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movie review: Ray के किवंदती उत्सव को वाजपेयी और केके मेनन ने साकार किया

मूवी रिव्यू : Ray

ओटीटी मंच : नेटफ्लिक्स

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विपुल रेगे। विख्यात फ़िल्मकार और कहानीकार सत्यजीत राय की रचनाओं में एक अबूझ रहस्याकर्षण होता है। उनकी कहानियों के पात्र स्मरण शक्ति में देर तक बने रहते हैं। उनके रचे पात्र दर्शक के मन पर गाढ़ा धूसर प्रभाव छोड़ते हैं। वे अपनी कहानियों में नभोरेणु सा वातावरण पैदा करते हैं। कभी-कभी उनके रचे पात्र धुंध पर पाँव रखते ही अदृश्य हो जाते हैं। सत्यजीत रे की कल्पनाओं के आकाश से एक फिल्मकार ने चार कथाएं चुनी हैं।

 उल्लेखनीय है कि इन दिनों महान कथाकार सत्यजीत राय का किवंदती उत्सव मनाया जा रहा है। सिनेमा की उत्सवधर्मिता उसकी फिल्मों के माध्यम से प्रकट होती है। सत्यजीत की कथा ले लेना ही पर्याप्त नहीं होता, आपको उनका बिंब भी लेना पड़ता है। उनके दृष्टिकोण, उनकी कथाओं के कलेवर हैं। उनके बिना फिल्म बनाना, एक निष्प्राण स्क्रीनप्ले रचने के बराबर है।

https://youtu.be/P0P_Sfju0-Q

सत्यजीत की चार कथाओं फॉरगेट मी नॉट, बहरूपिया, हंगामा है क्यों बरपा और स्पॉटलाइट पर तीन निर्देशकों ने फ़िल्मकार चार शार्ट फिल्म बनाई है। इन चार में से दो के साथ ही न्याय हो सका है, बाकी दो कथाओं का तो चूरमा ही बना दिया गया है। वसन बाला, श्रीजीत मुखर्जी और अभिषेक चौबे का सिनेमा सत्यजीत की गहनता को प्राप्त नहीं कर सका है।

अपितु इनमे से दो कथाओं को देखकर आनंद लिया जा  सकता है। बहरुपिया और हंगामा है क्यों बरपा के सतही निर्देशन को दो सिद्धहस्त कलाकारों ने अपने कंधे पर उठा लिया है। मनोज वाजपेयी और के के मेनन के अद्वितीय अभिनय हमें बांध लेते हैं। बहरुपिया एक ऐसे मेकअप आर्टिस्ट इन्द्राशीष की कथा है, जो मेकअप की अपनी कला की श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहता है। इस सनक में वह अपराध कर बैठता है।

https://youtu.be/rpv9N-0A8Yc

दूसरी कथा है एक ऐसे शायर की, जो कभी उठाईगिरा हुआ करता था। एक दिन रेल की यात्रा में वह सहयात्री की भाग्यवान घड़ी ‘ख़ुशवक़्त’ चुरा लेता है। सहयात्री का स्वर्णिम भाग्य घड़ी के रुप में मुसाफ़िर अली के पास आ जाता है। सत्यजीत के रचे इन पात्रों को मनोज वाजपेयी और केके मेनन सांस लेने योग्य बनाते हैं। ये दोनों ही भारतीय सिनेमा के अनमोल रत्न हैं।

मनोज वाजपेयी तो इस समय अभिनय के शिखर पर विराजमान दिखाई देते हैं। चार कथाओं की इस वेब सीरीज की ये दो कहानियां कुछ जीवंत सी महसूसती हैं। सत्यजीत राय की अपने पात्रों को लेकर आंतरिक दॄष्टि इन दोनों कलाकारों ने ही पकड़ी। इस तरह के पात्र निभाने के लिए दीर्घ कालिक वैचारिक प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। कुल मिलाकर केके मेनन और मनोज वाजपेयी के कारण ये वेब सीरीज पिटने से बच गई। ये कथाएं वयस्क दर्शक के ही देखने योग्य है।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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