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movie review: मनोज वाजपेयी का अभिनय ही इस बेजान फिल्म के प्राण हैं

मूवी रिव्यू : फैमिली मैन 2

विपुल रेगे।फैमिली मैन का पहला सीजन अप्रत्याशित सफलता लेकर आया था लेकिन इसका दूसरा सीजन ऐसी सफलता को दोहराएगा, इसमें संदेह है। स्क्रिप्ट के स्तर पर कमज़ोर लेकिन अभिनय के पक्ष पर बहुत शक्तिशाली इस सीजन को दर्शकों की मिश्रित प्रतिक्रियाएं मिली है। नौ एपिसोड की ये यात्रा कच्चे धूल भरे मार्ग पर चलती है लेकिन यात्रा में सुंदर दृश्य भी दिखाती है। दूसरे सीजन का इतना तो हासिल है कि श्रीकांत तिवारी नामक कैरेक्टर अब एक ब्रांड बन गया है।

फैमिली मैन की निर्देशक जोड़ी राज निदिमारु और कृष्णा डीके को ये मालूम होना चाहिए था कि पिछला सीजन जिस नोट पर समाप्त किया गया था, वह बड़ा ही रुचिकर था।  पिछले सीजन में क्लाइमेक्स अधूरा छोड़ दिया गया था। ये वैसा ही था, जैसा बाहुबली फिल्म के दो भागों में किया गया था। बाहुबली की तरह ही  फैमिली मैन के दूसरे भाग को लेकर दर्शकों को भारी अपेक्षाएं हो गई थी।

वे इसके दूसरे सीजन में अधिक मनोरंजन और उत्तेजना चाहते थे। दूसरे सीजन की शुरुआत में उस क्लाइमैक्स को लचर ढंग से समाप्त किया गया है। इसकी पहली कहानी पूरी होती नहीं और एक दूसरी कथा का सिरा इसमें से निकल आता है। दूसरे सीजन में श्रीकांत तिवारी टास्क फ़ोर्स छोड़ चुका है और कारपोरेट सेक्टर में सुबह 10 से 5 वाली नौकरी करता है। श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों के नेता भास्करन के कैंप पर श्रीलंकन सेना हमला करती है।

भास्करन भागकर लंदन चला जाता है। भास्करन का भाई चेन्नई में गिरफ्तार होता है और कोर्ट में पेश करते समय एक बम विस्फोट में मारा जाता है। इससे क्रोधित भास्करन देश की प्रधानमंत्री की हत्या की भयंकर योजना रचता है। भास्करन को इस योजना में पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई का साथ मिलता है। उधर कारपोरेट की दुनिया से बोर हो गया श्रीकांत पुनः टॉस्क फ़ोर्स में लौट जाता है। भारत में भास्करन की एक ट्रेंड योद्धा छुपकर रह रही है। इशारा मिलते ही वह सक्रिय हो जाती है। श्रीकांत और उसकी टीम को मालूम ही नहीं है कि अबकी बार ख़तरा कितना बड़ा है।

जैसा कि मैंने ऊपर लिखा कि मनोज वाजपेयी का दूसरा सीजन कच्चे धूल भरे रास्तों पर चलती एक मनोरंजक यात्रा की तरह है। ये फिल्म कुछ हिस्सों में प्रभावित करती है लेकिन बहुत सारे हिस्सों में झुंझलाहट भी पैदा करती है। कहानी इसकी सबसे बड़ी दिक्कत के रुप में सामने आती है। लिट्टे के एक प्रमुख व्यक्ति का चेन्नई में सुलभता के साथ रहना, लिट्टे के साथ आतंकी संगठन आईएसआई का बेतुका गठबंधन दिखाना, नौ भागों की लंबी भागदौड़ के बाद बड़ा ही लचर क्लाइमैक्स दिखाना, स्क्रीनप्ले सुघड़ न होना इस सीरीज की सबसे बड़ी कमज़ोरी सिद्ध हुई है।

प्रारंभ के चार एपिसोड तो हद दर्जे की बोरियत पैदा करते हैं। जैसा कि शीर्षक से विदित है कि ये एक ऐसे आदमी की कहानी है जो एक ओर खतरों से खेल रहा है तो दूसरी ओर एक मध्यमवर्गीय पति और पिता की ज़िम्मेदारी भी संभालता है। इन दोनों के बीच फंसा है श्रीकांत तिवारी। निर्देशक जब श्रीकांत की पत्नी का एक्स्ट्रा मटेरियल अफेयर स्क्रिप्ट में जोड़ता है तो स्क्रिप्ट बोझिल हो जाती है।

ध्यान रहे दर्शक मूल कथा पर ही केंद्रित रहना चाहता है लेकिन निर्देशक बीच-बीच में श्रीकांत की पत्नी और बेटी के प्रसंग जोड़ता चला जाता है। इसके चलते मूल कथा का प्रभाव भंग होता है। निर्देशक ने वास्तविक प्रभाव रचने के लिए फिल्म को द्विभाषी बना डाला है। लगभग आधी फिल्म तमिल भाषा के संवादों के साथ चलती है। अंग्रेजी समझने वाला दर्शक भी सबटाइटल्स को देखकर समझ नहीं पाता, क्योंकि सबटाइटल्स के पीछे स्ट्रिप न लगाने के कारण बैकग्राउंड के दृश्यों में सबटाइटल्स छुप जाते हैं।

इन दृश्यों को भी हिंदी डब कर दिया जाता तो दर्शक को आसानी होती। इस फिल्म में कुछ मज़ेदार है तो कलाकारों का अभिनय। मनोज वाजपेयी, सामंथा अक्किनेनी, शारिब हाश्मी, वेदांत सिन्हा, अश्लेषा ठाकुर के कारण फिल्म में दिल लगा रहता है। निःसंदेह मनोज वाजपेयी अभिनय के उच्च शिखर पर विराजमान है। उनकी भाव-भंगिमाएं भी बोलती हैं। सामंथा इस फिल्म में न होती तो दर्शक की सारी रुचि ही जाती रहती। उनका उत्कृष्ट अभिनय एक बेजान कथा को प्राण वायु देता है।

उनका अंडर प्ले कमाल का है। फिल्म के बाल कलाकार वेदांत सिन्हा के कॉमिक दृश्य भी इस फिल्म की जान है। निर्देशक जोड़ी को सीजन-2 का फिल्माया गया क्लाइमेक्स सीक्वेंस पुनः देखना चाहिए। ये इस हद तक लचर है कि एक्शन दृश्यों में कैमरा शेक होता रहता है। एक बेजान स्क्रिप्ट होने के बाद भी निर्देशक जोड़ी श्रीकांत तिवारी नामक चरित्र को एक ब्रांड के स्वरुप में ढालने में लगभग कामयाब दिखाई देते हैं।

फिल्म के अंत में निर्देशक ने तीसरे सीजन के लिए एक संकेत छोड़ा है। संभवतः अगला सीजन कोविड वायरस और चीन की पृष्ठभूमि को लेकर होगा। श्रीकांत तिवारी के लिए अभी बहुत से अवसर बाकी है। कलाकारों के अभिनय के लिए ये फिल्म देखी जा सकती है। ये बच्चों के देखने योग्य नहीं है। इसमें हिंसा और कुछ वयस्क दृश्य हैं। सीजन : 2 अमेजॉन प्राइम पर उपलब्ध है।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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