साल का पहला खोजी अभियान : ग्रेट पिरामिड का रहस्य सुलझाएंगे माइक्रो रोबॉट

पृथ्वी के गर्भ में बहुत से रहस्य साँस ले रहे हैं। ऐसे रहस्य, जिन पर शताब्दियों से ‘पहेलियों’ का आवरण पड़ा हुआ है। गीज़ा के ग्रेट पिरामिड में एक ऐसी भूल-भुलैया है, जिसकी थाह आज तक कोई नहीं ले सका है। पिरामिड की भूल-भुलैया के बीच ‘किंग्स चैंबर’ के ठीक नीचे बना ‘क्वींस चैंबर’ आज भी अविजित है। तीन शताब्दियां बीत चुकी हैं लेकिन क्वींस चैंबर के दरवाज़े कोई नहीं खोल सका। पिछले साल इस चैंबर के ठीक पहले सौ फ़ीट लम्बा ‘शून्य’ होने का पता चला है। इतना लम्बा क्षेत्र खाली क्यों छोड़ा गया, इसे लेकर पुराविद और खोजी भी उलझन में पड़ गए हैं। इस रहस्यमयी स्पेस को जानने के लिए इसी साल नया अभियान शुरू होने जा रहा है। लगता है विश्व की सबसे प्राचीन और अद्भुत पहेली के सुलझने की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक ग्रेट पिरामिड को दुनिया की छत कहा जाता था। इस समय तक 450 फ़ीट ऊँची एक ही इमारत हुआ करती थी। एक ही डायमेंशन के 23 लाख चूना पत्थरों से निर्मित ग्रेट पिरामिड को विश्व की सर्वश्रेष्ठ पहेली इसलिए ही कहा जाता है कि ‘क़्वींस चैंबर’ अब भी अविजित है। कई प्रयास हुए लेकिन वहां पहुँचने का रास्ता खोजियों को कब तक नहीं मिल सका। सन 1993  में एक नन्हा रोबॉट बनाया गया ।

इसे  Upuaut Project नाम दिया गया। Upuaut एक रेंगने वाला रोबॉट था। इसे क्वींस चैंबर की एक ‘शॉफ्ट’ में भेजा गया था लेकिन आगे इसे रास्ता बंद मिला। ‘नेशनल ज्योग्रॉफिक सोसाइटी’ ने सन 2002 में एक और रोबॉट बनाया। इसे चैंबर के दक्षिणी शॉफ्ट में भेजा गया लेकिन राह नहीं मिली। इसके बाद एक और प्रयास उत्तरी शॉफ्ट में किये गए लेकिन वहां ऐसे मोड़ थे, जिन पर रोबॉट चल नहीं सका।

 

 

तीन हज़ार वर्ष से भी अधिक समय से बंद ये चैंबर खोजियों में झुंझलाहट पैदा कर रहा था। मिस्र सरकार के कड़े नियमों के चलते खुदाई कार्य नहीं किया जा सकता। ज्यादा खुदाई होने पर इमारत को नुकसान हो सकता है। इस समस्या का हल ‘म्युओंस’ ने कर दिया।एक अंतरिक्षीय कण है जो पृथ्वी पर 24 घंटे किरणों के रूप में गिरता रहता है।

 

म्युओंस हर जगह मौजूद हैं। यहाँ तक कि जब आप ये वाक्य पढ़ रहे होंगे तो छह म्युओंस आपके मोबाइल स्क्रीन पर उभर रहे इस वाक्य पर दौड़ लगाकर निकल गए होंगे। अत्यंत घनी ऊर्जा से परिपूर्ण म्युओंस संपूर्ण आकाशगंगा में प्रवाहित हो रहे हैं। अत्यंत सूक्ष्म म्युओंस नंगी आँखों से नहीं देखे जा सकते। इनका पता लगाने के लिए वैज्ञानिक विशेष डिटेक्टर्स की मदद लेते हैं। डिटेक्टर्स के जरिये म्युओंस का थ्रीडी मैप बनाया जा सकता है।

 

2015 में जापानी वैज्ञानिक कुनिहिरो मोरिशिमा ने ग्रेट पिरामिड में ‘म्यूओन डिटेक्टर’ लगाए। मार्च 2016 में जब डाटा देखा गया तो पता चला कि क्वींस चैंबर’ शुरू होने से पहले लगभग सौ फुट लंबा ‘शून्य’ है। म्युओंस इस शून्य की कोई आकृति नहीं बना सके। उन्नीसवीं सदी से अब तक इस विशाल खाली स्पेस के बारे में किसी को कुछ मालूम नहीं था। इस नई खोज ने पुराविदो को नई उलझन में डाल दिया है कि आखिर ये ‘शून्य’ क्या हो सकता है।

 

इस वर्ष खोज और भी पैनी होने जा रही है। उस रहस्यमयी शून्य तो पहुँचने के लिए दो नए रोबॉट बनाए गए हैं। चैंबर की दीवार में लगभग चार सेंटीमीटर का छेद ड्रिलिंग की मदद से किया जाएगा। इस छेद से दो रोबॉट अंदर भेजे जाएंगे। पहले एक ‘स्काउट रोबॉट’ भेजा जाएगा जो भीतर के हाई रिज्योल्यूशन फोटो भेजेगा। इसके बाद दूसरा रोबॉट एक सूक्ष्म हीलियम बलून में बैठकर उड़ान भरेगा। ये रोबॉट उस void या शून्य को स्केन कर रिपोर्ट भेजेगा।

 

ये नया अभियान साल की शुरुआत में ही होने जा रहा है। नंगी आँखों से नज़र न आने वाले दो माइक्रो रोबॉट जब क्वींस चैम्बर की रहस्यमयी गहराइयों में खोजबीन कर रहे होंगे तो सारी दुनिया सांस रोके उनके भेजे पहले फोटो का इंतज़ार कर रही होगी। विश्व के महान रहस्य के सुलझने का समय शायद आ ही गया है।

 

URL: Muon detectors and thermal imaging were used to make these discoveries.

Keywords: The Great pyramid, discovery, muon, Egypt,

 

 

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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