मीडिया और शब्दों का खेल

राजीव नांदल । अभी हाल ही मेरी आँखों के सामने एक मीडिया की रिपोर्ट आई। इस रिपोर्ट को देखकर मन को दुःख पहुंचा। कई तरह के सवाल मन में उठे। फिर रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ने के बाद मन में जो प्रश्न समाज को लेकर उठे थे वो ना रहे, परन्तु मेरे सामने मीडिया को लेकर प्रश्न खड़े हो गए। क्या सदा से मीडिया का व्यवहार ऐसा ही था? क्या मीडिया सदा से ही एक समाज में व्याप्त बुराइयों को दूसरे समाज पर लादता आ रहा है? क्या कभी हम एक समाज के रूप में कभी इतने जागरूक होंगे की इस तरह की रिपोर्ट मीडिया हम ना दे।

उस मीडिया रिपोर्ट की सुर्खियां थी-“आंखों के सामने पति लूटता था बेटी की इज्जत, आजिज आकर पत्नी ने बेटी और उसके दोस्त के साथ मिलकर कर दी हत्या”। इस रिपोर्ट को लेकर मेरे सामने दो सवाल प्रमुख रूप से खड़े हुए। वो दोनों सवाल निचे लिखे हुए है:

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१. शब्दों का प्रयोग

इस समाचार में शब्दों का चयन इस तरह से किया गया था कि आपको लगेगा कि यह घटना आपके ही समाज में से है और किसी राक्षसी मानसिकता रखने वाले व्यक्ति ने की है। ये शब्द आपके ही समाज में प्रयोग होते है, जैसे पति, पत्नी आदि। क्यूंकि ये घटना इतनी घृणित है, जिस समाज के अंदर ये घटित होगी, उस समाज को घृणित नजरों से ही देखा जाएगा। शब्दों के प्रयोग के द्वारा एक ख़ास समाज को निशाना बनाया गया है।

२. मददगार का नाम, लेकिन अपराधी और मृतक का नाम नहीं

इस समाचार में अपराधी और मृतक का नाम नहीं है, लेकिन मदद करने वाले का नाम है। मदद करने वाला विशेष समुदाय से था। इसका मतलब ये है कि हमें ये बताया जा रहा है कि विशेष समुदाय के लोग बड़े अच्छे और नेक होते है जो ऐसे आपराधिक मानसिकता के लोगों को समाप्त करने से नहीं हटते अपितु वो आपकी सहायता के लिए भी तैयार रहते है।

अपराधी अब इस संसार में नहीं है। उसका नाम क्यों छुपाया गया? पत्नी और बेटी का नाम समझ में आता है लेकिन अपराधी का नाम छुपाना किस तरफ संकेत करता है? फिर इसका उत्तर भी स्वयं ही मिल गया। अगर अपराधी का नाम बता दिया जाता तो फिर आप जान जाते की वो किस समाज से आता है।

मीडिया में ऐसी रिपोर्ट बहुत आती है और हम सिर्फ हैडलाइन देख कर ही अगले समाचार पर बढ़ जाते है। इस तरह के समाचार प्रकाशित करने वाले समाचार पत्रों और न्यूज़ पोर्टलों से हम कोई भी सवाल नहीं पूछते, जिससे उनको हौसला मिलता रहता है। इस तरह की रिपोर्ट आने से सबसे ज्यादा नुक्सान सिर्फ हिन्दू समाज का होता है। हिन्दू समाज को जागरूक करना और इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी है और हमें उन सभी मीडिया वालों से सवाल पूछना चाहिए जो इस तरह की भ्रामक समाचारों को प्रकाशित करते है।

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