की वजह से ही मनमोहन सिंह छात्रवृति योजना राथ्सचाइल्ड ने शुरू की?  क्या यह हितों के टकराव का मामला नहीं है? अगर सप्रंग सरकार के दस साल को देखा जाए तो इसके बहुत उदाहरण मिल जाते हैं। उसमें अमत्य सेन की भूमिका भी उभर कर सामने आती है।

द संडे गार्जियन का दावा है कि सप्रंग सरकार के दौरान अमत्य सेन की तूती बोलती थे। उनके प्रिय शागिर्द ज्यां द्रेज को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में रखा गया था।  राथ्सचाइल्ड को भी उस दौर में खूब पैसा बनाने का मौका मिला। काम तो उसे सरकार बुलाकर देती थी। उसे देने के लिए न तो कोई मापदंड होता था और नहीं कोई नियम कानून। बस शर्त एक थी, वह राथ्सचाइल्ड हो। ठेका मिल जाता था। ऐसा ही एक ठेका देने के लिए राथ्सचाइल्ड को चुना गया। ठेका थ्री जी स्पेक्ट्रम के आवंटन का था। उसके लिए आनलाइन निविदा मगाई गई। आनलाइन निविदा मांगाने का काम  राथ्सचाइल्ड को दे दिया। उन्हें इस क्षेत्र का कखगघ भी नहीं पता। वे बैकिंग से जुड़े है। फिर भी उन्हें काम दिया गया जो की सीधे तौर पर गलत था।

पर जिन्हें गलत-सही का फैसला करना था, वे तो राथ्सचाइल्ड के प्रति वफादारी निभा रहे थै। तभी तो जिस स्पेक्ट्रम के लिए  आनलाइन निविदा की जरूरत नहीं थी, उसे भी आनलाइन कर दिया। वह सिर्फ इसलिए ताकि राथ्सचाइल्ड को फायदा पहुंचाया जा सके। द संडे गार्जियन के मुताबिक इसके लिए उसे 30.5 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ।  एयरसेल- मैक्सिस मामले में भी इसकी भूमिका है। कहा जाता है कि पिछले दस सालों में देश के अदंर जो भी वित्तीय घोटाले हुए है, उनमें राथ्सचाइल्ड की भूमिका रही है। विजय माल्या का घोटाला भी उसी श्रेणी में आता है।  वे कई सौ करोड़ रुपया लेकर भाग गए हैं। यह सब कांग्रेस और राथ्सचाइल्ड की मेहरबानी से हुआ।

तो क्या मनमोहन सिंह ने राथ्सचाइल्ड के कहने पर विजय माल्या पर लुटाया था सरकारी बैंक?


विजय माल्या को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने बैंको से खूब कर्ज दिलाया। बावजूद इसके कि वे कर्ज अदा करने की हालत में नहीं थे। फिर उनके लिए सिफारिशी पत्र लिखे गए।  बैंको को मजबूर किया गया। विजय माल्या को कर्ज के ऊपर कर्ज दिया गया। पर सवाल यह है कि इस तरह कर्ज क्यों दिया गया?  इसे जानने के लिए  विमान सौदे की तरफ देखना होगा। 2007  में एयर डेक्कन को किंगफिशर ने खरीदा।  किंगफिशर के मालिक विजय माल्या है। विजय माल्या ने यह सौदा राथ्सचाइल्ड की सलाह पर किया। इस सलाह का भारी खामियाजा विजय माल्या को चुकाना पड़ा। वे सौदे की वजह से कर्ज में डूब गए।  कोई 150 मिलियन डॉलर का घाटा हो गया।

आधे जहाज  की उड़ान बंद हो गई।  इससे बाहर निकलने के लिए बैकों से कर्ज लिया। उन्हें मिल भी गया। पर बात नहीं बनी तो वे राथ्सचाइल्ड के पास गए। उन्होंने रास्ता निकाला। कहा कि दारू की कंपनी का शेयर बेच दो।  विजय माल्या ने बेच दिया और बताया कि 7200 करोड़ रुपये का कर्ज चुकाने के लिए बेच रहे हैं।  बैंकों को भी राहत मिली कि उनका पैसा लौट आएगा। यह वाकया 2012  का है।  सौदे से माल्या को 2 बिलियन डॉलर मिले। पर लेकिन यह लेनदेन भारत के बाहर किसी दूसरे बैंक में हुआ।  जो घूमकर राथ्सचाइल्ड बैंक जिनेवा में आया। एक और किश्त आई जो 75 मिलियन डॉलर की थी।  जाहिर यह पैसा कर्ज चुकाने के लिए नहीं था।  बैंकों और सरकार को मूर्ख बनाने के लिए था। विजय माल्या ने राथ्सचाइल्ड के साथ मिलकर बैंकों को मूर्ख बनाया।

सप्रंग सरकार ने इसमें साथ दिया। तभी तो बैकों का करोड़ो रुपया माल्या लूट पाए। जब लूटा हु, सारा माल राथ्सचाइल्ड बैंक तक पहुंच गया तो माल्या भी देश छोड़ कर लदंन  चले गए।  वहां जिस लेडी वॉक नाम के मैनसेन में वे रहते हैं, उसे खरीदा 2015 में था। उनकी तरफ से सौदा राथ्सचाइल्ड बैंक ने किया था। इसी बैंक में विजय माल्या का गोपनीय खाता है। इसे वे भारतीय अदालत में स्वीकार कर चुके हैं। भारतीय बैंक भी इस बात से परिचित है।  कहने का मतलब यह हुआ कि सप्रंग सरकार के दौर में बैकों को लूटने की योजना बनी। किंगफिशर उसका हथियार बना। राथ्सचाइल्ड ने उसका उपयोग किया और सैकड़ों करोड़ रुपया ले उड़ा। 

कृतज्ञ लोगों ने इस लूट पर कोई सवाल उठाना मुनासिब नहीं समझा। यह हाल बस किंगफिशर मामले तक ही सीमित रही। हर जगह जहां राथ्सचाइल्ड की भूमिका रही, वहां सरकार चुप रही। संदीप पांडे को ही लीजिए, वे बहुत बड़े वाले समाजसेवी है। नक्सलवादियों के साथ बराबर मिलते थे। चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेकने की रणनीति बनाते थे। राथ्सचाइल्ड उनके फाउडेशन को फंड मुहैया करता है। सप्रंग सरकार ऐसे लोगों की हिमायती रही है। कारण साफ है जो कोई भी राथ्सचाइल्ड से जुड़ा था, कृतज्ञ  सप्रंग सरकार उनके साथ खड़ी रहती थी। तभी तो जाली नोटों के कारोबार पर सप्रंग सरकार ने छुपी साध रखी थी।

मनमोहन सरकार में भारतीय रिजर्व बैंक से जारी होता था जाली नोट!


जाली नोटों का बड़ा बाजार है। आंतकवाद जैसी घटना को बढ़ावा देने और अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने में इनकी भूमिका होती है। इस वजह से जाली नोट के धंधे को खत्म करना जरूर होता है। भारत इससे पीड़ित रहा है।  ज्यादा पुरानी बात नहीं 2009-10  में  सीबीआई ने भारत-नेपाल से सटे इलाकों में  मौजूद विभिन्न बैंकों की 70 शाखाओं पर छापा मारा था। वह काफी मात्रा में जाली नोट मिले थे। चौंकाने वाली बात यह थी कि नोट रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने भेजे थे।  जब सीबीआई छानबीन के लिए रिजर्व बैंक गई तो वहां काफी मात्रा में जाली नोट बरामद हुए। इससे सनसनी फैल गई। रिजर्व बैंक के तहखाने में जाली नोटों का मिलना गंभीर मसला था। उस समय डाॅ डी सुब्बाराव आरबीआई के गर्वनर (Sep 05, 2008 to Sep 04, 2013) थे।


एजेंसी जांच करने लगी। रिजर्व बैंक ने ब्रिटेन अपना प्रतिनिधि भेजा। वहीं से करेंसी नोट आते थे। डे ला रू नाम की कंपनी आपूर्ति करती थी। उसका सलाहकार तब भी  राथ्सचाइल्ड हुआ करता था। वहां जब बैंक के लोग तो पता चला की वही करेंसी नोट कंपनी पाकिस्तान भी भेजती है।  यहां सुरक्षा के साथ बड़ा खिलवाड़ था जो डे ला रू कर रही थी। इस वजह से सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया। पर वह प्रतिबंध ज्यादा दिन  तक चला नहीं। 

मंत्रालय के सूत्रों का दावा है कि चिदंबरम के मंत्रालय में वापस आने के बाद प्रतिबंध हट गया। फिर जाली नोटों का खेल शुरू हो गया। जब सरकार बदली और कमान नरेन्द्र मोदी के हाथ में आई तो उन्होंने जाली नोटों पर कड़ा प्रहार किया। नोटबंदी ले आए।  8 नवबंर 2016 को यह फैसला लिया गया था।  इससे एक ही झटके में जाली नोट खत्म हो गए। पर इन सब में राथ्सचाइल्ड का बहुत नुकसान हो गया। उसके हवाला कारोबार को धक्का लगा।  इस वजह से  वे लोग नोटबंदी के खिलाफ मुखर हो गए जो राथ्सचाइल्ड के लिए जनमत तैयार करते हैं।

एक तरफ मोर्चा ‘इकोनामिस्ट’ ने संभाला।  जो इसलिए स्वभाविक था क्योंकि पत्रिका में राथ्सचाइल्ड की भी हिस्सेदारी है। इसी कारण वह नरेन्द्र मोदी को लेकर मुखर है। दूसरी तरफ मोर्चा अमत्य सेन ने संभाला।  वे नोटबंदी पर सरकार को घेरने लगे। डॉ मनमोहन सिंह ने तो नोटबंदी को संगठित लूट और वैधानिक डैकती कहा था।  वे इसे लेकर इतना मुखर है कि 8  नवबंर को भारतीय लोकतंत्र का काला दिन मानते हैं।  इसमें कोई हर्ज नहीं है। सबकी अपनी-अपनी राय होती है। लेकिन राथ्सचाइल्ड के साथ जो इन लोगों के संबंध है, उससे संदेह पैदा होता है। 

साभारः यथावत

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1 Comment

  1. Avatar संदीप कुमार says:

    खा गए देश का धन लूट कर ये सब. जो दस सालो तक कुछ नहीं बोला वो भी अब बोलने लग गया! इसका मतलब चौकीदार ईमानदार है

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