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इतिहास तथा भविष्य का निर्माण करने वाली मानव की सर्वाधिक शक्तिशाली क्षमता !

मानव की वह क्षमता जो इतिहास को भी बदल सकती है और भविष्य का रुख तय कर सकती है , वह है – प्रश्न पूछकर उसके उत्तर की खोज की क्षमता । यह क्षमता उसे अन्य प्राणियों से अलग करती है । लेख के अंतिम पंक्ति को पढ़ने के उपरांत आप यह जान जाएंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं ? क्या आपको एकदम स्पष्ट उत्तर मिल जाएगा ? या फिर थोड़ी सी झलक मिलेगी ? यह तो पूरा लेख पढ़कर ही स्पष्ट होगा । क्योंकि लेख में प्रश्न पूछने और करने के मनोविज्ञान को भी समझाया गया है तथा वर्तमान विद्यार्थियों तथा मानव समाज पर भी टिपण्णी की है ।प्रश्न करने तथा उनके उत्तर की खोज ने मानव सभ्यता के इतिहास को बदल कर रख दिया है । आग की खोज से आग्नेय अस्त्रों अर्थात मिसाइल के निर्माण तक मानव समाज ने एक लम्बी यात्रा की है और यह यात्रा प्रश्न करने और उसके उत्तर को खोजने की प्रक्रिया से ही प्रारंभ हुई है ।

प्रश्न करें । प्रश्न करने से ही प्रज्ञा के जागरण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है । मानव ने गुफाओं की दीवारों में लिखा । फिर मिट्टी वाली जमीन में , स्लेट में , ब्लैक बोर्ड में , ताड़ पत्र में , फिर किताबें लिखी , आज किंडल से इंटरनेट के माध्यम से ऑनलाइन किताबें पढ़ी जा रही है । आज का युग चौथी औद्योगिक क्रान्ति का युग है , जिसमे रोबोटिक्स , आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस , नैनो तकनीक , क्वांटम कम्प्यूटिंग , बायो तकनीक , इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स , फाइव जी , थ्री डी प्रिंटिंग तथा स्वचालित यातायात के साधन आते हैं । आज के युवा को ऐसा माहौल देना चाहिए कि वह नया सोच सके , नए प्रयोग कर सके तथा तथा असफल होने के डर से मुक्त हो सके । लेकिन क्या हम और हमारी शिक्षा व्यवस्था इस ओर ध्यान दे रही है ?

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हमारे भारत देश की शिक्षा व्यवस्था में प्रश्न पूछने के प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाता है । भारत देश के विद्यार्थियों अब वो ज़माना नहीं रहा कि जब आप किताबों से रटकर , तोते की तरह कॉपी में मीठू मीठू लिखकर अपने जीवन में कुछ सार्थक कर पाएंगे । आपकी अंक तालिका में बस अंक ही होंगे । न कोई योग्यता , न कोई उत्साह और न कोई संतुष्टि । पुस्तकों को पढ़ना है , समझना है , नया सोचना है और लिखना है । आप भले ही रटंत तकनीक से विश्वविद्यालय में थोड़े बहुत अंक अर्जित कर लें , लेकिन व्यावहारिक जीवन में इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा । अगर विश्वास ना हो तो चीन , इंगलैंड , जापान आदि देशों के ग्रेजुएशन एंट्रेंस टेस्ट का पेपर उठा कर देख लीजिए ।

सवाल बहुत सरल होते हैं , लेकिन जवाब हर किसी के नए होने की संभावना से युक्त होते हैं। यदि आप हिटलर होते और आपको पता होता कि युद्ध से इतनी तबाही मचेगी तो आप क्या करते और क्यूं ? यदि पृथ्वी गोलाकार ना होकर चतुर्भुजाकार होती तो अक्षांश व देशान्तर के सिद्धांत में क्या बदलाव होता ? यदि रेने देकार्ट आज पैदा होते तो संशय विधि के अलावा कौन सी विधि देते ? क्या वह आज भी कहते कि मैं सोचता हूं , इसलिए मैं हूं ? यदि कोलंबस जीवित होकर पुन : विश्व की समुद्र से यात्रा करे तो अपने अनुभवों को वह डायरी में कैसे लिखेगा ? सच तो यह है कि आपको कुछ नया सोचने का माहौल और अवसर ही नहीं दिया जा रहा है । किताब से पढ़कर , नोट्स रटकर ही एग्जाम देने भर का आपका उद्देश्य था तो उच्च शिक्षा में प्रवेश ही क्यों लिया ?? जागो देश के विद्यार्थियों !! तुम्हारे भविष्य की जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी है ।

क्या प्रश्न पूछना इतना जरूरी है ? प्रश्न पूछने से आखिर होता क्या है ? क्या कुछ प्रश्न सही और कुछ प्रश्न ग़लत होते हैं ? सही प्रश्न पूछने से क्या होता है ? ग़लत प्रश्न पूछने से क्या होता है ? सही प्रश्न पूछने से प्रज्ञा ( intelligence ) का विकास होता है । जैसे जब न्यूटन , जेम्स वाट ने क्रमश : सेब के नीचे गिरने और वाष्प के बल से केतली के ढक्कन के हिलने पर प्रश्न पूछा तो हमें विज्ञान के कुछ नियम प्राप्त हुए तथा सामूहिक प्रज्ञा का विकास हुआ । लेकिन इन दो वैज्ञानिकों के मन में सही प्रश्न आया कैसे ? सही प्रश्न की उत्पत्ति आश्चर्य के भाव ( sense of wonder ) से होती है। कई सारे व्यक्ति उपर्युक्त वर्णित घटनाओं को प्रतिदिन देखते थे , लेकिन उनमें आश्चर्य का भाव नहीं होता था ।

इसीलिए प्रश्न नहीं होता था । आप भी अपने आस – पास देखिए , क्या आप आश्चर्य के भाव से नहीं भर जाते हैं ? यदि आश्चर्य का भाव मन में नहीं आता है तो इसका अर्थ है कि आप अपनी स्मृति का प्रयोग कुछ ज्यादा ही करते हैं । खैर जाने दीजिए । प्रश्न है कि आश्चर्य का भाव भी मन में कैसे आता है ? तो इसका उत्तर है कि आश्चर्य की उत्पत्ति पर्यवेक्षण ( observation ) से होती है । जब हम भौतिक वस्तुओं से लेकर मानसिक गतिविधियों को ध्यान पूर्वक बिना किसी पूर्वाग्रह के देखते हैं तो इसे पर्यवेक्षण कहते हैं। जब मन का पर्यवेक्षण करते हैं तो बुद्ध , महावीर , महर्षि पतंजलि बनते हैं और जब भौतिक वस्तु का पर्यवेक्षण करते हैं तो स्टीव जॉब्स , रतन टाटा , इलोन मस्क बनते हैं ।

प्रश्न उठता है कि पर्यवेक्षण की प्रवृत्ति का विकास कैसे हो ? पर्यवेक्षण का जन्म सौंदर्य बोध ( AESTHETIC SENSE ) से होता है । जब आपको अपने आस – पास की प्रत्येक वस्तु में सौंदर्य नजर आने लगे या आपको यह महसूस होने लगे कि मैं इस विराट अस्तित्व के बारे में कुछ नहीं जानता हूं , लेकिन मुझे जानना है तो इस बोध में निहित जिज्ञासा को सौंदर्य बोध कहते हैं। फिर आपको यौवन से भरी हुई युवती भी उतनी ही सुन्दर लगेगी , जितनी सुंदर किसी वृद्ध स्त्री के गालों की झुर्रियां ; आप इस बात पर मंत्र मुग्ध हो जाएंगे कि मानव शरीर की कोशिका की संरचना और उम्र के बढ़ने में कितना विशिष्ट संबंध है । आपको नदी की धारा से चिकने हुए पत्थर तथा हिमालय पर्वत दोनों में सुन्दरता नजर आएगी । पतझड़ हो या मानसून , जीवन दुख में हो या सुख में ; आप दोनों में अपने बोध से सौंदर्य खोज ही लेंगे । प्रश्न है कि सौंदर्य बोध का जन्म कैसे होता है ?

सौंदर्य बोध स्वीकार करने की भावना ( FEELING OF ACCEPTENCE ) से आता है । जब व्यक्ति अपनी छिद्रान्वेषी दुर्गुण को छोड़ता है तथा जो जैसा है , उसे वैसा ही ग्रहण करता है , देखता है तो इसे स्वीकार करना कहते हैं । जिसे महान विचारक जिद्दू कृष्णमूर्ति सी द थिंग एज इट इज कहते हैं । स्वीकार करने की भावना आंतरिक स्थिरता ( INTERNAL STABILITY ) से उत्पन्न होती है । आंतरिक स्थिरता की प्राप्ति स्वयं के स्वरूप को जानने से होती है । इसीलिए उपनिषदों का सार दो शब्दों में कहा जा सकता है – आत्मानम् विद्धि , आत्मा को जानो । सुकरात ने कहा – नो दाईसेल्फ । अपने प्रिय शिष्य आनंद के रोने पर बुद्ध ने कहा – आत्म दीपो भव : । इसीलिए भारतीय संस्कृति में आत्मा विषय पर खूब परिचर्चा मिलती है ।

ध्यातव्य है कि सही प्रश्न पूछना , प्रज्ञा का जागना, आश्चर्य का भाव , पर्यवेक्षण , सौंदर्य बोध , स्वीकार करने की भावना , आंतरिक स्थिरता , स्वयं के स्वरूप को जानना ; यह सारी प्रक्रियाएं एक के बाद एक होती है , ऐसा नहीं है ! इनमें कोई अनिवार्य तार्किक अनुक्रम पाया जाता है ऐसा भी नहीं है! यह सारे एक दूसरे के साथ आपस में एक जाल की तरह जुड़े हुए हैं । वैसे यदि स्वयं को जानना है तो सही प्रश्न करना पड़ेगा ; जैसा की युद्ध भूमि में अर्जुन ने किया ; नचिकेता ने यमराज से किया ,उपनिषदों के निर्माण की मूल भावना में छिपे शिष्यों ने किया । प्रश्न तो पूछना पड़ेगा । किससे पूछें , कब पूछें , कहां पूछें , कैसे पूछें , कितनी संख्या में पूछें ; यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है । यदि कुछ ना समझ में आ रहा है तो प्रश्नोपनिषद पढ़ लें । कुछ प्रश्नों का उत्तर संकेत रूप में मिल जाएगा।

सच तो यह है कि आज की उपभोक्तावादी , वैश्वीकरण के युग में ना तो हम स्वयं को जानते हैं और ना ही भौतिक वस्तुओं को । क्या हम स्वयं को प्रत्येक स्तर पर जानते हैं ? सर्वसार उपनिषद में पांच कोश के स्तर बताए गए है । सच तो यह है कि हम अपने शरीर को ही नहीं जानते तो फिर प्राण , मन , विज्ञान और आनंदमय कोश की बात तो बहुत दूर की है ? हमारे शरीर में कितने आंतरिक अंग है ? ऋतु परिवर्तन से उनके कार्य संचालन में क्या परिवर्तन आता है ? हमें तो यह भी नहीं पता कि लगभग 48 मिनट के अंतराल में हमारी श्वास की गति तथा नासिका के पटल में प्रवेश की स्थिति बदल जाती है । आज तक बड़े बड़े वैज्ञानिक भी मस्तिष्क कैसे कार्य करता है , यह पता नहीं लगा पाए ! तो प्रश्न उठता है कि आखिर उपनिषद् के ऋषियों ने , सुकरात और बुद्ध आदि ने स्वयं को जानने की कोई प्रेक्टिकल विधि बताई है ?? तो इसका उत्तर है – ” हां ” । लेकिन हमें फेसबुक , इंस्टाग्राम चलाने और अन्य अनुत्पादक कार्यों से फुर्सत मिले तब तो इसकी खोज करें !!

आज इस वैश्विक महामारी के काल में यह आवश्यक है कि हम प्रश्न करें कि क्या हम जैसे जीवन जी रहे हैं , वो सही है ? वो हमारे हित के अनुकूल है ? क्या एलोपैथी की दवाएं हमें स्वास्थ्य प्रदान कर सकती हैं ? क्या कार्बोनेटेड वाटर जैसे सॉफ्ट ड्रिंक्स हमें पीने चाहिए ? हमें प्रश्न करना चाहिए – उपभोक्तावादी संस्कृति पर ; यदि भारतीय समाज अपनी सनातन संस्कृति के अनुरूप केवल सही प्रश्न करने लग जाए तो कई समस्याओं के समाधान की शुरुआत हो जाएगी । तो आइए प्रश्न करते हैं । प्रश्न करने तथा उनके उत्तर की खोज ने मानव सभ्यता के इतिहास को बदल कर रख दिया है । आग की खोज से आग्नेय अस्त्रों अर्थात मिसाइल के निर्माण तक मानव समाज ने एक लम्बी यात्रा की है । प्रश्न तो यह भी है कि हमने भौतिक विकास तो बहुत कर लिया , क्या आध्यात्मिकता की चर्चा पूरे विश्व में शुरू नहीं होनी चाहिए ? आइए हम सब मिलकर फिर से संवाद , परिचर्चा द्वारा बोध जागृति के अभियान को आगे बढ़ाए ।

हमारे इतिहास में जो दो विश्व युद्ध हुए हैं , यदि शासक उनके परिणामों का अनुमान लगाते और यह प्रश्न करते कि इससे लाभ होगा या हानि ? तो आज इतिहास दूसरा होता ! यदि चीन इस वुहान वायरस की खबर पहले ही विश्व को दे देता तो शायद इतनी तबाही ना मचती । हमें प्रश्न करना चाहिए कि क्या 21 वीं सदी में बायो केमिकल छद्म युद्ध का प्रारम्भ तो नहीं हो गया है ? प्रश्न करें , संभावना खोजे , आशंकाओं का पता लगाए । निश्चित तौर पर पिछले दो वर्षों से इतिहास का निर्माण हो रहा है और भविष्य निर्माण की भी भूमिका बन रही है । हमें प्रश्न करना होगा कि हम कैसा भविष्य चाहते हैं ? ऑक्सीजन सिलेंडर से श्वास लेते हुए मानव वाला भविष्य या घर के अंदर तुलसी व बाहर नीम , बरगद के वृक्ष से शुद्ध प्राण वायु लेते हुए मनुष्य वाला भविष्य ? आप यह प्रश्न सात सौ करोड़ लोगों के मस्तिष्क में डाल भर दें , बाकी की प्रक्रिया स्वमेव हो जाएगी । जय हिन्द । जय सनातन संस्कृति ।

लेखक

आदित्य जैन
प्रवक्ता , राजकीय इंटर कॉलेज

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